इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई ऐसा बचाव जो, अगर साबित हो जाए तो वादी के दावे को खारिज कर सकता है, उसे आम तौर पर सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के ऑर्डर VII नियम 11(a) के तहत शिकायत खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि जांच केवल शिकायत में कही गई बातों पर निर्भर करती है और प्रतिवादी द्वारा अपने लिखित बयान में उठाए गए तर्क यह तय करने के लिए प्रासंगिक नहीं हैं कि शिकायत में कार्रवाई का कारण (cause of action) बताया गया है या नहीं।

जस्टिस डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा,

“कार्रवाई का कारण (Cause of Action) होना और ऐसे कारण को बनाने वाले तथ्यों का सबूत, अलग-अलग बातें हैं। कोई ऐसा बचाव जो, अगर साबित हो जाए, तो वादी के दावे को खारिज कर सकता है, उसे आम तौर पर CPC के ऑर्डर VII नियम 11(a) के तहत शिकायत खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”

यह विवाद कासगंज में जैन मंदिर के पास बाजार नदराई गेट पर स्थित एक दुकान से जुड़ा है, जो प्रतिवादी-ट्रस्ट की है। याचिकाकर्ता का दावा है कि 2005 में अपने पिता की मृत्यु के बाद उसे 1,000 रुपये प्रति माह के किराए पर किरायेदारी का अधिकार मिला। 2019 में ट्रस्ट ने कासगंज के जज, स्मॉल कॉज़ कोर्ट/सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के समक्ष उसे बेदखल करने के लिए मुकदमा दायर किया।

अपने लिखित बयान में याचिकाकर्ता ने CPC के ऑर्डर VII नियम 11 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि शिकायत में यह नहीं बताया गया कि कार्रवाई का कारण कब, कहाँ या किस तरह से उत्पन्न हुआ। उसने यह भी तर्क दिया कि ट्रस्ट मुकदमा करने में सक्षम कानूनी व्यक्ति (Juristic Person) नहीं है, उसके सचिव को नोटिस जारी करने या मुकदमा शुरू करने का अधिकार नहीं है, नोटिस कभी तामील नहीं किए गए और 01.10.2016 से 31.05.2018 की अवधि का किराया उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किरायेदारी, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 की धारा 30(1) के तहत जमा किया गया।

ट्रायल कोर्ट ने उसके खिलाफ आपत्ति का फैसला सुनाया और कासगंज के जिला जज ने उसकी पुनरीक्षण याचिका (Revision) खारिज की। हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि लिखित बयान में उठाए गए मामले की स्वीकार्यता (Maintainability) से जुड़े अन्य आपत्तियों पर निचली अदालतों ने न तो विचार किया और न ही उन पर कोई फैसला सुनाया।

कोर्ट ने देखा कि शिकायत (Plaint) में मकान मालिक-किरायेदार के रिश्ते, 30.08.2016 को किराए के आखिरी भुगतान, 01.10.2016 से बकाया किराए और रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजे गए 21.09.2017, 07.10.2017 और 01.11.2017 के नोटिसों का ज़िक्र था। ऊपर से देखने पर इन बातों से बेदखली की राहत मांगने का तथ्यात्मक आधार पता चलता था।

कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की बाकी दलीलें वादी के आरोपों की सच्चाई, मुकदमा करने वाले व्यक्ति के अधिकार और जमा की गई रकम के असर से जुड़ी थीं; ये बातें मुकदमे के आधार (Cause of Action) के खुलासे के बजाय अंततः डिक्री पाने के अधिकार से संबंधित थीं।

आगे कहा गया,

“कोर्ट को दोनों अतिवादी स्थितियों से बचना चाहिए: उसे ऐसी शिकायत को आगे नहीं बढ़ने देना चाहिए जो, ठीक से पढ़ने पर, मुकदमा करने का कोई वास्तविक अधिकार नहीं दिखाती, भले ही उसमें चालाकी से लिखी गई बातें हों। साथ ही वह शिकायत को इस आधार पर खारिज नहीं कर सकती कि उसके दावों की सच्चाई की जांच करे, बचाव पक्ष की दलीलों को तौले, या उन विवादित सवालों का फैसला करे जिन पर सुनवाई (Trial) के दौरान विचार किया जाना चाहिए। जहां शिकायत ऊपर से देखने और पूरी तरह पढ़ने पर मांगी गई राहत पाने के अधिकार से जुड़े तथ्य दिखाती है, वहां CPC के ऑर्डर VII नियम 11(a) के तहत आपत्ति खारिज हो जानी चाहिए।”

निचली अदालतों के फैसले सही ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि रिविजनल कोर्ट को किरायेदार द्वारा अपने लिखित बयान में किरायेदारी की बात स्वीकार करने पर भरोसा नहीं करना चाहिए था।

कोर्ट ने कहा,

“जिस हद तक रिविजनल कोर्ट ने लिखित बयान में की गई स्वीकारोक्ति पर ध्यान दिया, वह CPC के ऑर्डर VII नियम 11(a) के तहत आपत्ति के निपटारे के लिए ज़रूरी नहीं था और, किसी भी स्थिति में ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष को सही ठहराने के लिए इसकी ज़रूरत नहीं थी।”

अदालत ने यह साफ़ किया कि उसने बकाया राशि, नोटिस, ट्रस्ट या उसके सेक्रेटरी के अधिकार, या उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराये पर देने, किराया और बेदखली का नियमन) अधिनियम, 1972 के लागू होने के बारे में कोई फ़ैसला नहीं किया। अदालत ने याचिकाकर्ता को ट्रायल कोर्ट के सामने अपना पक्ष रखने की छूट दी, जहाँ यह मामला अभी सुनवाई के चरण में है।

चुनौती दिए गए आदेशों में अधिकार-क्षेत्र की कोई स्पष्ट गलती, मनमानी या साफ़ तौर पर कोई गैर-कानूनी बात न मिलने पर अदालत ने याचिका का निपटारा किया।

Case Title: Neeraj Maheshwari v. Shri Narayanlal Dharamshala Trust, Kasganj

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