इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को शोर प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए नई जनहित याचिका (PIL) दर्ज की। यह कदम बलरामपुर में दूसरी कक्षा की छात्रा की मौत की घटना का संज्ञान लेने के बाद उठाया गया; आरोप है कि जब पास से लाउडस्पीकर और म्यूज़िक सिस्टम के साथ एक जुलूस गुज़र रहा था, तब वह छात्रा अपनी क्लास में गिर पड़ी थी।

जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने प्रेशर हॉर्न, मॉडिफाइड साइलेंसर और हूटर के गलत इस्तेमाल से जुड़ी लंबित PIL पर सुनवाई करते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस घटना और शोर प्रदूषण व नागरिकों पर इसके असर जैसे व्यापक मुद्दों पर एक अलग स्वतः संज्ञान वाली PIL दर्ज करे।

उल्लेखनीय है कि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने बच्ची की मौत के कारण के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला है।

कोर्ट ने नोट किया कि यह घटना कथित तौर पर 22 सितंबर, 2026 को बलरामपुर के भगौतीगंज में सिटी पैलेस रोड स्थित डिवाइन पब्लिक स्कूल में हुई।

छात्रा दूसरी कक्षा में पढ़ती थी और आरोप है कि जब पास से लाउडस्पीकर और म्यूज़िक सिस्टम के साथ एक जुलूस गुज़र रहा था, तब वह अपनी क्लास में गिर पड़ी। मीडिया में इस घटना की व्यापक रूप से रिपोर्टिंग की गई।

बेंच ने कहा कि हालांकि उसे लंबित PIL में दिए गए पिछले आदेश की जानकारी है, लेकिन बलरामपुर की घटना और शोर प्रदूषण से जुड़े व्यापक सवालों के लिए अलग कार्यवाही की आवश्यकता है।

इसके अनुसार, कोर्ट ने रजिस्ट्री को "शोर प्रदूषण और संबंधित अधिकारियों द्वारा इस संबंध में कानूनी प्रावधानों के पालन" से जुड़ी एक नई स्वतः संज्ञान वाली PIL दर्ज करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि आरोप है कि लाउडस्पीकर या म्यूज़िक इंस्ट्रूमेंट बहुत तेज़ आवाज़ में बजाए जा रहे थे और उसके तुरंत बाद बच्ची क्लास में गिर पड़ी।

बेंच ने कहा कि इसी बात ने उन्हें इस मामले का संज्ञान लेने के लिए प्रेरित किया, क्योंकि "शोर प्रदूषण अब एक खतरा बनता जा रहा है"। हाईकोर्ट ने कहा कि लेजिस्लेचर ने 'पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986' के ज़रिए पहले ही ध्वनि प्रदूषण पर ध्यान दिया और उसे माना है और नियम बनाने वाली अथॉरिटी ने 'ध्वनि प्रदूषण (नियमन और नियंत्रण) नियम, 2000' के ज़रिए भी ऐसा ही किया।

इस कानूनी ढांचे के बावजूद, कोर्ट ने देखा कि यह समस्या बिना रुके जारी है।

बेंच ने कहा,

"हम हर दिन सड़कों पर इन नियमों (नियम, 2000) का उल्लंघन होते देखते हैं। यह आम बात है।"

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में यह देखना भी शामिल होगा कि इस समस्या को रोकने के लिए कौन ज़िम्मेदार है और इस दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर पहले उठाए गए कदम नाकाफ़ी हैं तो कोर्ट को कानूनी प्रावधानों के पालन की नियमित निगरानी के लिए एक सिस्टम बनाना होगा।

कोर्ट ने कहा कि असरदार तरीके से लागू करने के लिए नागरिकों में जागरूकता फैलाना भी ज़रूरी है, क्योंकि जागरूकता की कमी ही उल्लंघन का एक मुख्य कारण है।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी जागरूकता कैसे पैदा की जाए, यह सरकार का काम है। कोर्ट को 'स्वतः संज्ञान' (suo motu) वाली कार्यवाही में शामिल अधिकारियों से मदद की ज़रूरत होगी।

बेंच ने आगे कहा कि अगर उपाय किए जाने के बावजूद लोग कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करते रहते हैं, तो उन्हें जवाबदेह ठहराना होगा।

कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि 'ध्वनि प्रदूषण नियम, 2000' में सज़ा का प्रावधान है, जिसे 'पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986' के तहत लागू किया जा सकता है।

कोर्ट ने आदेश दिया कि कई सीनियर सरकारी अधिकारियों और अथॉरिटीज़ को विपक्षी पार्टी के तौर पर शामिल किया जाए, जिनमें गृह, परिवहन, वन और पर्यावरण, आवास और शहरी योजना और शहरी विकास विभागों के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी/प्रिंसिपल सेक्रेटरी शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश के डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस, लखनऊ के पुलिस कमिश्नर, लखनऊ के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, लखनऊ म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन, लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी, उत्तर प्रदेश पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को भी मामले में शामिल करने का निर्देश दिया गया।

इस घटना के संबंध में डिवाइन पब्लिक स्कूल (हेड मास्टर के ज़रिए) और बलरामपुर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस और चीफ मेडिकल ऑफिसर को भी पक्षकार बनाने का निर्देश दिया गया।

बेंच ने राज्य के एडिशनल चीफ स्टैंडिंग काउंसिल को निर्देश दिया कि वे बलरामपुर के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस से निर्देश और रिपोर्ट प्राप्त करें।

बेंच ने आगे उम्मीद और भरोसा जताया कि बच्चे के माता-पिता और स्कूल अथॉरिटीज़ पर कोई दबाव नहीं डाला जाएगा और राज्य का कोई भी व्यक्ति या अथॉरिटी स्कूल के कामकाज में बेवजह दखल नहीं देगा।

कोर्ट की मदद कर रहे सीनियर एडवोकेट गौरव मेहरोत्रा ​​(एमिकस क्यूरी) से भी स्वतः संज्ञान (suo motu) वाली कार्यवाही में मदद करने का अनुरोध किया गया।

अथॉरिटीज़ को घटना के बारे में और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम तथा ध्वनि प्रदूषण नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए उठाए गए या प्रस्तावित कदमों के साथ-साथ प्रभावी कार्यान्वयन के सुझावों पर हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने की अनुमति दी गई।

The court will hear the suo motu PIL on October 12, 2026.

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