भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद मतदाताओं को शामिल करने के खिलाफ राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के अधिकारियों द्वारा 16.10 लाख अपीलें दायर की गईं।

इसके अलावा, ECI ने उन अपीलों को दायर करने के अपने फैसले को उचित ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला दिया।

SIR अभ्यास से संबंधित 14 कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका में 26 अक्टूबर को दायर जवाबी हलफनामे में ECI ने मोस्टारी बानू बनाम भारत चुनाव आयोग में 1 अप्रैल, 2026 और 6 अप्रैल, 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला दिया।

इन आदेशों में पश्चिम बंगाल SIR के दौरान न्यायिक अधिकारियों द्वारा लिए गए निर्णयों के खिलाफ अपीलों को संबोधित किया गया, जिसमें मतदाता समावेशन से पीड़ित ECI अधिकारियों की अपीलें भी शामिल थीं, और अपीलीय न्यायाधिकरणों को प्रासंगिक रिकॉर्ड की जांच करने और प्राकृतिक न्याय के अनुसार अपीलों पर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।

हलफनामा ECI, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर संधू और विवेक जोशी की ओर से उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु द्वारा दायर किया गया।

कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका में उस प्राधिकरण पर सवाल उठाया गया, जिसके तहत पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में शामिल होने के खिलाफ लगभग 16.10 लाख अपीलें ईसीआई के नाम पर दायर की गईं थीं। याचिका के अनुसार, 12 अगस्त, 2026 को चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू की नोटिंग में सवाल उठाया गया - "ECI की ओर से इन अपीलों को दायर करने के लिए कौन अधिकृत था, और किसके द्वारा?" याचिकाकर्ता ने संबंधित प्राधिकरण, अनुमोदन और निर्णय लेने के रिकॉर्ड पेश करने की मांग की।

पश्चिम बंगाल में SIR अभ्यास में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर में दावों और आपत्तियों पर निर्णय लेने के लिए न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया। न्यायालय ने बाद में मतदाता सूची से बहिष्करण के खिलाफ अपील सुनने के लिए अपीलीय न्यायाधिकरण के गठन का निर्देश दिया।

अपने 1 अप्रैल के आदेश में न्यायालय ने ECI वकील की इस दलील को दर्ज किया कि अपीलीय न्यायाधिकरणों को मतदाता बहिष्करण को चुनौती देने वाले व्यक्तियों द्वारा और मतदाता समावेशन को चुनौती देने वाले ECI अधिकारियों द्वारा दायर अपीलों में प्रासंगिक रिकॉर्ड तक पहुंच प्राप्त होगी।

न्यायालय ने अपीलीय न्यायाधिकरणों से अपील पर निर्णय लेने से पहले न्यायिक अधिकारियों द्वारा दिए गए कारणों सहित संपूर्ण रिकॉर्ड की जांच करने को भी कहा। इसमें कहा गया कि न्यायाधिकरण प्राकृतिक न्याय के अनुरूप अपनी प्रक्रिया विकसित कर सकते हैं और प्रभावित पक्षों को सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना चाहिए। कोर्ट ने अपने 6 अप्रैल के आदेश में इसे दोहराया, जिसमें ECI की अपीलों का भी उल्लेख है।

6 अप्रैल के आदेश में कहा गया,

"इन अपीलीय न्यायाधिकरणों के कामकाज के लिए चुने गए परिसर का उल्लेख हमारे आदेश दिनांक 01.04.2026 के पैराग्राफ 6 में विधिवत किया गया है। हमने उस आदेश के पैराग्राफ 9 के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया है कि निर्णय लेने वाले अधिकारियों द्वारा आपत्तियों को अस्वीकार करने के कारणों की कथित अनुपलब्धता को अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष उन व्यक्तियों द्वारा उठाया जा सकता है, जिनके नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं या ECI के ऐसे आपत्तिकर्ता/प्राधिकरणों द्वारा, जो हो सकते हैं। मतदाता सूची में कुछ नाम शामिल किये जाने से व्यथित हूं।''

अपने हलफनामे में ECI ने कहा है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO), जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO), निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (AERO) मतदाता सूची के लिए जिम्मेदार अधिकारी हैं। इसमें कहा गया कि विचाराधीन अपील CEO कार्यालय के अधिकारियों द्वारा अधिनियम के तहत प्राधिकारी के रूप में उनकी क्षमता में दायर की गई। ECI के अनुसार, ये अधिकारी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार अपील दायर करने के लिए अधिकृत थे, और मामलों को आयोग में नहीं लाया गया।

हलफनामे में कहा गया,

"RP Act के प्रावधानों के अनुसार, चुनावी रोल (Electoral Rolls) के संबंध में CEO / DEO / ERO / AERO ही अधिकृत अधिकारी होते हैं। ECI कार्यालय को पश्चिम बंगाल के CEO कार्यालय से 22.10.2026 को एक पत्र प्राप्त हुआ। इसमें बताया गया कि पश्चिम बंगाल के CEO कार्यालय के अधिकारियों ने RP Act के तहत अधिकृत अधिकारियों के रूप में ये अपीलें दायर की हैं। इन अधिकारियों को इस माननीय न्यायालय के आदेशों के अनुसार अपीलें दायर करने का अधिकार था और ये मामले आयोग के सामने नहीं लाए गए।"

इस याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई कि ECI (जो एक बहु-सदस्यीय निकाय है) के अधिकार क्षेत्र वाले फैसले CEC द्वारा अकेले (एकतरफा) नहीं लिए जा सकते। साथ ही आयोग के मूल रिकॉर्ड पेश करने और मामले की सुनवाई पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने की भी मांग की गई।

याचिका में आरोप लगाया गया कि अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद, SIR (विशेष पुनरीक्षण) प्रक्रिया से जुड़े 14 फैसले CEC के नाम पर लिए गए। पश्चिम बंगाल में मतदाताओं को शामिल करने के खिलाफ दायर की गई अपीलों को भी इन्हीं एकतरफा फैसलों में से एक बताया गया।

अपने जवाब (Counter-Affidavit) में ECI का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले आयोग द्वारा संविधान के अनुच्छेद 324 और 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 18 के अनुसार लिए गए।

ECI ने स्पष्ट किया कि चर्चा के दौरान अलग-अलग आयुक्तों द्वारा दी गई टिप्पणियां, सुझाव या पूछे गए सवाल, अपने आप में आयोग के फैसले नहीं माने जा सकते।

सुप्रीम कोर्ट ने इन कथित एकतरफा फैसलों को चुनौती देने वाली याचिका पर 5 अक्टूबर को नोटिस जारी किया। उस समय प्रतिवादियों (Respondents) का जवाब मिलने से पहले कोर्ट ने CEC को निलंबित करने से इनकार कर दिया था।

Case Title : Rakesh Kumar Singh alias Rakesh Singh v. Union of India & Ors.

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