इलाहाबाद हाईकोर्ट में बार (वकीलों) और बेंच (जजों) के बीच चल रहे तनाव के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (HCBA) ने अवध बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों को पत्र लिखा। इसमें उन्होंने अवध बार से दखल देने और जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल को न्यायिक कार्यवाही में हिस्सा लेने से रोकने के लिए उचित कदम उठाने की मांग की।

31 अक्टूबर 2026 को लिखे गए इस पत्र में, जो अवध बार एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष और महासचिव को संबोधित है, HCBA ने 28 और 29 अक्टूबर 2026 को जस्टिस देशवाल द्वारा पारित दो आदेशों पर चिंता जताई है। एसोसिएशन का आरोप है कि ये आदेश वकीलों के समुदाय के हितों और उनकी प्रतिष्ठा के खिलाफ हैं।

HCBA ने बताया कि वकीलों ने इन दो आदेशों का विरोध किया, जिसके चलते जस्टिस देशवाल दोनों ही दिन अपने कोर्ट रूम में नहीं बैठ सके।

पत्र में विशेष रूप से जज को न्यायिक कार्यवाही से रोकने के लिए "समुचित कार्यवाही" (Appropriate Action) करने की मांग की गई। HCBA ने अवध बार के नए नेतृत्व से इस मामले में सामूहिक कदम उठाने का आग्रह किया।

पत्र में जिन दो आदेशों का जिक्र है, वे इस प्रकार हैं:

• जमानत अर्जी संख्या 32917/2026, देवेंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, दिनांक 28 अक्टूबर 2026।

• जमानत अर्जी संख्या 36572/2026, अंकित सिंह उर्फ ​​अनंत सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, दिनांक 29 अक्टूबर 2026।

एसोसिएशन का आरोप है कि 29 अक्टूबर का आदेश बार के सदस्यों के बीच फूट डालने की कोशिश थी। उन्होंने इस तरह के प्रयास को निंदनीय बताया। उन्होंने आगे कहा कि इन आदेशों से वकीलों के समुदाय के हितों और उनकी प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ा है।

इस पत्र पर एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष, सीनियर एडवोकेट डॉ. सी.पी. उपाध्याय और महासचिव संतोष कुमार मिश्रा ने हस्ताक्षर किए।

जस्टिस देशवाल ने कौन से आदेश पारित किए? ये दोनों आदेश 27 अक्टूबर को जस्टिस अजय भनोट के कोर्ट रूम में हुई एक घटना के बाद हुए विरोध-प्रदर्शनों और अदालती कार्यवाही में बाधा डालने की घटनाओं के मद्देनजर पारित किए गए।

इससे पहले, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने जस्टिस भनोट पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अदालती कार्यवाही के दौरान एक वकील को अपमानित किया और एक सीनियर वकील का मजाक उड़ाया। इस घटना के बाद वकीलों ने हाई कोर्ट में विरोध-प्रदर्शन किया।

देवेंद्र कुमार मामले में जस्टिस देशवाल ने 28 अक्टूबर को आदेश पारित किया। इसमें उन वकीलों की पहचान करने का निर्देश दिया गया, जिन्होंने जस्टिस अजय भनोट से जुड़ी 27 अक्टूबर की घटना के विरोध में कोर्ट रूम के बाहर गलियारों में कथित तौर पर नारे लगाए और अदालती कार्यवाही में बाधा डाली।

कोर्ट ने दर्ज किया कि कुछ वकीलों ने कोर्ट रूम के बाहर गलियारे में जोर-जोर से बोलना शुरू कर दिया, जिससे अदालती कार्यवाही में रुकावट आई।

जस्टिस देशवाल ने उनके इस आचरण को "पूरी तरह से अवमाननापूर्ण" (Contemptuous) करार दिया। उन्होंने कहा कि इन वकीलों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के लिए इस मामले को उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के पास भेजा जा सकता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनके खिलाफ अदालत की अवमानना ​​की कार्यवाही शुरू की जा सकती है।

आदेश में वकीलों के विरोध-प्रदर्शन से पैदा हुई बाधा और कोर्ट के कामकाज पर इसके असर का भी जिक्र किया गया।

इसके अलावा, 'अंकित सिंह उर्फ ​​अनंत सिंह' मामले में जस्टिस देशवाल ने 29 अक्टूबर को आदेश पारित किया। यह आदेश उन वकीलों को रोकने की घटना के संबंध में था, जो अपने मुकदमों की पैरवी करने के लिए उनके कोर्ट रूम में प्रवेश करना चाहते थे।

जज ने गौर किया कि हाईकोर्ट के वकील होने का दावा करने वाले कुछ लोगों ने बिना किसी वजह के अन्य वकीलों को उनके कोर्ट रूम में जाने से रोक दिया। उन्होंने बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी से इस मामले को देखने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि कोर्ट की गरिमा बनी रहे।

जस्टिस देशवाल ने कहा:

"यह कोर्ट इस बात से अवगत है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले अधिकांश वकील न केवल बहुत ईमानदार हैं, बल्कि उनका व्यवहार भी बहुत अच्छा है। यह हैरानी की बात है कि बार एसोसिएशन की ओर से कोई निर्देश न होने के बावजूद, हाईकोर्ट के वकील होने का दावा करने वाले कुछ लोगों ने अन्य वकीलों को बिना किसी कारण के इस कोर्ट में प्रवेश करने से रोक दिया। इसलिए बार एसोसिएशन की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी से अनुरोध है कि वे इस मामले को देखें, ताकि कोर्ट की गरिमा बनी रहे—जिसमें निजी और सरकारी, दोनों तरह के वकील शामिल हैं।"

HCBA (हाईकोर्ट बार एसोसिएशन) ने इन दो आदेशों पर आपत्ति जताई है, खासकर वकीलों के आचरण और बार के कामकाज को लेकर की गई टिप्पणियों और निर्देशों पर। उन्होंने इस संबंध में अवध बार एसोसिएशन से भी समर्थन मांगा।

इसी तरह की एक अन्य घटना में जस्टिस देशवाल ने 30 अक्टूबर को पारित एक और आदेश में कोर्ट की कार्यवाही में बाधा डालने की घटनाओं और बार (वकीलों) तथा बेंच (जजों) के बीच मतभेदों पर चिंता जताई।

जस्टिस देशवाल ने युवा वकीलों को सलाह दी कि वे सोशल मीडिया पर 'लाइक्स' बढ़ाने के बजाय अपनी पढ़ाई और मुकदमों की तैयारी पर ध्यान दें।

उन्होंने आगे कहा कि युवा वकील ही हाईकोर्ट का भविष्य हैं, क्योंकि आगे चलकर वे वरिष्ठ वकील और हाईकोर्ट के जज बनते हैं।

जस्टिस देशवाल ने जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान ये टिप्पणियां कीं। इस मामले में ऐसे आरोप सामने आए थे कि कुछ वकीलों ने अन्य वकीलों को अपने मुकदमों की पैरवी के लिए कोर्ट रूम में जाने से जबरन रोका, और यहां तक ​​कि सरकारी वकीलों को भी कोर्ट रूम से बाहर निकाल दिया।

जस्टिस देशवाल ने अपने आदेश में दर्ज किया कि आवेदक के वकील जमानत अर्जी पर बहस करने के लिए पेश नहीं हो सके, क्योंकि कुछ वकीलों ने उन वकीलों को जबरन रोक दिया, जो अपने मुकदमों की पैरवी करना चाहते थे। उन्होंने यह भी दर्ज किया कि सरकारी वकीलों को जबरन कोर्ट रूम से बाहर निकाल दिया गया। सुनवाई के दौरान, जज ने एक महिला वकील के रोने की आवाज़ सुनी। वह अपने मामले की सुनवाई के लिए कोर्ट रूम में जाना चाहती थी, लेकिन कथित तौर पर उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया और उसे ज़बरदस्ती अंदर जाने से रोक दिया गया।

इस तरह के बर्ताव को बार (वकीलों के निकाय) और कोर्ट, दोनों की प्रतिष्ठा और गरिमा के लिए नुकसानदेह बताते हुए बेंच ने कहा:

"कोर्ट की कार्यवाही को केवल इसलिए नहीं रोका जा सकता, क्योंकि वकीलों का एक छोटा समूह नहीं चाहता कि कोर्ट काम करे, जबकि ज़्यादातर वकील अपने मामलों की पैरवी करना चाहते हैं।"

कोर्ट ने हाईकोर्ट के कामकाज और वकीलों से जुड़ी कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स का भी संज्ञान लिया, जिन्हें युवा वकीलों ने पोस्ट किया था। कोर्ट ने चेतावनी दी कि बिना सोचे-समझे शेयर की गई अधूरी और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई जानकारी, "बार और बेंच के बीच मतभेदों को बेवजह बढ़ा सकती है।"

इस संबंध में कोर्ट ने युवा वकीलों को सलाह दी कि वे सोशल मीडिया पर 'लाइक्स' के पीछे भागने के बजाय, अपना करियर बनाने के लिए अपनी पढ़ाई और केस की तैयारी पर ध्यान दें।

कोर्ट ने आगे कहा कि समाज में वकीलों का सम्मान इसलिए है, क्योंकि जनता को हाई कोर्ट पर भरोसा है। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखना सिर्फ जजों की ही नहीं, बल्कि वकीलों की भी ज़िम्मेदारी है।

कोर्ट ने कहा,

"अगर हाईकोर्ट से जनता का भरोसा उठ गया तो माफिया और कुछ मनमाने सरकारी अधिकारी वकीलों को परेशान करने लगेंगे। ऐसा हाल ही में कुछ ज़िलों में हुआ भी है, जिसका ज़िक्र कई अख़बारों में भी किया गया।"

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वकीलों की गरिमा में निजी वकील और सरकारी वकील, दोनों शामिल हैं, क्योंकि सरकारी वकील भी बार के ही सदस्य होते हैं।

कोर्ट ने उम्मीद जताई कि इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की नई चुनी गई कार्यकारिणी इस मुद्दे पर विचार करेगी और हाईकोर्ट की गरिमा बनाए रखने के लिए उचित कदम उठाएगी।

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