पांच वर्ष के सहमति आधारित संबंध के बाद शादी से इनकार मात्र से दुष्कर्म का मामला नहीं बनता: कलकत्ता हाइकोर्ट ने मामला रद्द किया

Update: 2026-02-17 06:59 GMT

कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा कि दो वयस्कों के बीच लंबे समय तक चले सहमति आधारित संबंध को केवल इसलिए दुष्कर्म के मामले में नहीं बदला जा सकता, क्योंकि बाद में संबंध खराब हो गया या विवाह नहीं हो सका।

अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 417, 376, 313 और 506 के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

जस्टिस चैतालि चटर्जी दास ने अभियुक्त अनिर्बान मुखर्जी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों के बीच लगभग पांच वर्षों तक सहमति से संबंध रहा। इस दौरान वे साथ यात्रा करते रहे, होटलों में ठहरे और पति-पत्नी की तरह रहे। ऐसे में “तथ्य की गलत धारणा” या सहमति के अभाव का आरोप टिकता नहीं है।

अभियोजन का आरोप

शिकायतकर्ता के अनुसार वर्ष 2017 में दोनों के बीच प्रेम संबंध शुरू हुआ। 2018 में आरोपी ने कथित रूप से उसे शराब पिलाकर यौन शोषण किया। बाद में विवाह का आश्वासन देकर संबंध जारी रखा।

शिकायतकर्ता का कहना था कि वह आरोपी के साथ दीघा और गोवा सहित कई स्थानों पर गई गर्भवती हुई और आरोपी ने गर्भपात के लिए मजबूर किया। बाद में विवाह से इनकार कर निजी तस्वीरें प्रसारित करने की धमकी दी गई।

इन आरोपों के आधार पर आरोपपत्र दायर किया गया, जिसके बाद आरोपी ने कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

अदालत की टिप्पणी

अदालत ने केस डायरी, CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान मेडिकल अभिलेख और यात्रा विवरण की जांच की। पाया गया कि 2017 से 2022 तक दोनों के बीच घनिष्ठ संबंध रहे और इस अवधि में कोई समकालीन शिकायत दर्ज नहीं कराई गई।

गर्भपात शिकायतकर्ता की सहमति से हुआ और आरोपी ने अभिभावक के रूप में हस्ताक्षर भी किए। अदालत ने यह भी नोट किया कि 2018 में कथित यौन शोषण का आरोप लगाने के बावजूद शिकायतकर्ता आरोपी के साथ लगातार यात्रा करती रही और साथ रहती रही, जिससे अभियोजन का जबरदस्ती या भ्रम का दावा कमजोर होता है।

अदालत ने कहा,

“विवाह का झूठा वादा तभी सहमति को अमान्य कर सकता है, जब वह प्रारंभ से ही धोखे की नीयत से किया गया हो। बाद में संबंध टूट जाने या विवाह न होने से पूर्व की सहमति स्वतः अवैध नहीं हो जाती।”

अदालत ने स्पष्ट किया कि IPC की धारा 90 के तहत तथ्य की गलत धारणा का आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं है।

दुरुपयोग रोकने के सिद्धांत

अदालत ने यह भी कहा कि यदि आरोपों को प्रथम दृष्टया सही मान भी लिया जाए तब भी दुष्कर्म या जबरन गर्भपात का अपराध नहीं बनता। धारा 417 और 506 के आरोपों के लिए भी आवश्यक आधारभूत तत्व नहीं पाए गए।

मामले को अदालत की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग बताते हुए हाइकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट पश्चिम मेदिनीपुर की अदालत में लंबित पूरी कार्यवाही रद्द की।

कलकत्ता हाइकोर्ट ने दोहराया कि असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मुकदमे में बदलना कानून का उद्देश्य नहीं है।

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