'ज़हरीले पेड़ का फल': इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला - बाद में हुई गिरफ़्तारी या रिमांड से गैर-कानूनी हिरासत सही नहीं हो सकती, ₹30,000 का मुआवज़ा देने का आदेश
अनुच्छेद 21 और 22 के तहत संवैधानिक सुरक्षा के संदर्भ में 'ज़हरीले पेड़ का फल' (Fruit of the Poisonous Tree) सिद्धांत को लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बाद में की गई औपचारिक गिरफ़्तारी और रिमांड, पहले की गैर-कानूनी हिरासत को वैध नहीं बना सकती।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि जब किसी व्यक्ति की शुरुआती हिरासत गैर-कानूनी होती है तो बाद में की गई गिरफ़्तारी (भले ही उसके लिए वैध आधार हों) और उससे जुड़ी रिमांड की कार्यवाही भी अमान्य हो जाती है।
बेंच ने यह टिप्पणी रवि चौरसिया की गैर-कानूनी हिरासत से जुड़ी 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका को मंज़ूरी देते हुए की। कोर्ट ने उन्हें रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही ₹30,000 का मुआवज़ा भी दिया, जिसकी वसूली उनकी गैर-कानूनी हिरासत के लिए ज़िम्मेदार लोगों से की जाएगी।
मामले का संक्षिप्त विवरण
याचिकाकर्ता ने प्रयागराज की सोरांव पुलिस द्वारा गैर-कानूनी हिरासत में रखे जाने का आरोप लगाते हुए हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।
उनके मामले के अनुसार, उन्हें 14 सितंबर, 2026 को अयोध्या से पुलिस हिरासत में लिया गया और सोरांव पुलिस स्टेशन लाया गया। हालांकि, उस समय कोई गिरफ़्तारी नहीं दिखाई गई।
इसके बाद उनकी माँ 15 सितंबर को उनकी खैरियत जानने के लिए पुलिस स्टेशन गईं, जिसके बाद हाई कोर्ट में 'हेबियस कॉर्पस' याचिका दायर की गई।
16 सितंबर को पुलिस ने उन्हें सुबह 10:45 बजे औपचारिक रूप से गिरफ़्तार किया, जनरल डायरी में गिरफ़्तारी दर्ज की, उनका मेडिकल टेस्ट कराया और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जिन्होंने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
हाईकोर्ट ने पहले पुलिस स्टेशन से CCTV फुटेज मंगवाई थी। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) और जांच अधिकारी द्वारा दायर जवाबी हलफ़नामे में याचिकाकर्ता की हिरासत को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया।
SHO ने जनरल डायरी में याचिकाकर्ता की मौजूदगी दर्ज न करने को "अनजाने में हुई गलती" बताया। हालांकि, कोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की टिप्पणियां
बेंच ने कहा कि SHO, जो एक अनुभवी पुलिस अधिकारी हैं, उनसे यह चूक नहीं हो सकती थी कि वे 'जनरल डायरी' में यह दर्ज न करें कि याचिकाकर्ता को पुलिस स्टेशन लाया गया और लॉक-अप में रखा गया।
इस मामले में बेंच ने "culpa lata dolo aequiparatur" (बड़ी लापरवाही को जानबूझकर की गई गलती के बराबर माना जाता है) सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि कानून में घोर लापरवाही को जानबूझकर की गई गलत हरकत के बराबर माना जाता है।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब भी पुलिस किसी व्यक्ति को जांच या पूछताछ के लिए पकड़ती है तो उसे हिरासत में लिए जाने के समय से ही उसकी हिरासत की जानकारी 'जनरल डायरी' में दर्ज होनी चाहिए।
इसलिए कोर्ट ने SHO की इस दलील को खारिज कर दिया कि यह चूक अनजाने में हुई थी; कोर्ट ने इसे गैर-कानूनी हिरासत की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए "जानबूझकर की गई चूक" बताया।
इस पृष्ठभूमि में बेंच ने गौर किया कि पुलिस ने 15 सितंबर को दायर 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका के बारे में पता चलने के बाद ही 16 सितंबर को उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया।
इससे कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि याचिकाकर्ता को रिमांड के लिए ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना 24 घंटे से ज़्यादा समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया।
अपने आदेश में कोर्ट ने "Fruit of the Poisonous Tree" (ज़हरीले पेड़ का फल) सिद्धांत की भी समीक्षा की, जिसकी शुरुआत अमेरिकी आपराधिक कानून व्यवस्था में हुई थी।
बेंच ने स्पष्ट किया कि भारतीय अदालतों ने सबूतों के कानून (law of evidence) में इस सिद्धांत को उसी तरह लागू नहीं किया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि इस सिद्धांत की समीक्षा एक अलग संदर्भ में की जा सकती है, जैसे कि संवैधानिक कानून और संविधान के भाग III के तहत सुरक्षित नागरिक स्वतंत्रताएं।
कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत हिरासत और गिरफ्तारी, दोनों पर लागू होता है।
कोर्ट ने कहा,
"अगर किसी व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लेने के बाद गिरफ्तार किया जाता है तो वह गिरफ्तारी गैर-कानूनी हो जाती है। साथ ही, ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड की कार्यवाही भी गैर-कानूनी हो जाती है, क्योंकि गिरफ्तारी की शुरुआत ही आरोपी को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में लेने से हुई थी, जिससे उसके आर्टिकल 22 के तहत अधिकारों का उल्लंघन हुआ।"
बेंच ने समझाया कि शुरू में की गई गैर-कानूनी हिरासत "ज़हरीला पेड़" है, जबकि उससे जुड़ी बाद की कार्रवाइयां उसका 'फल' हैं।
कोर्ट ने जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया कि अगर आर्टिकल 22(1) का उल्लंघन करके गिरफ्तारी की जाती है तो वह असंवैधानिक होती है। उसके बाद के रिमांड आदेश भी अमान्य हो जाते हैं।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि चार्जशीट दाखिल करने और मामले का संज्ञान लेने से ऐसी असंवैधानिक गिरफ्तारी वैध नहीं हो जाती।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही बाद में गिरफ्तारी के लिए वैध आधार मौजूद हों, लेकिन अगर गिरफ्तारी और रिमांड की कार्यवाही आर्टिकल 21 और 22 का उल्लंघन करने वाली शुरुआती हिरासत के बाद होती है, तो वे अमान्य मानी जाएंगी।
कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि "पुलिस को गिरफ्तारी को वैध बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती" अगर वह गैर-कानूनी हिरासत की कार्रवाई के बाद की गई हो।
कोर्ट ने इस मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 38 का पालन न किए जाने की बात भी नोट की। यह प्रावधान जांच के दौरान आरोपी के अपनी पसंद के वकील से मिलने के अधिकार से संबंधित है।
बेंच ने पाया कि याचिकाकर्ता को न तो इस अधिकार के बारे में बताया गया और न ही उस दौरान वकील को साथ रखने का मौका दिया गया।
कोर्ट ने आगे कहा कि पुलिस किसी संदिग्ध को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए बिना पूछताछ के लिए थाने ले जाकर और बाद में उस पूछताछ के दौरान दिए गए खुद के खिलाफ बयानों का सहारा लेकर इस सुरक्षा उपाय से बच नहीं सकती।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 38 के तहत पुलिस का कर्तव्य तब भी बनता है जब वे किसी संदिग्ध को पूछताछ के लिए थाने ले जाते हैं, भले ही उन्होंने उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न किया हो या आरोपी न बनाया हो। इस स्थिति को देखते हुए कोर्ट ने प्रयागराज के कमिश्नर को मामले की जांच करने और गैर-कानूनी हिरासत के लिए ज़िम्मेदारी तय करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए।
बेंच ने सोरांव SHO के व्यवहार पर भी नाराज़गी जताई और निर्देश दिया कि अगर जांच में उनकी लापरवाही पाई जाती है तो कोर्ट की नाराज़गी को उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए।
यह स्पष्ट करते हुए कि पुलिस कानून और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सुरक्षा उपायों के अनुसार याचिकाकर्ता को फिर से गिरफ्तार कर सकती है, बेंच ने उन्हें तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
इसके साथ ही बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका का निपटारा कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट इमरान उल्लाह पेश हुए, जिनकी सहायता एडवोकेट देवेश कुमार शुक्ला ने की।
Case Title : Ravi Chaurasiya And Another vs. State Of U.P. And 4 Others 2026 LiveLaw (AB) 804