आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने ग्रेटर विशाखापत्तनम म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (GVMC) और डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की उन याचिकाओं को खारिज किया, जिनमें 'रयोतवारी पट्टा' अधिकार देने वाले सरकारी आदेश (GO) को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि कानूनी कर्तव्यों को निभाने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, सरकार के ही रिविजनल आदेश के खिलाफ रिट याचिका दायर नहीं कर सकते। [2026 LiveLaw (AP) 194]

जस्टिस सुमति जगदम ने रूप चंद बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा,

"कानूनी कर्तव्यों को निभाने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी सरकार के ही आदेशों को चुनौती देने के लिए रिट याचिका दायर नहीं कर सकता, क्योंकि अधिकारी मूल रूप से राज्य के पदानुक्रमित (Hierarchical) फैसले से बंधा होता है। कानून के तहत यह स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है। ऊपर बताए गए फैसले के मद्देनजर 'अंतिम निर्णय के सिद्धांत' (Doctrine of Finality) के भी खिलाफ है।"

कोर्ट ने कहा कि "डेलिगेट" (अधिकार प्राप्त व्यक्ति) का मतलब एजेंट से कुछ अधिक नहीं है; एजेंट अपनी व्यक्तिगत शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि मुख्य अधिकारी (प्रिंसिपल) की ओर से काम करता है।

कोर्ट ने कहा,

"चूंकि अधिकार सीधे कानून से सरकार को मिलते हैं, इसलिए सरकार जिस भी अधिकारी को उस कानूनी शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए नियुक्त करती है, वह सरकार की ओर से ही ऐसा कर रहा होता है।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर, जिन्होंने आदेश पारित किया, उन्हें सरकार द्वारा कानून के तहत अधिकार सौंपा गया। इसलिए वे किसी प्रशासनिक शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। इसलिए सरकारी वकील का यह तर्क कि डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर राज्य सरकार के आदेश से पीड़ित पक्ष हैं, बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जा सकता।"

कोर्ट ने माना कि डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर की याचिका "सुनवाई योग्य नहीं" है।

हालांकि, चूंकि GVMC ने भी उसी सरकारी आदेश को चुनौती दी थी, इसलिए कोर्ट ने दोनों याचिकाओं में मामले के गुण-दोष पर विचार किया।

Case title: Greater Visakhapatnam Municipal Corporation v/s The State of Andhra Pradesh & Ors.

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