अपराध से सीधे जुड़ाव के बिना पुलिस CrPC की धारा 102 के तहत बैंक अकाउंट ज़ब्त नहीं कर सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट

Update: 2026-05-14 03:54 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस, ज़ब्त की गई संपत्ति और कथित अपराध के बीच सीधा संबंध साबित किए बिना दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 102 के तहत बैंक अकाउंट्स को फ्रीज़ या ज़ब्त नहीं कर सकती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अकाउंट्स को डी-फ्रीज़ करने का निर्देश देते समय फ्रीज़ की गई राशि के बराबर बैंक गारंटी देने की एक भारी शर्त लगाना, डी-फ्रीज़िंग के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है।

जस्टिस एन.जे. जमादार दो आपराधिक याचिकाओं की सुनवाई कर रहे थे। ये याचिकाएं अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा पारित एक आदेश से उत्पन्न हुई थीं, जिसमें आरोपी के बैंक अकाउंट्स और म्यूचुअल फंड यूनिटों को डी-फ्रीज़ करने का निर्देश दिया गया, लेकिन यह शर्त रखी गई थी कि आरोपी 6.55 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी दे।

एक याचिका पहले शिकायतकर्ता (First Informant) ने दायर की थी, जिसमें अकाउंट्स को डी-फ्रीज़ करने के फैसले को ही चुनौती दी गई; जबकि दूसरी याचिका आरोपी नंबर 2 ने दायर की थी, जिसमें बैंक गारंटी देने की शर्त को चुनौती दी गई। आरोपी ने तर्क दिया कि फ्रीज़ किए गए अकाउंट्स और कथित अपराधों के बीच किसी भी प्रकार का कोई संबंध नहीं था। यह तर्क दिया गया कि धारा 102 केवल उस संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार देती है, जिसका जांच के अधीन अपराध से सीधा संबंध हो, न कि किसी ऐसी संपत्ति को जो केवल आरोपी की हो।

कोर्ट ने CrPC की धारा 102 के दायरे की जांच की और टिप्पणी की कि, यद्यपि बैंक अकाउंट धारा 102 के तहत "संपत्ति" की श्रेणी में आते हैं। फिर भी उन्हें ज़ब्त करने की शक्ति का प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब संपत्ति और कथित अपराध के घटित होने के बीच कोई सीधा संबंध मौजूद हो।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि ज़ोर संपत्ति की प्रकृति (Character) पर होना चाहिए, न कि अपराध में शामिल व्यक्तियों के साथ उसके जुड़ाव पर। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि केवल वही संपत्ति ज़ब्त की जा सकती है जिसके बारे में यह आरोप हो या संदेह हो कि वह चोरी की है, अथवा ऐसी संपत्ति जो उन परिस्थितियों में पाई गई हो, जिनसे किसी अपराध के घटित होने का संदेह पैदा होता हो।

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि धारा 102 का उद्देश्य जांच और साक्ष्य जुटाने में सहायता करना है; यह शिकायतकर्ता के लिए किसी प्रकार की वसूली सुनिश्चित करने का माध्यम नहीं है, और न ही यह किसी संपत्ति को ऐसे व्यक्ति को सौंपने का ज़रिया है जिसे जांच एजेंसी उसका वैध स्वामी मानती हो।

कोर्ट ने कहा,

“हालांकि धारा 102(1) के टेक्स्ट में “कोई भी संपत्ति” शब्द का इस्तेमाल किया गया, जिसे पुलिस अधिकारी ज़ब्त कर सकता है। फिर भी संपत्ति ज़ब्त करने की शक्ति उन शब्दों से मिलती है, जो इसके बाद आते हैं, यानी, “यह आरोप या शक कि ऐसी संपत्ति चोरी की है” या “यह ऐसी परिस्थितियों में मिली है, जिनसे किसी अपराध के होने का शक पैदा होता है”। ज़ब्त की गई संपत्ति और जिस अपराध के होने का आरोप है, उनके बीच सीधा संबंध होना चाहिए।”

कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से पहली नज़र में फ़्रीज़ किए गए बैंक अकाउंट्स और म्यूचुअल फ़ंड तथा कथित अपराधों के बीच ज़रूरी संबंध साबित नहीं होता। मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई शर्त के बारे में कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि 6.55 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी देने की शर्त रखना, असल में खातों को अन-फ़्रीज़ करने की अर्ज़ी को ही ठुकराने जैसा था। कोर्ट ने कहा कि ऐसी भारी शर्त अकाउंट्स को अन-फ़्रीज़ करने के असल मकसद को ही नाकाम कर देती है।

यह मानते हुए कि सिर्फ़ वाजिब शर्तें ही लगाई जा सकती हैं, कोर्ट ने आदेश में बदलाव करते हुए अकाउंट्स को अन-फ़्रीज़ करने का निर्देश दिया, लेकिन शर्त यह रखी कि बैंक गारंटी के बजाय एक क्षतिपूर्ति बांड (Indemnity Bond) दिया जाए।

इसके मुताबिक, कोर्ट ने पहले शिकायतकर्ता द्वारा दायर अर्ज़ी खारिज की और आरोपी नंबर 2 द्वारा दायर अर्ज़ी को आंशिक रूप से मंज़ूर कर लिया, जिसमें अकाउंट्स को अन-फ़्रीज़ करने के लिए लगाई गई शर्त में बदलाव किया गया।

Case Title: Geeta Kampani v. State of Maharashtra with Parag Shah v. Geeta Kampani [Criminal Application No.790 of 2024 with Criminal Application No.191 of 2024]

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