आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि भूमि के स्वामित्व से संबंधित सिविल मुकदमे के लंबित होने मात्र से राजस्व अधिकारियों की म्यूटेशन कार्यवाही पर रोक नहीं लगती।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राजस्व अधिकारी आंध्र प्रदेश अधिकार अभिलेख और पट्टादार पासबुक अधिनियम 1971 के तहत अपने वैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर सकते हैं। हालांकि स्वामित्व के संबंध में सिविल कोर्ट का अंतिम फैसला राजस्व अभिलेखों में भी प्रभावी होगा।

यह फैसला जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की खंडपीठ ने वाईएसआर कडप्पा जिले के पोटलादुर्ती गांव की भूमि से जुड़े मामले में सुनाया।

मामले में शुरुआत में याचिकाकर्ताओं के नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज थे। बाद में प्रतिवादी के पिता ने पंजीकृत सेल्स डीड के आधार पर भूमि अपने नाम दर्ज कराने के लिए तहसीलदार के समक्ष आवेदन किया। तहसीलदार ने आवेदन स्वीकार करते हुए उनके पक्ष में म्यूटेशन कर दिया।

इसके बाद उन्होंने रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड के माध्यम से भूमि अपने बेटे यानी वर्तमान अपीलकर्ता को दे दी। अपीलकर्ता के आवेदन पर तहसीलदार ने उसके नाम भी राजस्व अभिलेखों में म्यूटेशन कर दिया। इसके बाद मूल याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में इस म्यूटेशन को चुनौती दी।

सिंगल जज ने तहसीलदार को याचिकाकर्ताओं के नाम दोबारा राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने और लंबित सिविल मुकदमे के निपटारे तक भूमि को विवादित रजिस्टर में रखने का निर्देश दिया। इसके खिलाफ अपीलकर्ता ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसके पिता के पक्ष में किया गया पहला म्यूटेशन कभी चुनौती नहीं दिया गया। याचिका में केवल बाद में अपीलकर्ता के पक्ष में किए गए म्यूटेशन को चुनौती दी गई। ऐसे में बाद का म्यूटेशन रद्द होने पर भी पहले वाला म्यूटेशन कायम रहता और याचिकाकर्ताओं के नाम दोबारा दर्ज करने का कोई आधार नहीं बनता।

अपीलकर्ता ने यह भी बताया कि पहले की कार्यवाही में याचिकाकर्ताओं को नोटिस दिए जाने का उल्लेख था लेकिन उन्होंने न तो उपस्थित होकर अपना पक्ष रखा और न ही कोई आपत्ति दाखिल की।

दूसरी ओर याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उन्हें पहले म्यूटेशन की जानकारी नहीं थी। उनका तर्क था कि भूमि के स्वामित्व से जुड़ा सिविल मुकदमा लंबित होने के कारण तहसीलदार को अधिनियम की धारा 8(2) के तहत म्यूटेशन करने का अधिकार नहीं था।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया। खंडपीठ ने कहा कि पहले म्यूटेशन आदेश को चुनौती ही नहीं दी गई। साथ ही याचिकाकर्ताओं ने ऐसा कोई स्पष्ट पक्ष या शपथपत्र भी दाखिल नहीं किया, जिससे नोटिस दिए जाने संबंधी आदेश में दर्ज तथ्य पर संदेह किया जा सके।

हाईकोर्ट ने कहा कि म्यूटेशन की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है। राजस्व अभिलेख न तो स्वामित्व साबित करते हैं और न ही किसी व्यक्ति को स्वामित्व प्रदान करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य राजस्व संबंधी होता है और वे सक्षम सिविल कोर्ट द्वारा स्वामित्व के संबंध में की गई घोषणा के अधीन रहते हैं।

खंडपीठ ने कहा,

“सिविल मुकदमे की लंबितता अपने आप में 1971 के अधिनियम के तहत कार्यवाही पर रोक नहीं लगाती।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति को भूमि के स्वामित्व को लेकर वास्तविक विवाद है तो वह सक्षम सिविल कोर्ट से उचित राहत मांग सकता है। लेकिन केवल मुकदमा लंबित होने के आधार पर राजस्व अधिकारियों को अधिनियम के तहत अपने वैधानिक अधिकारों और अधिकारिता का प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकता।

इस आधार पर हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए सिंगल जज का आदेश रद्द किया। हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को म्यूटेशन आदेशों के खिलाफ उपलब्ध वैधानिक उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।

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