मुकेश अंबानी की रिलायंस के खिलाफ कथित 'गैस चोरी' की याचिका प्रक्रिया का दुरुपयोग, इससे प्रतिष्ठा को नुकसान होता है: बॉम्बे हाईकोर्ट
कथित 'गैस चोरी' मामले में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) और उसके निदेशक मुकेश धीरूभाई अंबानी के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) जांच की मांग वाली याचिका खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को कहा कि ऐसी याचिकाएं इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकती हैं और उनकी वर्तमान या भविष्य की व्यावसायिक साझेदारियों के लिए खतरा बन सकती हैं।
गौरतलब है कि जितेंद्र मारू नाम के कार्यकर्ता ने RIL और अंबानी के खिलाफ CBI जांच की मांग की थी। आरोप था कि उन्होंने आंध्र प्रदेश के तट से दूर कृष्णा गोदावरी बेसिन में पड़ोसी तेल और प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) के कुओं से 1.55 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की प्राकृतिक गैस चुराई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज किया कि मारू 'साफ हाथों' (नेक इरादे से) अदालत में नहीं आए।
चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर और जस्टिस सुमन श्याम की खंडपीठ ने कहा कि यह याचिका 'जनहित में नहीं' थी, बल्कि इसमें 'निजी हित' शामिल था।
जजों ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"इस याचिका के पीछे जो कथित कारण और उद्देश्य है - जिसे जनहित का चोला पहनाया गया - वह केवल दिखावटी बातें हैं।" उन्होंने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता मारू, हालांकि खुद को कार्यकर्ता बताते हैं, लेकिन पहले प्लास्टिक बेचने के कारोबार में लगे थे। हालांकि, वह इस तरह के कारोबार का कोई भी विवरण देने में असमर्थ रहे।
जजों ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि मारू यह समझाने में विफल रहे कि उन्होंने किस तरह की सामाजिक गतिविधियां कीं, क्योंकि वह खुद को एक समाज सेवक बताते थे। इसलिए अदालत ने यह राय व्यक्त की कि यह याचिका किसी 'जनहित के मुद्दे' को उठाने के उद्देश्य से दायर नहीं की गई।
खंडपीठ ने कहा,
"यह रिट याचिका जनहित याचिका (PIL) की प्रकृति की, जो किसी भी सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा नहीं करती। रिट याचिका में सार्वजनिक कानून से जुड़ा कोई तत्व होना अनिवार्य है, क्योंकि हाईकोर्ट केवल सार्वजनिक कानून से संबंधित पहलुओं पर विचार करने के बाद ही कोई निर्णय लेता है।"
चीफ जस्टिस चंद्रशेखर द्वारा लिखे गए इस फैसले में हाई कोर्ट्स के उस 'अनुभव' पर जोर दिया गया, जिसके अनुसार इस तरह की रिट याचिकाएं - या जनहित याचिका का रूप धारण करने वाली याचिकाएं - अक्सर किसी असफल प्रतिस्पर्धी, किसी प्रतिद्वंद्वी कारोबारी घराने, या किसी 'असंतुष्ट व्यक्ति' के इशारे पर दायर की जाती हैं।
चीफ जस्टिस ने अपने आदेश में कहा,
"इस तरह की याचिका किसी भी कॉर्पोरेट संस्था की प्रतिष्ठा और व्यावसायिक संभावनाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाती है। इस तरह के प्रयास में एक अंतर्निहित खतरा होता है, जो किसी भी कॉर्पोरेट संस्था के व्यावसायिक भागीदारों के मन में घर कर सकता है। इस प्रकार, वर्तमान या भविष्य की व्यावसायिक साझेदारी को खतरे में डाल सकता है।"
जजों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह रिट याचिका स्पष्ट रूप से न्यायालय की प्रक्रिया का दुरुपयोग थी।
जजों ने अपनी राय व्यक्त की,
"याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता ने ONGC के कुओं से संबंधित अपराध के बारे में जानकारी समाचार पत्र की रिपोर्ट से जुटाई थी। केवल इसलिए कि याचिकाकर्ता इस रिट याचिका में कुछ आरोप लगाता है, वह कानून के तहत यह दावा नहीं कर सकता कि उसे चौथे प्रतिवादी, उसके अधिकारियों, निदेशकों आदि के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करवाने का अधिकार है।"
जजों ने RIL और भारत संघ के बीच विवाद शुरू होने के एक दशक से भी अधिक समय बाद न्यायालय का दरवाजा खटखटाने के लिए मारू द्वारा दिए गए औचित्य को 'झूठा स्पष्टीकरण' करार दिया।
जजों ने कहा कि 24 जुलाई, 2018 का मध्यस्थता निर्णय (Arbitral Award), जो शुरू में RIL के पक्ष में दिया गया, दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ द्वारा पलट दिया गया और अब वह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। याचिकाकर्ता इस तथ्य का उल्लेख अपनी याचिका में करने में विफल रहा; जिस पर RIL ने दावा किया कि यह मारू की ओर से 'तथ्यों को छिपाने' का प्रयास था।
याचिका खारिज करते हुए जजों ने कहा,
"रिट न्यायालय का दरवाजा खटखटाने वाले व्यक्ति को अपनी नेकनीयती (Bona Fides) साबित करनी चाहिए। उसे न्यायालय के समक्ष पूरी तरह से साफ-सुथरे इरादों के साथ आना चाहिए, न कि 'दागदार हाथों' के साथ, जिसने न्यायालय से महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया हो। उसे प्रथम दृष्टया यह भी प्रदर्शित करना चाहिए कि वह याचिका में मांगी गई राहतों का हकदार है। यह रिट याचिका हर कसौटी पर विफल रही है और इसे एक दूषित मकसद के साथ दायर किया गया।"
Case Title: Jitendra Punamchand Maru vs Central Bureau of Investigation (Criminal Writ Petition 5542 of 2025)