चार्जशीट दाखिल होना जमानत का आधार नहीं: कलकत्ता हाइकोर्ट ने POCSO आरोपी की जमानत रद्द की

Update: 2026-03-03 09:48 GMT

कलकत्ता हाइकोर्ट ने 14 वर्षीय बालिका से कथित गंभीर दुष्कर्म के मामले में आरोपी kr जमानत रद्द करते हुए स्पष्ट किया कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने के आधार पर POCSO जैसे गंभीर मामलों में जमानत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि जमानत का विवेक स्वतः या रूटीन में नहीं, बल्कि आरोपों की गंभीरता, पीड़िता की संवेदनशीलता और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

जस्टिस बिवास पट्टनायक ने सेशंस कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि जमानत आदेश में स्पष्ट रूप से विचार का अभाव दिखाई देता है। अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि जिस अदालत ने पहले अपराध की गंभीरता को देखते हुए अग्रिम और नियमित जमानत याचिकाएं खारिज की थीं, उसी ने मात्र दस दिनों के भीतर केवल चार्जशीट दाखिल होने के आधार पर जमानत दी।

मामला एगरा थाने में दर्ज एक शिकायत से जुड़ा है। पीड़िता की मां ने आरोप लगाया कि उसकी नाबालिग बेटी का अंग्रेजी शिक्षक जो एक नागरिक स्वयंसेवक भी था, बार-बार यौन शोषण कर रहा था। प्रकरण में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(3) तथा POCSO Act की धारा 6 के तहत FIR दर्ज की गई। आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज हो गई और आत्मसमर्पण के बाद नियमित जमानत भी अस्वीकृत कर दी गई। किंतु चार्जशीट दाखिल होने के बाद सेशंस कोर्ट ने उसे जमानत दी, जिसके विरुद्ध शिकायतकर्ता ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाइकोर्ट के समक्ष शिकायतकर्ता ने तर्क दिया कि जांच जल्दबाजी में पूरी की गई आवश्यक साक्ष्य एकत्र नहीं किए गए और रिहाई के बाद आरोपी ने पीड़िता को धमकाया। यह भी कहा गया कि ट्रायल अदालत ने अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज करते हुए चार्जशीट दाखिल होने को ही निर्णायक मान लिया।

आरोपी की ओर से यह आपत्ति उठाई गई कि जमानत निरस्तीकरण का आवेदन पहले ही ट्रायल कोर्ट द्वारा खारिज किया जा चुका है इसलिए याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। इस पर हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने और विधि विरुद्ध या त्रुटिपूर्ण जमानत आदेश को निरस्त करने में अंतर है। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439(2) के तहत हाइकोर्ट स्वतंत्र रूप से यह जांच सकता है कि मूल जमानत आदेश गंभीर त्रुटियों से ग्रस्त है या नहीं।

अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए धारा 164 के अंतर्गत दर्ज पीड़िता के बयान को महत्वपूर्ण माना, जिसमें उसने शिक्षक पर बार-बार दुष्कर्म, अश्लील तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए। उसने आत्महत्या का प्रयास करने की बात भी कही थी। अदालत ने कहा कि POCSO मामलों में बाल पीड़िता का बयान विशेष महत्व रखता है और उसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।

अदालत ने टिप्पणी की कि जमानत आदेश में अपराध की प्रकृति, संभावित दंड की कठोरता, गवाहों को प्रभावित करने की आशंका और समाज पर प्रभाव जैसे पहलुओं पर कोई गंभीर विचार नहीं किया गया। गंभीर अपराधों में जमानत आदेश कारणयुक्त होना चाहिए, विशेषकर तब जब आरोप बच्चों के विरुद्ध हों।

अंततः हाइकोर्ट ने सेशंस अदालत का आदेश “विकृत और विधिसम्मत न होने” के आधार पर रद्द कर दिया तथा आरोपी को दस दिनों के भीतर ट्रायल अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। ऐसा न करने पर उसके विरुद्ध कठोर कार्रवाई किए जाने की बात कही गई।

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