यूपी महिला सम्मान कोष | मेडिकल रिपोर्ट में चोट न होने का हवाला देकर POCSO पीड़िता को मुआवजे से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'उत्तर प्रदेश रानी लक्ष्मीबाई महिला सम्मान कोष योजना, 2015' के तहत यौन उत्पीड़न (Penetrative Sexual Assault) की शिकार पीड़िता को मुआवजा देने से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि मेडिकल रिपोर्ट में कोई चोट नहीं दिखी है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस योजना के तहत मुआवजा इसलिए दिया जाता है, क्योंकि पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है, न कि इसलिए कि उसे हमले के दौरान कोई शारीरिक चोट आई है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 10 दिनों के भीतर पीड़िता को 3 लाख रुपये का मुआवजा दें।
इस तरह बेंच ने पीड़िता के पिता द्वारा दायर उस रिट याचिका को स्वीकार कर लिया, जिसमें अधिकारियों द्वारा योजना के तहत मुआवजा न दिए जाने को चुनौती दी गई।
आरोप है कि 7 दिसंबर, 2022 को पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न हुआ और उसी दिन FIR दर्ज की गई। पुलिस ने 13 जनवरी, 2023 को चार्जशीट दाखिल की।
इस योजना के सीरियल नंबर 6 के तहत POCSO Act की धारा 4 के दायरे में आने वाली पीड़िताएं कुल 3 लाख रुपये के मुआवजे की हकदार हैं। योजना के अनुसार, FIR दर्ज होने के 15 दिनों के भीतर 1 लाख रुपये और चार्जशीट दाखिल होने के एक महीने के भीतर बाकी 2 लाख रुपये दिए जाने का प्रावधान है।
हालांकि, जिला संचालन समिति (District Steering Committee) ने पीड़िता के मुआवजे के दावे को रोक दिया और बाद में मेडिकल आधार पर इसे खारिज कर दिया।
यह फैसला इस आधार पर लिया गया कि मेडिकल रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न (Penetrative Sexual Assault) की पुष्टि नहीं हुई। समिति ने कहा कि अगर फोरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (FSL) की कोई ऐसी रिपोर्ट मिल जाती है जो दावे का समर्थन करती हो, तो वे इस पर फिर से विचार कर सकते हैं।
हाईकोर्ट में राज्य सरकार ने समिति के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि मेडिकल रिपोर्ट में कोई 'पेनिट्रेटिव इंजरी' (Penetrative Injury) नहीं दिखी। इस योजना के तहत मुआवजा पाने के लिए ऐसी चोट का होना जरूरी है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज किया। POCSO Act की धारा 3 और 4 की जांच करते हुए बेंच ने कहा कि धारा 3(a), (b), (c) और (d) के तहत बताए गए कृत्य 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' (Penetrative Sexual Assault) की श्रेणी में आते हैं। कोर्ट ने माना कि इस तरह के अपराध को साबित करने के लिए ऐसी किसी चोट का होना जरूरी नहीं है, जो स्पष्ट रूप से 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' को साबित करे।
कोर्ट ने 'दलीप कुमार उर्फ डल्ली बनाम उत्तरांचल राज्य' और 'लोक मल उर्फ लोकू बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया। इन मामलों में यह माना गया कि यौन हमले (Sexual Assault) के कारण हमेशा शारीरिक चोटें आएं, यह जरूरी नहीं है।
कोर्ट ने गौर किया कि 'दलीप कुमार' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन हमले को साबित करने के लिए शारीरिक चोटों का होना अनिवार्य नहीं है। यह भी कि पीड़ित व्यक्ति किसी दर्दनाक अनुभव पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
इसी तरह 'लोक मल' मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि पीड़ित के निजी अंगों पर चोट के निशान न होना, अभियोजन पक्ष (Prosecution) के मामले को हमेशा कमजोर नहीं करता है।
सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि इस योजना (Scheme) की शर्तों में यह अनिवार्य नहीं है कि चोट की रिपोर्ट (Injury Report) में स्पष्ट रूप से 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' से लगी चोट का ही जिक्र हो।
बेंच ने कहा,
"इस योजना के प्रावधानों को समझने पर हमारा निष्कर्ष यह है कि पीड़ित को लाभ देने के लिए तीन दस्तावेजों - FIR, चोट की रिपोर्ट और चार्जशीट - का होना जरूरी है।"
कोर्ट ने आगे कहा कि अगर FIR और चार्जशीट से POCSO Act की धारा 4 के तहत अपराध का पता चलता है तो स्टीयरिंग कमिटी केवल इसलिए आगे की जांच या ट्रायल नहीं कर सकती कि चोट की रिपोर्ट में किसी चोट का जिक्र नहीं है।
बेंच ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह योजना कल्याणकारी कानून है, जिसका उद्देश्य पीड़ितों के दर्द और आघात (Trauma) को कम करना है; इसलिए, इसकी व्याख्या उदारतापूर्वक (Liberally) की जानी चाहिए।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि स्टीयरिंग कमिटी का फैसला "कानूनी आधार से रहित और योजना के प्रावधानों के विपरीत" है।
चूंकि चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी थी, इसलिए कोर्ट ने निर्देश दिया कि आदेश की प्रमाणित प्रति पेश किए जाने के 10 दिनों के भीतर पीड़ित को तुरंत 3 लाख रुपये का भुगतान किया जाए।
इसके साथ ही कोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा किया।
Case Title : X Rape Victim vs. State of U.P. Thru. Prin. Secy. Women Welfare Deptt. Lko and 3 others 2026 LiveLaw (AB) 863