मोबाइल फ़ोन/व्हाट्सएप से समन भेजना BNSS के तहत मान्य: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कांस्टेबल पर लगाया गया जुर्माना रद्द किया

Update: 2026-02-18 05:09 GMT

एक अहम आदेश में बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि इलेक्ट्रॉनिक तरीके से या मोबाइल फ़ोन से भी समन भेजना कानूनी होगा, क्योंकि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के नियमों के तहत इसकी इजाज़त है।

नागपुर सीट पर बैठी सिंगल-जज जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के ने स्पेशल POCSO कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें कांस्टेबल पर बाल शोषण के मामले में सरकारी गवाहों को मोबाइल फ़ोन, खासकर WhatsApp के ज़रिए समन भेजने पर जुर्माना लगाया गया।

21 जनवरी के आदेश को चुनौती देते हुए पब्लिक प्रॉसिक्यूटर डीवी चौहान ने बताया कि स्पेशल POCSO कोर्ट ने कानून के नियमों यानी BNSS की धारा 70 और धारा 530 को नज़रअंदाज़ किया।

जस्टिस जोशी-फाल्के ने फिर प्रॉसिक्यूटर के बताए प्रोविज़न का ज़िक्र किया और कहा कि हां, BNSS की धारा 70 को देखते हुए बदला हुआ प्रोविज़न है, जो ऐसे मामलों में सर्विस के प्रूफ़ से जुड़ा है जब सर्विंग ऑफिसर मौजूद नहीं होता है।

जज ने 12 फरवरी को पास किए गए ऑर्डर में कहा,

"उप-धारा (3) में खास तौर पर कहा गया कि धारा 64 से 71 के तहत इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन के ज़रिए सर्व किए गए सभी समन को सही तरह से सर्व किया हुआ माना जाएगा। ऐसे इलेक्ट्रॉनिक समन की एक कॉपी को अटेस्ट करके समन की सर्विस के प्रूफ़ के तौर पर रखा जाएगा। साथ ही BNSS की धारा 530 भी इलेक्ट्रॉनिक मोड में होने वाले ट्रायल और प्रोसिडिंग्स के पहलू से जुड़ा है। इन प्रोविज़न को देखने के बाद पता चलता है कि अब BNSS में हुए अमेंडमेंट से इलेक्ट्रॉनिक मोड को बहुत अच्छी तरह से एक्सेप्ट किया गया।"

जज ने क्रॉस टेलीविज़न इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम विख्यात चित्र प्रोडक्शन (2017) के फैसले का ज़िक्र किया और कहा कि उस मामले में हाईकोर्ट ने समन का मकसद समझाया और यह सिर्फ इतना है कि यह बात उस व्यक्ति के ध्यान में लाई जाए जिसे यह नोटिस मिल रहा है।

जज ने आदेश में कहा,

"सर्विस का मकसद दूसरी पार्टी को नोटिस देना और उसे पेपर्स की एक कॉपी देना है। यह तरीका निश्चित रूप से बेमतलब है। यहां इस मामले में भी चूंकि कम्युनिकेशन पहले से ही था, क्योंकि शुरू में समन पहले ही सर्व हो चुका था और गवाहों को बॉन्ड ओवर हो चुका था, इसलिए कांस्टेबल द्वारा मोबाइल फोन के जरिए तारीख की जानकारी के बारे में कम्युनिकेशन निश्चित रूप से गैर-कानूनी नहीं है, यह सिर्फ वह मकसद था जिसे देखा जाना जरूरी था और अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा मोबाइल सर्विस BNSS की धारा 70 के मद्देनजर पहले से ही स्वीकार की जाती है।"

स्पेशल POCSO कोर्ट, जस्टिस जोशी-फाल्के ने कहा, जाहिर तौर पर उस प्रोविजन को नजरअंदाज किया और विवादित आदेश पास किया और कांस्टेबल पर बेवजह जुर्माना लगाया गया।

इन बातों के साथ जज ने स्पेशल POCSO कोर्ट का ऑर्डर रद्द किया, जिसमें कांस्टेबल पर मोबाइल फ़ोन से समन भेजने के लिए जुर्माना लगाया गया।

Case Title: State of Maharashtra vs Satish Sanjay Ramteke (Criminal Application 222 of 2026)

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