गरीबी और अपराध की प्रासंगिकता

Update: 2022-05-15 11:30 GMT

"Extreme poverty anywhere is a threat to human security everywhere." – Kofi Annan

गरीबी का सामान्य अर्थ— एक ऐसी स्थिति का होना है, जिसमें किसी व्यक्ति के पास अपेक्षा से कम मानवीय संसाधनों मौजूद हैं और जिसकी आय कम होती है तथा इसके कारण बुनियादी सुख सुविधाएं मिलना असंभव हों।

यदि गरीबी का सांखिकीय और अर्थशास्त्रीय दृष्टि से मूल्यांकन किया जाए तो इसके 2 अर्थ हैं-

1. पूर्ण गरीबी- ऐसी स्थिति जिसमें व्यक्तिगत बुनियादी सुविधाएं जैसे रोटी, कपड़ा, मकान इत्यादि के लिए आवश्यक राशि का कम होना है।

2. सापेक्ष गरीबी- ऐसी अवस्था जिसमें व्यक्ति दूसरों की तुलना में अपने जीवन स्तर के न्यूनतम स्तर को भी पूरा नहीं कर पाता है।

आजादी के पश्चात ब्रिटिश उपनिवेशिकीयो ने देश के लिए यदि कुछ छोड़ा है तो वह है गरीबी और जनसंख्या (poverty and population)। इसके अलावा न जाने ऐसी कई नीतियां जो अमीर को और अमीर बनाती गईं और गरीबों को और गरीब। आखिर क्यों उनसे और उनकी नीतियों से यह अपेक्षा की गई थी की वे समस्याओं का उचित समाधान निकालेगें।

वर्ष 2011 में विश्व बैंक के आकलन के अनुसार भारत में कुल 268 मिलियन लोग प्रतिदिन 1.90 डॉलर से कम में चरम गरीबी (extreme poverty) में अपना जीवन यापन कर रहे थे। उनके पास वे सामान्य बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं जो मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के अंतर्गत नागरिकों को प्रदान करने का वचन दिया गया था।

गरीबी की मार निचले तबकों से ताल्लुक रखने वाले लोगों को अधिक सहनी पड़ती, जिसमें शहरों से ज्यादा ग्रामीण इलाकों में लोग अधिक गरीबी रेखा से भी नीचे पाए गए हैं, जिनके आय के संसाधन शून्य हैं। साथ ही गरीबी का महिलाकरण, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र में एक और चुनौती है।

गरीबी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक प्रभावित करती है, क्योंकि महिलाओं के पास संसाधनों तक सीमित पहुंच होती है। चाहे वह खाद्य और पोषण संबंधी सुरक्षा हो या स्वास्थ्य देखभाल और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच या संपत्ति में स्वामित्त्व।

इसके बावजूद भी आज़ादी के 70 साल बाद भी गरीबों की वास्तविक संख्या का पता नहीं चल पाया है। देश में गरीबों की गणना के लिये नीति आयोग ने अरविंद पनगढ़िया के नेतृत्व में एक टास्क फोर्स का गठन किया था। 2016 में इस टास्क फ़ोर्स की रिपोर्ट आई जिसमें गरीबों की वास्तविक संख्या नहीं बताई गई।

• गरीबी और अपराध-

"Poverty and crime often occur simultaneously" अर्थात गरीबी और अपराध सदैव ही एक साथ होते हैं। हमेशा से चरम गरीबी का समाज में होना कहीं न कहीं अपराध का मुख्य कारक माना जाता रहा है, क्योंकि दैनिक जीवन जीने के लिए पर्याप्त वस्तुओं का नहीं होना या शक्तिशाली समाज द्वारा उन्हें नीचे गिराया जाना, लोगों के प्रति अपराधी को हीन भावना का शिकार बनाती है। उसी गिल्टी माइंड (state of mind) से वह अपराध कर बैठता है।

साथ ही यदि इसको विस्तृत अर्थ में देखा जाए तो गरीबी स्तर में जीने वाला व्यक्ति काफी चीजों से वंचित रख दिया जाता है, जैसे– ऐसे व्यक्तियों को सरकारी अनुदानों का ज्ञान नहीं होता। बेरोजगारी तथा बढ़ती महंगाई के कारण स्वस्थ वातावरण नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त उन्हें सरकारी नीतियों तथा विधिक अधिकारों की भी जानकारी नहीं होती और साथ ही इनके द्वारा शिक्षा एवं अवसरों में कमी का देखा जाना इत्यादि भी इसी के परिणाम है।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया एनवी रमाना ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान, कहा कि जब से हमने खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया है, हमने खुद को 'गरीबी' और 'न्याय तक पहुंच' की दोहरी समस्याओं के बीच फंसा हुआ पाया है। अफसोस की बात है कि आजादी के 74 साल बाद भी हम आज भी उसी मुद्दे पर चर्चा कर रहे हैं...हालांकि वास्तविकता दुखद है।

जस्टिस काटजू द्वारा हाल ही में दिए अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया की "अपराध का मुख्य कारण गरीबी है। जब तक हमारे समाज में गरीबी रहेगी तब तक अपराध भी रहेगा, इसीलिए भारत और अमेरिका जैसे देशों में जेलों में ज्यादातर आर्थिक रूप से तंग कैदी ही मिलेंगे।"

साथ ही "चाइल्ड फ्रेंडली" नामक संस्थान द्वारा किए मनोवैज्ञानिक परीक्षण में यह पाया गया की, जिस व्यक्ति का आर्थिक विषमताओं में पालन हुआ है या जो गरीबी स्तर से भी नीचे जीवन यापन करते है, उस वातावरण में पैदा हुए बच्चे एक सामान्य बच्चे से 7% अधिक हिंसक पाए जाते हैं। वे स्वयं को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि वे अपनी सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अपराध में ज्यादा लिप्त होते पाए जाते हैं।

सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय [The ministry of statistics and programme implementation] द्वारा जारी किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि अधिकांश अपराध में संलिप्त वे लोग है जिनकी वार्षिक आय 25,000 से कम है और अपराध पैसों के लिए किए गए थे, जिसमें मुख अपराध चोरी, लू ट और डकैती के थे। ऐसे मामलों में पिछले दशकों की तुलना में दोगुनी बढ़ोतरी हुई है।

यह कहना उचित होगा की मनुष्य का जब पेट नहीं भरता, शरीर ढकने के लिए कपड़े नहीं होते, रहने के लिए झोपड़ी भी नसीब नहीं होती और उसे अपमान झेलना पड़ता है तब उसके मन में विद्रोह भड़कता है और इस विद्रोह के रूप में वह अपराध की ओर उन्मुख होता है। एक भूखे व्यक्ति का पहला लक्ष्य अपनी भूख मिटाना ही होता है। उसे अच्छे-बुरे का भान नहीं होता, इसी कारण ज्यादातर अपराधियों की पृष्ठभूमि गरीबी ही होती है।

• सरकार द्वारा किए गए उपाय-

हमारे समाज में गरीबी होने का दोष हम पूरा का पूरा सरकार को नहीं दे सकते है क्योंकि स्वतंत्रता के तुरंत पश्चात पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा क्षेत्रीय कार्यक्रम के माध्यम से गरीबी उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करने का पूर्ण प्रयास किया गया था। इसी प्रकार से संविधान के अनुच्छेद 15, 16, 21 और 39A के अंतर्गत दिए मापदंडों का पालन करते हुए कई लोकोपयोगी योजनाएं भी गतवर्षो में चलाई गई हैं, जैसे-

1. मजदूरी रोजगार कार्यक्रम।

2. स्वरोजगार कार्यक्रम।

3. खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम।

4. सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम।

5. शहरी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम।

6. रोजगार के लिए कौशल भारत कार्यक्रम।

7. मनरेगा योजना।

इसके अलावा, भारत सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2005-06 से वर्ष 2016-17 के बीच की अवधि में कम-से-कम 271 मिलियन लोगों को 'बहुआयामी गरीबी' (Multi-dimensional Poverty) से बाहर निकाला गया है। वर्ष 2016-2017 तक गरीबी में रहने वाले लोगों की संख्या घटकर 369.55 मिलियन हो गई। शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में तेज़ी से गरीबी में कमी आई है।

स्पष्ट है, भारत त्वरित आर्थिक विकास और व्यापक सामाजिक सुरक्षा उपायों के माध्यम से अपने सभी रूपों में गरीबी को समाप्त करने के लिये एक व्यापक विकास रणनीति लागू कर रहा है।

• क्या गरीबी में जीवन यापन करना मानवाधिकारों का उल्लघंन है?

जी हां, मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा अधिकारों अनुच्छेद 25 के अनुसार "हर किसी को अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए पर्याप्त जीवन स्तर का अधिकार है, जिसमें भोजन, वस्त्र, आवास शामिल है और चिकित्सा देखभाल और आवश्यक सामाजिक सेवाएं, और बेरोजगारी, बीमारी, विकलांगता, विधवापन, वृद्धावस्था या उसके नियंत्रण से परे परिस्थितियों में आजीविका की अन्य कमी की स्थिति में सुरक्षा का अधिकार। "

उपरोक्त से स्पष्ट है गरीबी मानवाधिकारों का उलंघन है, क्योंकि इसके अनुसार हर मानव को समानता का अधिकार है हर क्षेत्र में चाहे वो आर्थिक संसाधन हो या सामाजिक संसाधन। इसके अलावा भारतीय विधि में भी समानता का नियम (rule of equality) स्थापित करते हुए आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्तियों के लिए विविध उपयोगकारी प्रावधान सम्मिलित किए गए हैं, जैसे-

1. संविधान का अनुच्छेद 14 हर व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता और समान संरक्षण प्रदान करता है।

2. अनुच्छेद 21- हर व्यक्ति को जीवन और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार। जिसके अंतर्गत व्यक्ति का उचित मापदंडों के अनुरूप मानवरूपी ढंग से जीना शामिल है न की पशुवत। इसी के साथ ही भोजन, आजीविका और आवास का अधिकार भी शामिल है, हालांकि इसे स्पष्ट रूप से उलेखित नहीं किया गया है।

3. अनुच्छेद 39A- आर्थिक रूप से तंग व्यक्तियों को राज्य मुफ्त विधिक परामर्श और समर्थन प्रदान करेगा।

4. दंड प्रक्रिया संहिता धारा 304- अभियुक्त का प्रतिनिधित्व किसी प्लीडर द्वारा नहीं किए जाने पर और कोर्ट को लगता है की उसके पास पर्याप्त संसाधन नहीं की वो एक प्लीडर नियुक्त कर सके तो उसके लिए ऐसी नियुक्ति कोर्ट स्वयं करेगा।

5. सिविल प्रक्रिया संहिता आदेश33/नियम18- केंद्र या राज्य सरकार उन व्यक्तियों के लिए ऐसे उचित कदम उठा सकती है, जो निर्धन है और वाद मूल्यांकन फीस का संदाय करने के अपर्याप्त साधन रखता है।

इन सबके अलावा भी माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा कई निर्णीत प्रकरणों में निर्धन गरीब व्यक्तियों के कल्याण हेतु आदेश व दिशानिर्देश जारी करते हुए जोर दिया कि "गरीबी तब पैदा होती है, जब बुनियादी जरूरतें खतरे में पड़ जाती है, जिसमें भोजन और अविजीविका में कमी आना प्रमुख है।

शायद यही कारण है की अनुच्छेद 21 की व्याख्या विस्तृत अर्थों में करते हुए इसके वे सारी सुविधाएं शामिल कर ली गईं हैं जो एक मनुष्य को जीवन जीने में सहयोगी है। सरकारों और राजनीतिक दलों में गरीबी उन्मूलन की इच्छाशक्ति से इस समस्या का समाधान हो सकता है इसलिये स्वरोजगार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।"

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