बॉम्बे हाईकोर्ट ने प्राइवेट ट्यूशन क्लास चलाने वाले सीनियर सिटिज़न को ज़मानत दी। उन पर 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (POCSO Act), 2012' की धारा 4, 8, 10 और 18 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा पेश की गई इंस्टाग्राम चैट ज़मानत न देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती। कोर्ट ने गौर किया कि चैट में कथित अपराध का साफ़ तौर पर ज़िक्र नहीं था और न ही उसमें अपराध के समय, जगह या प्रकृति के बारे में बताया गया।

जस्टिस मिलिंद एन. जाधव भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 483 के तहत दायर ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई कर रहे थे। यह अर्ज़ी POCSO Act की धारा 4, 8, 10 और 18 के तहत दर्ज FIR के सिलसिले में ज़मानत पाने के लिए दायर की गई। अर्ज़ीकर्ता अपने घर से प्राइवेट ट्यूशन क्लास चलाते हैं। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि सितंबर और अक्टूबर 2024 के बीच एक्स्ट्रा क्लास के दौरान, अर्ज़ीकर्ता ने स्टूडेंट को क्लासरूम में बंद कर दिया, ज़बरदस्ती उसे चूमा और उसकी मर्ज़ी के बिना उसके साथ गलत हरकत की।

अर्ज़ीकर्ता ने कहा कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया और उनके दोस्त के साथ उनकी इंस्टाग्राम चैट एक मनगढ़ंत दस्तावेज़ है, जिसे अर्ज़ीकर्ता की बहन द्वारा उनके खिलाफ़ कार्रवाई करने का फ़ैसला लेने के बाद तैयार किया गया। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि स्टूडेंट उनकी प्राइवेट ट्यूशन क्लास में आता रहा और उसने 10वीं बोर्ड परीक्षा में 96.20% अंक हासिल किए।

कोर्ट ने गौर किया कि कथित घटना और FIR दर्ज होने के बीच डेढ़ साल से ज़्यादा की अनुचित देरी हुई। कोर्ट ने कहा कि हालाँकि गंभीर यौन अपराध के मामले में FIR दर्ज करने में देरी का अक्सर ज़्यादा असर नहीं पड़ता, लेकिन यह नियम हर मामले में लागू नहीं होता।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...गंभीर यौन अपराध के मामले में FIR दर्ज करने में देरी का अक्सर ज़्यादा असर नहीं पड़ता, लेकिन यह नियम हर मामले में लागू नहीं होता और जहाँ झूठे मामले में फंसाए जाने की साफ़ संभावना हो, वहां ऐसी देरी की बहुत बारीकी से जांच की जानी चाहिए।"

और, जहां झूठे मामले में फंसाए जाने की साफ़ संभावना हो, वहां ऐसी देरी की बारीकी से जांच की जानी चाहिए।

इंस्टाग्राम चैट के बारे में कोर्ट ने पाया कि पहली नज़र में देखने पर उस अकेली चैट में अपराध किए जाने का साफ़ तौर पर ज़िक्र नहीं है।

अदालत ने कहा:

“इस खास चैट को देखने पर पहली नज़र में यह साफ़ तौर पर उस अपराध के होने का ज़िक्र नहीं करती जिसके लिए आवेदक पर आरोप लगाया गया, और न ही यह चैट अपराध के समय, जगह या उसकी प्रकृति के बारे में बताती है। इसलिए मेरी राय में आवेदक की ज़मानत नामंज़ूर करने पर विचार करने के लिए यह अकेला आधार नहीं हो सकता।”

अदालत ने यह भी गौर किया कि छात्रों में से केवल दो छात्रों से पूछताछ की गई, जो पीड़ित के बैचमेट थे, और उनके बयानों में आवेदक के खिलाफ़ कोई भी बेमेल या आपत्तिजनक बात सामने नहीं आई। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि जांच पूरी हो चुकी है, चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है और आवेदक का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

इसके अनुसार, अदालत ने ₹25,000 के पीआर (PR) बॉन्ड और उतनी ही राशि की एक या दो ज़मानतों पर ज़मानत मंज़ूर की।

Case Title: Sunil Sundar Gandhi v. State of Maharashtra [Bail Application No. 3066 of 2026]

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: