इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के सचिव को 'स्वतः संज्ञान' (suo motu) मामले में नोटिस जारी किया। यह मामला 23 और 24 सितंबर, 2026 की दरमियानी रात यमुना एक्सप्रेसवे पर जेवर के पास एक स्लीपर बस में लगी आग से 9 यात्रियों की जलकर मौत हो जाने से जुड़ा है।

जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने यह आदेश उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और अतिरिक्त मुख्य सचिव (परिवहन) द्वारा दाखिल हलफनामों तथा 'एमिक्स क्यूरी' (न्यायालय के सहयोगी) के रूप में अदालत की मदद कर रहे सीनियर एडवोकेट तरुण अग्रवाल के सुझावों पर विचार करने के बाद दिया।

अदालत ने गौर किया कि राज्य सरकार ने अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 7,665 बसों का चालान किया और 1,008 बसों को जब्त किया। हालांकि, अदालत ने कहा कि "अभी और भी कदम उठाए जाने की जरूरत है"।

राज्य परिवहन विभाग के हलफनामे में बताया गया कि 'ऑटोमैटिक टेस्टिंग स्टेशन' (ATS) MoRTH के तहत पंजीकृत और संचालित होते हैं, जबकि अन्य राज्यों में स्थित ATS सुविधाएं उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग के नियंत्रण में नहीं आती हैं।

हलफनामे में कहा गया कि यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए, ऑटोमोटिव उद्योग मानकों (AIS-119 और AIS-135) का "सख्ती से पालन" कराने के लिए MoRTH को निर्देश जारी करना आवश्यक है।

अदालत ने MoRTH को उसके सचिव के माध्यम से मामले में पक्षकार बनाने के राज्य के अनुरोध को स्वीकार कर लिया और MoRTH के सचिव को नोटिस जारी किया। साथ ही अदालत ने निर्देश दिया कि पूरी केस फाइल की एक प्रति भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को भी भेजी जाए।

राज्य के हलफनामे में यह भी बताया गया कि उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग ने 2023 में 252, 2024 में 340, 2025 में 610 और सितंबर 2026 तक 1,104 स्लीपर बस परमिट जारी किए।

इसमें कहा गया कि स्लीपर बसों को 'ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट' जारी करने से पहले, निर्धारित मानकों की जांच की जाती है। रजिस्ट्रेशन या निरीक्षण अधिकारी वाहन की फिटनेस की जांच करता है और एक निश्चित अवधि के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट जारी करता है। परमिट के लिए आवेदन तभी मंजूर किया जाता है, जब फिटनेस सर्टिफिकेट वैध हो।

हलफनामे में आगे कहा गया कि उत्तर प्रदेश ने अपनी सीमाओं पर कोई स्थायी जांच केंद्र नहीं बनाए। इसके बजाय अचानक जांच (सरप्राइज चेकिंग) और प्रवर्तन टीमें नियमित रूप से वाहनों की जांच करती हैं।

इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

पिछले महीने हाईकोर्ट ने बस में आग लगने की जानलेवा घटना पर स्वतः संज्ञान (suo motu cognizance) लिया था। कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि वातानुकूलित (AC) स्लीपर बसें "बिना उचित जांच और बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों, जैसे कि अग्निशमन यंत्र (Fire Extinguisher) आदि के" चलाई जा रही हैं।

कोर्ट ने ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड्स (AIS) की समीक्षा की थी, जिसमें बस की बनावट (Body Design) के लिए AIS-052, स्लीपर कोच के विनिर्देशों (Specifications) के लिए AIS-119, और आग का पता लगाने व उसे बुझाने (Fire Detection and Suppression) से संबंधित AIS-135 शामिल हैं।

निर्धारित आवश्यकताओं में आपातकालीन निकास (Emergency Exits), वाहन की ऊंचाई पर प्रतिबंध, स्वचालित अग्निशमन प्रणाली (Automated Fire Suppression Systems) और ड्राइवर को नींद आने पर सचेत करने वाली प्रणाली (Driver Drowsiness Alert Systems) शामिल हैं।

अपने नवीनतम आदेश में कोर्ट ने उम्मीद जताई कि राज्य सरकार 'एमिक्स क्यूरी' (न्यायालय मित्र) द्वारा दिए गए सुझावों पर विचार करेगी और एक "समग्र प्रस्ताव" तैयार करेगी, "ताकि इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटनाएं दोबारा न हों"।

इस प्रस्ताव में "मॉडिफाई की गई बसों की जांच करने के तरीके" भी शामिल होने चाहिए।

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