वकील का काम विवाद सुलझाना है, मुवक्किल को 'लूटना' नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

Update: 2026-03-12 15:18 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि समाज में वकील की भूमिका लोगों के विवादों का समाधान निकालने में मदद करना है, न कि उनसे पैसे लूटना। अदालत ने यह टिप्पणी उस समय की जब उसने एक वकील के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया।

जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के की एकल पीठ ने अकोला के मुरतिजापुर निवासी अधिवक्ता सचिन वानखेड़े द्वारा दायर याचिका खारिज कर दी। वानखेड़े पर आरोप है कि उन्होंने अपने मुवक्किल को यह कहकर 1.25 लाख रुपये रिश्वत देने के लिए राजी किया कि जेल में उसके बेटे को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

अदालत ने कहा कि भले ही वकील भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 2(c) के तहत “लोक सेवक” की परिभाषा में नहीं आते, लेकिन उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम, 1961 में निर्धारित आचरण और नैतिकता के मानकों का पालन करें।

कोर्ट ने कहा कि वकालत एक “सम्मानित और सेवा-प्रधान पेशा” है और अधिवक्ताओं को अदालत के अधिकारी और समाज के जिम्मेदार नागरिक के रूप में ईमानदारी, निष्पक्षता और नैतिकता के उच्चतम मानकों का पालन करना चाहिए।

न्यायालय ने कहा, “वकील का मूल कार्य समाज में लोगों को विवादों का समाधान खोजने में मदद करना है और यह विश्वास पैदा करना है कि वकील से सलाह लेने से समस्याओं से बचा जा सकता है, न कि उनकी आर्थिक हानि हो।”

मामला क्या था

यह मामला राजेश खांबे की शिकायत से जुड़ा है, जिन्होंने अपने बेटे के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म मामले में पैरवी के लिए वकील सचिन वानखेड़े को नियुक्त किया था।

आरोप है कि मुकदमे के दौरान वानखेड़े ने खांबे को बताया कि जेल के दो पुलिस अधिकारियों ने पहले 5 लाख रुपये की मांग की थी, लेकिन बाद में 1.25 लाख रुपये में समझौता कर लिया ताकि उसके बेटे को जेल में बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

खांबे की शिकायत पर पुलिस ने जांच की और वानखेड़े का वॉयस सैंपल परीक्षण कराया, जो शिकायतकर्ता द्वारा रिकॉर्ड की गई ऑडियो से मेल खाता पाया गया।

अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्य भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 15 के तहत अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन धारा 12 (भ्रष्टाचार के अपराध में सहायता) के तहत मामला बनता है।

साथ ही अदालत ने यह दलील भी खारिज कर दी कि दोनों पक्षों ने आपस में समझौता कर लिया है।

अंत में कोर्ट ने कहा कि वकीलों से जिस ईमानदारी और निष्ठा की अपेक्षा की जाती है, उसके अनुरूप आरोपी का आचरण नहीं है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने से इनकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।

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