यौन अपराधों की पीड़ित महिलाओं को हिम्मत जुटाने में समय लगता है: बॉम्बे हाईकोर्ट ने देरी के आधार पर FIR रद्द करने से किया इनकार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक घरेलू सहायिका के साथ छेड़छाड़ (धारा 354 - महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाना) के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि यौन अपराधों के मामले में केवल देरी के आधार पर FIR रद्द नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि पीड़ित महिला को शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत जुटाने में समय लगता है, क्योंकि उसे सामाजिक बदनामी और 'असहज सवालों' का सामना करने का डर होता है।
सिंगल-जज जस्टिस रंजीतसिंह भोंसले ने नंदकुमार पनिकर के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने से इनकार किया। पनिकर मूल रूप से केरल के रहने वाले हैं, लेकिन अपराध के समय मुंबई के कांदिवली इलाके में रहते थे।
पनिकर पर आरोप है कि उन्होंने पहले पीड़ित महिला से पूछा कि "क्या उसका पति कमज़ोर है" और फिर 10 मार्च 2019 को, जब महिला बर्तन धो रही थी, तो उन्होंने उसे पीछे से पकड़ा, उसकी साड़ी खींची और उसके ब्रेस्ट को दबाया। वह किसी तरह उनकी पकड़ से छूटकर उनके फ्लैट से बाहर निकली और शाम को अपने पति को घटना के बारे में बताया। हालांकि, आरोपी ने अपने खिलाफ FIR दर्ज कराने में हुई 21 दिन की देरी और इसके लिए कोई उचित कारण न बताए जाने का मुद्दा उठाया और कोर्ट से FIR रद्द करने की अपील की।
जस्टिस भोंसले ने 10 जून को सुनाए गए आदेश में कहा,
"देरी के कारण अलग-अलग हो सकते हैं। ऐसे मामलों में देरी के कई कारण हो सकते हैं। ऐसे मामलों के साथ सामाजिक बदनामी जुड़ी होती है और कई बार शिकायतकर्ता को असहज सवालों और सामाजिक बदनामी की आशंका के कारण शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत जुटाने में कुछ समय लग सकता है। सिर्फ़ इसलिए कि कुछ दिनों की देरी का कारण नहीं बताया गया, आपराधिक केस को खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।"
जज ने कहा कि आपराधिक केस को खारिज करने का आधार बनने के लिए देरी काफी लंबी और बिना किसी कारण के होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि देरी को अपराध को ध्यान में रखकर ही समझा, उस पर विचार किया और उसका अर्थ निकाला जाना चाहिए। बिना कारण हुई देरी को किस तरह देखा जाए, यह काफी हद तक अपराध की प्रकृति, पीड़ित की उम्र और पीड़ित किस सामाजिक वर्ग से है, इस पर निर्भर करता है।
जस्टिस भोंसले ने ज़ोर देकर कहा,
"मेरी राय में इसके लिए कोई एक तय फ़ॉर्मूला नहीं हो सकता। IPC की धारा 354, यौन अपराधों, POCSO Act या IPC की धारा 498-A जैसे अपराधों के मामलों में देरी को उस घटना के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर समझा और परखा जाना चाहिए। हमारे जैसे पारंपरिक समाज में दुर्भाग्य से कई परिवारों के लिए ऐसे अपराधों के मामले में असली आपराधिक केस शुरू करना भी बहुत मुश्किल होता है। मेरी नज़र में ऐसे मामलों में सिर्फ़ देरी के आधार पर आपराधिक केस रद्द नहीं किया जा सकता। देरी बहुत ज़्यादा होनी चाहिए और उस पर आस-पास की परिस्थितियों के साथ विचार किया जाना चाहिए।"
जज ने कहा कि देरी का कारण उचित है या नहीं, यह हर मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा और देरी की उचितता आरोपों की प्रकृति और गंभीरता तथा संबंधित परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
जज ने कहा,
"मेरी राय में महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों और इसी तरह के मामलों में आपराधिक केस को सिर्फ़ बिना वजह देरी के आधार पर ख़ारिज नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि देरी का कारण कोई बुरी नीयत, व्यक्तिगत बदला या प्रतिशोध न हो, जो पहली नज़र में साबित हो रहा हो और रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से दिख रहा हो।"
जज ने आरोपी की इस दलील पर भी ध्यान दिया कि जांच अधिकारी CrPC की धारा 164(5A) के तहत पीड़िता का बयान दर्ज करने में नाकाम रहे। इस तरह कानून के आदेश का पालन नहीं किया, इसलिए FIR टिक नहीं सकती। हालांकि, जज ने गौर किया कि जिस प्रावधान का हवाला आरोपी ने दिया, उसमें उस प्रावधान के तहत बयान 'दर्ज न करने के असर' के बारे में कुछ नहीं कहा गया।
जज ने राय दी,
"धारा 164(5A) के तहत बयान दर्ज न करना या बुलाए जाने पर पीड़िता का बयान दर्ज कराने से इनकार करना हर मामले में अभियोजन पक्ष के लिए घातक साबित नहीं हो सकता और न ही इसका मतलब यह है कि आरोपी को अपने-आप फ़ायदा मिल जाएगा। धारा 164(5A) के तहत बयान दर्ज न करना, आपराधिक केस को रद्द करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता, जो अन्यथा पहली नज़र में सही साबित हो रहा हो।"
इसलिए जज ने माना कि पीड़ित और अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ़ प्रथम दृष्टया मामला सफलतापूर्वक स्थापित किया, इसलिए FIR को रद्द करने की याचिका खारिज की।
Case Title: Nandakumar Sukumar Panicker vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 1297 of 2021)