इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 38 के तहत पुलिस को किसी संदिग्ध को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील की मौजूदगी के अधिकार के बारे में औपचारिक गिरफ्तारी से पहले भी बताना होगा। पुलिस किसी व्यक्ति को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किए बिना थाने बुलाकर कई घंटे पूछताछ करके इस कानूनी सुरक्षा से बच नहीं सकती।

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की डिवीजन बेंच ने कहा कि पुलिस यदि किसी संदिग्ध को पूछताछ के लिए थाने लाती है तो उस समय भी उसे अपने पसंद के वकील को साथ रखने के अधिकार की जानकारी देना पुलिस का दायित्व है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि वकील को पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहना अनिवार्य होगा।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को पहले संदिग्ध के रूप में थाने बुलाकर पांच-छह घंटे तक पूछताछ करना और फिर उसके कथित आत्म-दोषी बयान के आधार पर उसे आरोपी बना देना संविधान के तहत आत्म-दोषारोपण के खिलाफ अधिकार का उल्लंघन होगा, खासकर तब जब पूछताछ के दौरान उसे वकील की मौजूदगी के अपने अधिकार की जानकारी ही न दी गई हो।

हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस किसी व्यक्ति को पूछताछ के लिए थाने लाने के बाद यह नहीं कह सकती कि चूंकि उस समय औपचारिक गिरफ्तारी नहीं हुई, इसलिए धारा 38 के तहत वकील के अधिकार की जानकारी देने की जिम्मेदारी भी नहीं थी। कोर्ट के अनुसार, संदिग्ध को उसके अधिकार के बारे में गिरफ्तारी या आरोपी बनाए जाने से पहले ही जानकारी दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पुलिस संदिग्ध को उसके वकील के अधिकार की जानकारी दिए बिना पूछताछ करती है, तो उस पूछताछ के दौरान प्राप्त जानकारी, विशेष रूप से आत्म-दोषी बयान, कानून की नजर में प्रभावित होगा।

यह टिप्पणी प्रयागराज के सोरांव थाने से जुड़ी रवि चौरसिया की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसे अवैध रूप से हिरासत में रखा था।

मामले के अनुसार, पुलिस ने 14 सितंबर 2026 को रवि चौरसिया को अयोध्या से अपने कब्जे में लिया और सोरांव थाने ले आई। हालांकि, उस समय उसकी गिरफ्तारी दर्ज नहीं की गई। अगले दिन 15 सितंबर को उसकी मां उसकी स्थिति जानने के लिए थाने पहुंचीं। इसके बाद हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई।

16 सितंबर को पुलिस ने सुबह 10:45 बजे उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार दिखाया। गिरफ्तारी की प्रविष्टि जनरल डायरी में की गई, उसका चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया और उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया। मजिस्ट्रेट ने उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान थाने की CCTV फुटेज भी तलब की थी। कोर्ट ने पाया कि थाना प्रभारी और जांच अधिकारी द्वारा दाखिल जवाबी हलफनामे में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि याचिकाकर्ता पुलिस की हिरासत में था।

पुलिस अधिकारियों ने जनरल डायरी में उसकी मौजूदगी दर्ज नहीं होने को अनजाने में हुई गलती बताया। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह ऐसी चूक थी, जिसे अवैध हिरासत के आरोप से बचने के लिए जानबूझकर किया गया।

कोर्ट ने कहा कि बाद में की गई औपचारिक गिरफ्तारी और उसके बाद हुई न्यायिक हिरासत पहले से हुई अवैध हिरासत को वैध नहीं बना सकती। हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के तहत अधिकारों के संदर्भ में 'फ्रूट ऑफ द पॉइजनस ट्री' सिद्धांत को लागू किया। इसका आशय यह है कि गैरकानूनी तरीके से प्राप्त मूल कार्रवाई या साक्ष्य से पैदा होने वाली बाद की कार्रवाई भी कानूनी जांच के दायरे में रहती है।

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता को 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया, लेकिन इस अवधि में उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने इसे हिरासत की प्रारंभिक अवैधता माना और कहा कि बाद की गिरफ्तारी तथा रिमांड उस अवैधता को ठीक नहीं कर सकते।

कोर्ट ने रवि चौरसिया को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने उसे 30 हजार रुपये का मुआवजा देने का भी आदेश दिया और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की।

इस फैसले में हाईकोर्ट ने एक ओर पुलिस के लिए यह स्पष्ट किया कि पूछताछ के दौरान वकील के अधिकार की जानकारी देने की जिम्मेदारी केवल औपचारिक गिरफ्तारी के बाद तक सीमित नहीं है, वहीं दूसरी ओर यह भी रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति की शुरुआती अवैध हिरासत के बाद की गई गिरफ्तारी और रिमांड उस शुरुआती गैरकानूनी कार्रवाई को वैध नहीं बना सकती।

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: