POSH Act पर अहम फैसला: ICC रिपोर्ट के आधार पर ही सजा दे सकता है नियोक्ता, अलग जांच जरूरी नहीं- बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि नियोक्ता आंतरिक शिकायत समिति (ICC) की रिपोर्ट के आधार पर ही कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है। इसके लिए अलग से विभागीय जांच या चार्जशीट जरूरी नहीं है।
जस्टिस आर आई छागला और जस्टिस अद्वैत एम सेठना की खंडपीठ ने यह फैसला IIT Bombay के एक प्रोफेसर की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें उन्होंने यौन उत्पीड़न के आरोप साबित होने के बाद अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि POSH Act के तहत ICC की जांच ही एक पूर्ण जांच होती है और उसकी रिपोर्ट को ही जांच रिपोर्ट माना जाएगा। ऐसे में दोबारा विभागीय जांच कराना अनावश्यक दोहराव होगा।
अदालत ने कहा,
“विशेष कानून होने के कारण POSH Act अपने आप में संपूर्ण व्यवस्था है। इसके तहत की गई जांच के बाद दोबारा जांच की आवश्यकता नहीं है।”
याचिकाकर्ता का तर्क था कि सेवा नियमों के अनुसार कार्रवाई करने के लिए अलग से चार्जशीट और विभागीय जांच जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि संस्थान के अपने नियम नहीं हैं, तो केंद्रीय सिविल सेवा नियम लागू होने चाहिए।
हलांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि संस्थान के नियम और POSH Act के प्रावधान पर्याप्त हैं और विशेष कानून सामान्य सेवा नियमों पर वरीयता रखता है।
अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता जांच की हर प्रक्रिया में शामिल रहे और उन्हें अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिला। रिकॉर्ड में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन का कोई प्रमाण नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा कि “प्रक्रिया न्याय का साधन है” और इसे इस तरह लागू किया जाना चाहिए कि न्याय का उद्देश्य पूरा हो।
अंततः अदालत ने याचिका खारिज करते हुए अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को बरकरार रखा, हालांकि याचिकाकर्ता को कानून के तहत अपील करने की छूट दी।