प्रतिनिधि क्षमता में मुकदमा दायर करने के लिए कोर्ट की अनुमति न लेने पर केस खारिज नहीं होगा, फैसला सिर्फ पक्षकारों पर लागू होगा: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 1 नियम 8 के तहत प्रतिनिधि क्षमता में दायर मुकदमा केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वादी ने कोर्ट से प्रतिनिधि मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं मांगी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में मुकदमा वादियों का व्यक्तिगत मुकदमा माना जाएगा और उसका फैसला केवल उस मुकदमे के पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा, पूरे समुदाय पर नहीं।
जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने कहा कि आदेश 1 नियम 8 का उद्देश्य यह है कि यदि कोर्ट से अनुमति मांगी जाती है और वह अनुमति दे दी जाती है तो मुकदमे को प्रतिनिधि क्षमता में दायर माना जाएगा। वहीं, यदि अनुमति नहीं मांगी गई या नहीं दी गई तो मुकदमे का परिणाम केवल उसमें शामिल पक्षकारों के बीच अंतिम माना जाएगा।
मामला वर्ष 1970 में दायर किए गए एक मुकदमे से जुड़ा है। वादी-प्रतिवादियों का दावा है कि विवादित जमीन का इस्तेमाल 300 वर्षों से अधिक समय से मुस्लिम कब्रिस्तान के रूप में होता रहा है। उन्होंने प्रतिवादी-अपीलकर्ता को जमीन में हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग की थी। वादपत्र में कहा गया था कि मुकदमा आदेश 1 नियम 8 के तहत प्रतिनिधि क्षमता में दायर किया जा रहा है। हालांकि, वादियों ने कोर्ट से प्रतिनिधि मुकदमा चलाने की अनुमति कभी नहीं मांगी। परिणामस्वरूप न तो अनुमति दी गई और न ही उसे खारिज किया गया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी-अपीलकर्ता का कहना है कि उसने जमीन खरीदी थी और उस पर निर्माण करने का अधिकार रखता है। उसका यह भी दावा था कि जमीन कभी कब्रिस्तान नहीं रही और अगर रही भी हो तो उसका केवल एक छोटा हिस्सा ही कब्रिस्तान के रूप में इस्तेमाल हुआ था।
ट्रायल कोर्ट ने 29 जनवरी 1976 को मुकदमे का आंशिक रूप से फैसला करते हुए कब्रिस्तान वाली जमीन को उस हिस्से से अलग कर दिया, जिस पर प्रतिवादी-अपीलकर्ता का दावा था। इसके बाद हमीरपुर के जिला जज ने 5 अक्टूबर 1977 को यह फैसला रद्द कर मामला दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेज दिया।
दोबारा सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने 26 अप्रैल 1978 को पूरे मुकदमे का फैसला वादियों के पक्ष में किया। कोर्ट ने माना कि 18.14 एकड़ की पूरी जमीन का इस्तेमाल हमेशा से कब्रिस्तान के रूप में होता रहा है। प्रतिवादी-अपीलकर्ता की अपील भी 2 मार्च 1981 को खारिज कर दी गई।
इसके बाद 1981 में दूसरी अपील हाईकोर्ट में दाखिल की गई। शुरुआत में अपील को कानून के दो सवालों पर स्वीकार किया गया। हालांकि, अपीलकर्ता के वकील ने सुनवाई के दौरान माना कि ये दोनों सवाल पूरी तरह कानूनी सवाल नहीं बल्कि कानून और तथ्यों से जुड़े मिश्रित सवाल हैं। इसके बाद उन्होंने दलील दी कि आदेश 1 नियम 8 के तहत कोर्ट की अनुमति न लिए जाने के कारण मुकदमा शुरुआत में ही खारिज किया जाना चाहिए। इसके लिए उन्होंने कल्याण सिंह बनाम श्रीमती छोटी व अन्य मामले में दिए फैसले का हवाला दिया।
अपीलकर्ता की ओर से यह भी स्वीकार किया गया कि यह आपत्ति न तो ट्रायल कोर्ट के सामने उठाई गई थी और न ही जिला कोर्ट के समक्ष। वादी-प्रतिवादियों ने इसी आधार पर इस दलील का विरोध किया।
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर पाया कि निचली अदालतों द्वारा दिए गए एक जैसे निष्कर्षों में कोई अवैधता नहीं है। दोनों अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों और मौके के निरीक्षण की रिपोर्ट पर भरोसा किया, जिसे बड़े स्तर पर चुनौती भी नहीं दी गई।
इसके बाद हाईकोर्ट ने आदेश 1 नियम 8 के तहत अनुमति के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट के हरि राम बनाम ज्योति प्रसाद व अन्य मामले में दिए फैसले पर भरोसा किया। सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले में माना कि आदेश 1 नियम 8 का पालन न होने के कारण मुकदमा खराब नहीं होगा, यदि मुकदमा ऐसे व्यक्ति ने दायर किया, जिसका अपना अधिकार प्रभावित हो रहा है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कल्याण सिंह मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि किसी मुकदमे को प्रतिनिधि क्षमता में चलाने के लिए कोर्ट की अनुमति अनिवार्य है। हालांकि, उसी फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि समुदाय का कोई सदस्य सामुदायिक संपत्ति में अपने अधिकार की रक्षा या उसे स्थापित करने के लिए आदेश 1 नियम 8 का पालन किए बिना भी मुकदमा दायर कर सकता है।
इन कानूनी सिद्धांतों को लागू करते हुए जस्टिस सौरभ श्याम शमेशरी ने कहा कि मौजूदा मामले में वादियों ने मुकदमा आदेश 1 नियम 8 के तहत दायर किया, लेकिन उन्होंने कोर्ट से अनुमति नहीं मांगी। इसलिए मुकदमा प्रतिनिधि क्षमता में दायर मुकदमा नहीं माना जाएगा। इसे केवल वादियों द्वारा अपने अधिकारों के लिए दायर मुकदमा माना जाएगा और इसका परिणाम केवल मुकदमे के पक्षकारों के बीच लागू होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामले में मुकदमे का फैसला पूरे मुस्लिम समुदाय पर बाध्यकारी नहीं होगा। आदेश 1 नियम 8 के तहत अनुमति न मांगे जाने या अनुमति न दिए जाने का एकमात्र प्रभाव यही है कि मुकदमे का परिणाम उसमें शामिल पक्षकारों के बीच ही अंतिम माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस आधार पर उठाया गया सवाल कानून का कोई महत्वपूर्ण सवाल नहीं बनता। चूंकि दूसरी अपील में कोई महत्वपूर्ण कानूनी सवाल मौजूद नहीं था, इसलिए हाईकोर्ट ने अपील खारिज की।