इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 467 के तहत आने वाला अपराध, जिसमें कम-से-कम 7 साल की सजा का प्रावधान नहीं है, उसे 'जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015' (JJ Act) के उद्देश्यों के लिए "जघन्य अपराध" (Heinous Offence) नहीं माना जा सकता।

जस्टिस जय प्रकाश तिवारी की बेंच ने कहा कि यह अपराध JJ Act के तहत "गंभीर अपराधों" (Serious Offences) की श्रेणी में आता है।

अदालत ने आगे कहा कि इसलिए जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ऐसे मामले को 'जघन्य अपराधों' पर लागू होने वाले कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल करके, बालिगों की तरह ट्रायल के लिए 'चिल्ड्रन कोर्ट' (Children's Court) में नहीं भेज सकता।

इस तरह अदालत ने जालसाजी के मामले में आरोपी किशोर (Juvenile) द्वारा दायर की गई क्रिमिनल रिवीजन याचिका स्वीकार की। अदालत ने बुलंदशहर के जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड और चिल्ड्रन कोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिन्होंने इस मामले को बालिग की तरह ट्रायल के लिए भेजने के फैसले को बरकरार रखा था।

अदालत ने कहा,

"याचिकाकर्ता (किशोर) पर IPC की धारा 467 के तहत जो आरोप लगाए गए, उन्हें 2015 के अधिनियम की धारा 2(33) के तहत 'जघन्य अपराध' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।"

मामले को वापस जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के पास भेज दिया गया। बोर्ड को निर्देश दिया गया कि वह 'गंभीर अपराधों' पर लागू होने वाली प्रक्रिया के अनुसार जांच करे। इस दौरान "याचिकाकर्ता (किशोर) का बालिग की तरह ट्रायल न किया जाए"।

Case Title : Juvenile - X vs. State of U.P. and Another 2026 LiveLaw (AB) 891

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