CEC और चुनाव आयुक्तों को वह कानूनी सुरक्षा मिली हुई है, जो राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जजों के पास भी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सोमवार (5 अक्टूबर) को सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा, संवैधानिक अदालतों के जजों को मिलने वाली सुरक्षा से भी ज़्यादा हो सकती है। यह टिप्पणी CEC ज्ञान कुमार द्वारा मतदाता सूची के 'विशेष गहन संशोधन' (SIR) के संबंध में कथित तौर पर एकतरफा लिए गए फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने तर्क दिया कि 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' ने CEC और चुनाव आयुक्तों के अधिकार और कानूनी सुरक्षा को काफी बढ़ा दिया।
2023 के अधिनियम की धारा 16 के अनुसार, CEC और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कार्यों के निर्वहन (या निर्वहन के कथित कार्य) के दौरान किए गए कामों के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा प्राप्त है। यह कानूनी सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है।
इस चरण में जस्टिस बागची ने सुरक्षा के दायरे के बारे में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
जस्टिस बागची ने कहा,
"यह सुरक्षा शायद केवल राष्ट्रपति के लिए है। यह जजों पर भी लागू नहीं होती।"
सिंह ने इस टिप्पणी से सहमति जताई और तर्क दिया कि कानूनी व्यवस्था ने CEC को असाधारण कानूनी सुरक्षा की स्थिति में ला दिया है।
सिंह ने कहा,
"यहां तक कि प्रधानमंत्री के पास भी यह नहीं है।"
उन्होंने तर्क दिया कि कानूनी ढांचे ने प्रभावी रूप से CEC को "सुप्रीम कोर्ट के जजों से भी ऊंचे स्थान पर" बैठा दिया।
सिंह ने कहा,
"ECI आज किसी भी अन्य संवैधानिक प्राधिकरण की तुलना में अधिक शक्तिशाली है।"
अंत में कोर्ट ने याचिका पर केंद्र सरकार, ECI, CEC और चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया।
जजों और चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा की तुलना
जज (सुरक्षा) अधिनियम 1985, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों को वैसी ही सुरक्षा देता है। इसकी धारा 3(1) में कहा गया कि "कोई भी कोर्ट किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई सिविल या क्रिमिनल कार्यवाही शुरू या जारी नहीं करेगा जो जज है या था, अगर उसने अपने आधिकारिक या न्यायिक कर्तव्य या काम को करते समय या करते हुए दिखाए जाने के दौरान कोई काम किया है या कोई बात कही है।" यह सुरक्षा वैसी ही है जैसी 2023 के अधिनियम के सेक्शन 16 के तहत चुनाव आयुक्तों को दी गई।
हालांकि, जज (सुरक्षा) अधिनियम की धारा 3(2) साफ तौर पर "केंद्र सरकार या राज्य सरकार या भारत के सुप्रीम कोर्ट या किसी हाई कोर्ट या किसी अन्य अथॉरिटी की उस शक्ति को सुरक्षित रखता है जो किसी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई (चाहे वह सिविल, क्रिमिनल, या विभागीय कार्यवाही हो या कुछ और) करने के लिए उस समय लागू किसी कानून के तहत मिली हो, जो जज है या था।" CEC अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
इस तरह, जज (सुरक्षा) अधिनियम की धारा 3(2) साफ तौर पर कहता है कि धारा 3(1) में दी गई सुरक्षा, कानून के तहत किसी जज के खिलाफ सिविल, क्रिमिनल, विभागीय या अन्य कार्रवाई करने की केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट या किसी अन्य सक्षम अथॉरिटी की शक्ति को प्रभावित नहीं करती है। हालांकि, CEC अधिनियम में यह साफ तौर पर नहीं कहा गया है कि चुनाव आयुक्तों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने की सक्षम अथॉरिटी की शक्ति सुरक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट एक और याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें चुनाव आयुक्तों को दी गई आजीवन छूट को चुनौती दी गई।
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Case Title : Rakesh Kumar Singh v. Union of India, Shailendra Mani Tripathi v. Union of India