निरोध आदेश के बाद गिरफ्तारी के लिए एडवायजर बोर्ड की राय जरूरी नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

Update: 2026-08-12 07:59 GMT

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि निवारक निरोध के आदेश के तहत किसी व्यक्ति को गिरफ्तार या हिरासत में लेने के लिए एडवायजर बोर्ड की राय पहले प्राप्त करना अनिवार्य शर्त नहीं है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एडवाइजर बोर्ड की रिपोर्ट राज्य सरकार के लिए यह तय करने के लिए आवश्यक है कि निरोध आदेश की पुष्टि की जाए या व्यक्ति को रिहा किया जाए।

जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस सुभेंदु सामंत की खंडपीठ ने यह फैसला एक बंदी की मां द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

याचिका में आंध्र प्रदेश खतरनाक गतिविधियों में लिप्त बूटलेगर, डकैत, नशीले पदार्थों के अपराधी, गुंडे, अनैतिक व्यापार अपराधी और भू-माफिया अधिनियम, 1986 की धारा 3(1) और 3(2) के तहत पारित निरोध आदेश तथा बाद में उसकी पुष्टि को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसका बेटा पहले से ही न्यायिक हिरासत में था और उसके खिलाफ निवारक निरोध आदेश के आधार पर गिरफ्तारी सलाहकार बोर्ड की राय आने के बाद ही की जा सकती थी। यह भी तर्क दिया गया कि बोर्ड की राय उसके विरुद्ध गिरफ्तारी या एक जेल से दूसरी जेल में स्थानांतरण के लिए पूर्व शर्त है।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि 1986 के कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और न ही अदालत के सामने ऐसा कोई कानूनी आधार रखा गया, जिससे यह साबित हो कि निरोध आदेश के बाद गिरफ्तारी के लिए एडवायजर बोर्ड की राय पहले लेना आवश्यक है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की धारा 10 और 11 एडवाइजर बोर्ड के पास मामले को भेजने तथा उसके समक्ष अपनाई जाने वाली प्रक्रिया से संबंधित हैं, जबकि धारा 12 बोर्ड की रिपोर्ट मिलने के बाद की जाने वाली कार्रवाई से संबंधित है।

खंडपीठ ने कहा कि सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट निरोध आदेश के तहत व्यक्ति को गिरफ्तार करने या हिरासत में लेने की पूर्व शर्त नहीं है।

हालांकि, राज्य सरकार के लिए निरोध आदेश की पुष्टि करने या बोर्ड की रिपोर्ट के आधार पर व्यक्ति को रिहा करने के निर्णय में यह रिपोर्ट आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने साथ ही निवारक निरोध में एडवाइजर बोर्ड की महत्वपूर्ण भूमिका को भी रेखांकित किया। कोर्ट ने कहा कि मनमाने ढंग से निरोध की शक्ति के इस्तेमाल पर रोक लगाने और अवैध निरोध को शुरुआती स्तर पर ही रोकने में बोर्ड की भूमिका महत्वपूर्ण है।

हालांकि मौजूदा मामले में कोर्ट को ऐसा कोई तथ्य नहीं मिला जिससे यह साबित हो कि निरोध आदेश यांत्रिक या नियमित तरीके से पारित किया गया।

कोर्ट ने यह भी पाया कि बंदी को निरोध आदेश के खिलाफ अभ्यावेदन देने का अवसर दिया गया लेकिन उसने कोई अभ्यावेदन दाखिल नहीं किया। उसे एडवाइजर बोर्ड के समक्ष वीडियो माध्यम से अपना पक्ष रखने का अवसर भी मिला था।

याचिकाकर्ता ने बंदी को नेल्लोर से कडप्पा केंद्रीय जेल स्थानांतरित किए जाने को भी चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी खारिज किया और कहा कि स्थानांतरण निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए किया गया।

निरोध और उसकी पुष्टि से जुड़े आदेशों में कोई अवैधता नहीं मिलने पर हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज की।

हालांकि, कोर्ट ने बंदी को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वह चाहे और कानून के अनुसार उचित सलाह प्राप्त करे तो वह कानून के तहत उपलब्ध उपाय के अनुसार अभ्यावेदन दाखिल कर सकता है।

अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags:    

Similar News