जानिए निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत नोटिस का नियम (Rule Of Notice)

Update: 2022-08-20 08:51 GMT

चेक बाउंस में मामलों में परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा138 में वर्णित "नोटिस" एक बहुत ही विशेष और महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसे यदि विधि में बताई रीति से पूरा नहीं किया जाता है तो इस संदर्भ में अभियुक्त के विरुद्ध कोई आपराधिक दायित्व उत्पन्न नहीं हुआ माना जायेगा और फलस्वरूप कोई कार्यवाही दायर नहीं की जा सकेगी।

ऐसा नोटिस इस धारा में चेक प्राप्तकर्ता (Holder Of The Cheque) की तरफ से, चेक जारीकर्ता (Drawer of the cheque) को एक स्पष्ट, लिखित सूचना हैं। यदि ड्रॉवर द्वारा चेक में वर्णित राशि का भुगतान विहित अवधि में नहीं किया जाता है तो होल्डर उसके विरूद्ध कानूनी कार्रवाई कर सकता है।

इस अधिनियम के उपबंध संक्षिप्त प्रक्रिया और कम खर्चीली कार्यवाही से सम्बंधित है। अतः स्पष्ट है यदि नोटिस के लिए बताए प्रावधानों का पालन नहीं किया गया है तो पीड़ित को इस अधिनियम में कोई उपचार प्राप्त नहीं होगा। बशर्ते उसे सिविल कार्यवाही या अन्य कार्यवाही का रुख करना पड़ेगा, जो कि उपरोक्त कार्यवाही से अधिक जटिल, खर्चीली और असहज हैं।

धारा 138 का सामान्य नियम (General Rule) कुछ इस प्रकार हैं-

138. खाते में धनराशि की अपर्याप्तता, आदि के लिए चेक का अनादर -जहां किसी व्यक्ति द्वारा किसी बैंकर के पास रखे गए खाते पर किसी अन्य व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति को किसी भी ऋण या अन्य दायित्व के पूर्ण या आंशिक रूप से निर्वहन के लिए भुगतान करने के लिए चेक किया गया चेक है, बैंक द्वारा अवैतनिक लौटाया गया, या तो उस खाते में जमा राशि के कारण चेक का सम्मान करने के लिए अपर्याप्त है या यह उस बैंक के साथ किए गए समझौते द्वारा उस खाते से भुगतान की जाने वाली राशि से अधिक है, ऐसा व्यक्ति करेगा अपराध किया हुआ माना जाएगा और इस अधिनियम के किन्हीं अन्य प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, के कारावास से दंडित किया जाएगा [एक अवधि जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या जुर्माने के साथ जो चेक की राशि से दोगुना हो सकता है, या दोनों के साथ) बशर्ते कि इस धारा में निहित कुछ भी तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि-

(ए) चेक बैंक को उस तारीख से छह महीने(अब तीन महीने)की अवधि के भीतर प्रस्तुत किया गया है जिस पर इसे जारी गया है या इसकी वैधता की अवधि के भीतर, जो भी पहले हो;

(बी) भुगतानकर्ता या धारक चेक के उचित समय में जैसा भी मामला हो, चेक के आहर्ता को लिखित रूप में नोटिस देकर उक्त राशि के भुगतान की मांग करता है, उसके भीतर बैंक से उसके द्वारा भुगतान न किए गए चेक की वापसी के संबंध में सूचना की प्राप्ति के तीस दिन; तथा

(सी) ऐसे चेक का आहर्ता उक्त नोटिस की प्राप्ति के पन्द्रह दिनों के भीतर, भुगतानकर्ता या धारक को, जैसा भी मामला हो, चेक के नियत समय में उक्त राशि का भुगतान करने में विफल रहता है।

स्पष्टीकरण.- इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "ऋण या अन्य दायित्व" का अर्थ कानूनी रूप से प्रवर्तनीय ऋण या अन्य दायित्व है।]

इस धारा में डिमांड नोटिस के सम्बंध में 3 प्रकार की आज्ञापक शर्तें बताई गई हैं, जैसे-

1. चेक प्राप्ति के 3 महीने के अंदर कितनी भी बार चेक को बैंक में उपस्थित किया जा सकता है और यदि ऐसा चेक बैंक द्वारा "पर्याप्त निधि नहीं हैं" (not sufficient fund) या बैंक के साथ किए करार से अधिक राशि है"(exceeds the amount) के आधार पर लिखित रसीद के साथ वापस कर दिया जाता है तो आरबीआई (Reserve Bank Of India) के दिशानिर्देशों के अनुसार इसे चेक का अनादरण माना जायेगा। सामान्य भाषा में कहे तो चेक होल्डर को बैंक द्वारा चेक राशि नहीं दी जाएगी, जिसका वह हकदार है। इसके अलावा बैंक द्वारा एक बैंक स्लिप या मीमो(Memo)जारी किया जाएगा। जो इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण होगा की चेक पेश गया था, परंतु वह बाउंस हो गया।

जैसे :- X ने M बैंक में Y द्वारा दिया 10 हजार का एक चेक पेश किया, Y के खाते में राशि मात्र 100 रुपए हैं। अब चेक का आदर करने के लिए पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण चेका का अनादर हो गया। अब M बैंक का यह दायित्व हैं कि वह X को इसकी सूचना देते हुए मेमो तैयार कर के जारी करे, जिस पर M बैंक की प्राधिकृत सील होगी और साथ ही चेक बाउंस होने का कारण भी लिखा जायेगा।

2. उपरोक्त दशा में चेक होल्डर के पास यह अवसर होगा की वो इसकी एक लिखित सूचना ड्रॉवर ऑफ़ द चेक को दे। और ऐसी सूचना चेक के मेमो प्राप्ति से 30 दिनों की अवधि के भीतर दी जाएगी।

3. उस सूचना में उल्लेख किया जायेगा कि सूचना मिलने के 15 दोनों के भीतर चेक में देय राशि का भुगतान किया जाए। यदि ऐसा भुगतान नहीं किया जाता तो 16वें दिन ड्रॉवर के विरूद्ध वाद हेतुक (Cause of action) उत्पन्न हो जाएगा अर्थात धारा138 का अपराध गठित हो गया, माना जायेगा। इस आधार पर होल्डर को शिकायत दर्ज करने का अधिकार प्राप्त होगा। इसके संबंध में दो परिस्थितियां निम्नलिखित हैं-

1. X ने Y को नोटिस भेजा जिसमें 15 दिनों में पैसा लौटाए जाने की मांग की गई। Y को नोटिस का ज्ञान होता है, और वह मांगी राशि का 15 दिनों के भीतर संदाय कर देता है। X, Y के विरूद्ध धारा 138 के अधीन शिकायत फाइल करने से वर्जित कर दिया जायेगा, क्योंकि Y ने वाद हेतुक पैदा होने से पूर्व ही राशि का भुगतान कर दिया।

ऐसा इसकारण है कि लिखित नोटिस द्वारा राशि की मांग करने का मुख्य उद्देश चेक जारीकर्ता को एक अवसर प्रदान करना है की वो चेक प्राप्तकर्ता की मांग पर राशि का भुगतान उसके विरुद्ध वाद हेतुक उत्पन्न होने से पहले ही कर दें, क्योंकि अंततः चेक की राशि को वसूलना ही उसका लक्ष्य हैं। यदि न्यायालय में कार्यवाही किए बिना ही पार्टी अपना भुगतान कर ले तो उन्हें कानूनी प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी और साथ ही में समय व साधनों की भी बचत होगी, इसीलिए अगर 15 दिनों में भुगतान कर दिया जाता हैं तो कोई वाद हेतुक नहीं बनेगा।

2. लेकिन, Y को नोटिस ज्ञान में आने के बाद भी मौन रहता हैं और कोई भुगतान नहीं करता तो अवश्य ही उसके विरुद्ध 15दिनों की समाप्ति के बाद वाद हेतुक उत्पन्न हुआ माना जाएगा। अब X उसके अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उसके विरुद्ध शिकायत फाइल कर सकता है।

अतः स्पष्ट हैं, मात्र और मात्र चेक अनादरण की तिथि से ही ड्रॉवर के विरुद्ध शिकायत फाइल करने का अधिकार उत्पन्न नहीं होता, बल्कि यह तब होता जब 138(c) में वर्णित 15दिनों की समाप्ति हो जाती हैं।

नोटिस भेजने के तरीके (Modes of service of Notice) -

• लिखत रूप में, जो कि धारा 138(b) में बताया एक सामान्य तरीका है। (General mode)

• टेलीग्राफिक प्रक्रिया द्वारा।

• धारा में विहित प्रक्रिया के बिना अपवादित दशाओं में समाचार पत्र में नोटिस का पब्लिकेशन किया जा सकता है। (के. राघवेंद्र रेड्डी,(1992)2 Crimes 140(141)(para 2)A.P.

• रजिस्टर पत्र (letter) द्वारा।

• ईमेल, व्हाट्सएप या फैक्स द्वारा। (SIL इंपोर्ट vs एक्जिम ऐड्स सिल्क रेक्सपोर्ट्स,1999(4)SCC 567.

अब, इस धारा के सम्बंध में स्थापित नियम बन गया है कि एक से अधिक चेक जारी किए जाने पर एक से ज्यादा डिमांड नोटिस भेजे जा सकते हैं। इस संदर्भ में जिस अंतिम डिमांड नोटिस का उत्तर 15दिनों में नहीं दिया जाएगा, वाद हेतुक उस तिथि से पैदा हुआ समझा जायेगा। अर्थात समाप्ति के बाद शिकायत फाइल की जा सकेगी।

नोटिस किसको भेजा जा सकेगा:-

• चेक जारीकर्ता को (Drawer)।

• जब अपराध कंपनी द्वारा किया जाए तब संस्था प्रधान को। आवश्यक नहीं है एक हर पार्टनर को व्यक्तिगत तौर पर भेजा जाए।

• फर्म की दशा में सक्रिय रूप से कारोबार का प्रबंधन करने वाले व्यक्ति को।

नोटिस की मुख्य तत्व :-

• नोटिस लिखित रूप में हो।

• चेक बेनेफीशियरी का नाम।

• चेक जारीकर्ता का नाम और पता।

• चेक को वापस किए जाने की तारीख का उल्लेख किया जायेगा।

• चेक को वापस लौटाए जाने के कारण का अभिलेखन।

• देय राशि की मांग करना आवश्यक होगा।

• और अंतिम, यह नोटिस धारा 138 में विहित शर्तों के अनुसार भेजा गया है, का उल्लेख करना महत्वपूर्ण होगा।

यदि चेक बेनेफीशियरी/चेकहोल्डर डिमांड नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट द्वारा चेकड्रोवर को प्रेषित करता है तो उसमें से वह एक कॉपी स्वयं के पास रख सकता और दूसरी वाली ड्रॉवर को भेज सकेगा।

जब नोटिस चेक प्राप्तकर्ता के वकील द्वारा भेजा जाए तब आवश्यक नहीं की उसके हस्ताक्षर हो।

सुमन सेठी vs अजय के. चूरीवाला,(2002)2 SCC,380 मामले में निम्न बिंदु निर्धारित किये गये -

• विधि का सिद्धांत है की नोटिस सदेव पूरा पढ़ा जाना चाहिए और पूर्ण रूप से लिखित होना चाहिए। उसकी भाषा सरल और समझने लायक हो, परंतु अपने लाभ हेतु उसकी विपरित व्याख्या नहीं की जानी चाहिए। ऐसे में परिवादी के लिए आवश्यक होगा कि उसे "said Amount" यानि चेक राशि की स्पष्ट और अभिव्यक्त मांग(Express demand) कर लेनी चाहिए।

• इसके साथ ही परिवादी द्वारा ब्याज, प्रतिकर, नुकसानी या खर्चों की मांग करने के आधार मात्र से नोटिस अवैध नहीं माना जायेगा।

• चेक राशि से ज्यादा राशि की मांग करना नोटिस को विधि की नजरों में गलत ठहराती हैं। (It is bad in eye of law)

30 दिनों की अवधि की गणना :

जिस दिन परिवादी (Holder of the cheque), को बैंक द्वारा जारी मेमो प्राप्त होती है उस दिन को अपवर्जित किया जायेगा। अर्थात उस दिन को छोड़ दिया जाएगा और उससे आगे वाले दिन से 30 दिनों की गणना प्रारंभ होगी। रायपति पावर जेनरेशन प्राइवेट लिमिटेड बनाम आई.आर.ई.डी.ए (दिल्ली हाईकोर्ट)

आवश्यक है कि परिवादी को मीमो की सूचना मिलना पर्याप्त नहीं है बल्कि मीमो की प्राप्ति(Actual Receipt) होना महत्वपूर्ण है। यदि मेमो की सूचना पहले मिल जाए, लेकिन रिसीव किसी अगले दिन किया जाए तो परिसीमा की गिनती उसी दिन से होगी।

जैसे: 1/1/22 परिवादी को बैंक द्वारा चेक के अनादर होने की SMS द्वारा सूचना मिली परंतु, बाउंस्ड चेक और मेमो  5/1/22 को दिया गया/ भेजा गया। तब इस दशा में 30 दिनों का परिसीमा काल 6/1/22 शुरू हुआ माना जाएगा।

एक अन्य और उदाहरण से हम और स्पष्ट समझ सकते है जैसे:-

23/3/22 तिथि पर परिवादी को चेक वापसी मीमो प्राप्त हुई। अब 30 दिनों के डिमांड नोटिस की गणना उसके आगे वाले दिन से शुरू होगी यानी 24/3/22 से शुरू होगी और खत्म 22/4/22 को मानी जाएगी। यदि डिमांड नोटिस 21/4/22 को भी ड्रॉवर को भेजा जाए, तब भी यह 30दिनों की परिसीमा के अधीन ही माना जाएगा और वैध (valid) होगा।

प्रकल्पित सूचना का सिद्धांत (Theory of Deemed Notice) :-

इस धारा को पढ़ने से स्पष्ट है कि, यदि शिकायतकर्ता अपने अधिकारों का लाभ लेना चाहता है तो उसे हर हालत में विहित रूप से बताए तरीकों से अभियुक्त को नोटिस भेजना ही होगा और यह आज्ञापक नियम हैं।

सीसी अल्वी हाज़ी बनाम पी मुहम्मद,(2007)6 SCC 555 मामले के अनुसार जब नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट द्वारा ड्रॉवर के सही पते पर भेज दिया जाता है। तब मान लिया जाता है कि धारा 138 में बताए तरीके से भेज दिया गया है। चाहे ऐसे गलत पते पर ही क्यों न भेजा गया हो या ड्रॉवर के ज्ञान में ही क्यों न आया हो। ऐसी परिस्थिति में साधारण खंड अधिनियम की धारा 27 और साक्ष्य अधिनियम की धारा 114,में वर्णित उपधारणा लागू होती है। जिसके अनुसार यदि नोटिस सही पते पर भेज दिया गया है तो माना जायेगा(deemed) की नोटिस की सर्विस प्रभावी रूप में हो चुकी हैं, परन्तु अभियुक्त को भी पूर्ण अवसर दिया जायेगा कि वह इस उपधारणा का खंडन करें। शिकायतकर्ता को भी साबित करे का अधिकार होगक कि अभियुक्त सम्यक तत्परता से वह नोटिस प्राप्त कर सकता था, इसकारण माना जाए की नोटिस उसके ज्ञान में हैं।

आइए इसे एक उदाहरण द्वारा समझते है। जैसे,

X (चेकहोल्डर) ने, Y को रजिस्टर्ड पोस्ट से मांग का नोटिस भेजा। जो कि " not available in house", "house is locked" या "shop is closed" जैसे पोस्टल पृष्ठकान के साथ वापस कर दिया जाता है। तब धारा 27 और 114 के अनुसार प्रभावी सर्विस उपधारित करली जायेगी और X के पास अधिकार होगा कि धारा142 NI Act, में बताई रीति से शिकायत फाइल कर सकता हैं।

यह भी बात महत्वपूर्ण है कि यदि शिकायतकर्ता, अभियुक्त के सही पते का ज्ञान नहीं रखता है तो वह इस धारा के अधीन कोई उपचार पाने का अधिकारी नहीं होगा। लेकिन वह उसके विरुद्ध अन्य कार्यवाही अपना सकता है। जैसे धारा 415,420 दंड संहिता के अधीन आपराधिक कार्यवाही कर सकता है या सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन आदेश 37 में धन की वसूली का वाद ला सकेगा है।

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