पति का पत्नी को उसके वर्कप्लेस पर बदनाम करना, सहकर्मियों के सामने उसकी पवित्रता पर सवाल उठाना मानसिक क्रूरता: कलकत्ता हाईकोर्ट
कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई पति अपनी पत्नी को उसके वर्कप्लेस पर बदनाम करता है, उसकी पवित्रता पर सवाल उठाता है और सहकर्मियों के सामने उसे गाली देता है, तो यह मानसिक क्रूरता है जिसके आधार पर शादी खत्म की जा सकती है।
जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी जीवनसाथी द्वारा सार्वजनिक अपमान, चरित्र हनन और पेशेवर बदनामी किसी व्यक्ति की गरिमा और मानसिक शांति पर सीधा हमला है। इसे मामूली वैवाहिक कलह कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
कोर्ट एक महिला डॉक्टर द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के तहत तलाक के लिए उसके मुकदमे को खारिज कर दिया। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसका पति बार-बार कुर्सियांग में उसके अस्पताल आता था, सहकर्मियों के सामने उसे गाली देता था, उसकी पवित्रता के बारे में अफवाहें फैलाता था, और उसे गंभीर परिणामों की धमकी देता था।
फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल जज के रवैये की कड़ी आलोचना की, जिन्होंने पत्नी के बयान पर इस आधार पर विश्वास नहीं किया कि वह सहायक गवाह पेश नहीं कर सकी।
बेंच ने कहा कि पत्नी ने वास्तव में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए अपने सहकर्मियों से पूछताछ करने की अनुमति मांगी थी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने बुनियादी ढांचे की कमी का हवाला देते हुए एक लाइन के आदेश में अनुरोध को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने कहा,
"जब सम्मानित ट्रायल जज ने खुद ही बुनियादी ढांचे की कमी के कमजोर आधार पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए मौखिक सबूत देने की अनुमति देने से इनकार कर दिया, तो वह सबूत पेश न करने के उसी आधार पर अपीलकर्ता-पत्नी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष नहीं निकाल सकते थे।"
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे रवैये से पत्नी को गंभीर नुकसान हुआ और यह क्रूरता साबित करने का उचित अवसर देने से इनकार करने जैसा था।
कोर्ट ने नॉन-ट्रैवर्स के सिद्धांत पर भी यह देखते हुए भरोसा किया कि पति के लिखित बयान में गंभीर आरोपों का केवल सीधा और टालमटोल वाला खंडन था।
पत्नी ने विशेष रूप से कहा कि पति ने उसके वर्कप्लेस पर उसे गाली दी, उसकी पवित्रता के बारे में अफवाहें फैलाईं और उसे डराया-धमकाया। हालांकि, पति ने बिना कोई सार्थक स्पष्टीकरण दिए इन आरोपों से इनकार कर दिया।
बेंच ने कहा,
"इस प्रकार, विशिष्ट और स्पष्ट आरोपों से इनकार... ज़्यादा से ज़्यादा टालमटोल वाला है। इसलिए नॉन-ट्रैवर्स के सिद्धांत से आरोप किसी भी स्थिति में स्थापित होते हैं।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रोफेशनल माहौल में जीवनसाथी को अपमानित करने का मनोवैज्ञानिक असर बहुत गहरा होता है।
कोर्ट ने कहा,
"पति द्वारा पत्नी को उसके वर्कप्लेस पर बदनाम करने की लगातार कोशिशों के आरोप... मानसिक क्रूरता का सबसे गंभीर रूप हैं।"
यह भी कहा कि प्रोफेशनल गरिमा किसी व्यक्ति की पहचान का एक ज़रूरी हिस्सा होती है।
सबूतों की जांच करने के बाद कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि पत्नी ने क्रूरता और परित्याग दोनों को सफलतापूर्वक साबित कर दिया।
अपील को मंज़ूर करते हुए बेंच ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और तलाक का आदेश दे दिया।
कोर्ट ने नाबालिग बेटे के संबंध में पति को मिलने का अधिकार भी दिया और बच्चे की भलाई की सुरक्षा के लिए एक विस्तृत शेड्यूल तय किया।
Case Title: Dr. Soma Mandal Debnath v. Sri Tanmoy Debnath