मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जुआ मामले की जांच नहीं कर सकती पुलिस : इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-05-13 17:42 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सार्वजनिक स्थान या सड़क पर जुआ खेलने से जुड़ा Public Gambling Act, 1867 की धारा 13 के तहत अपराध गैर-संज्ञेय (Non-Cognizable) है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस जांच शुरू नहीं कर सकती और बिना वारंट गिरफ्तारी भी नहीं की जा सकती।

जस्टिस संजय कुमार पचौरी की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश को रद्द कर दिया।

मामला मिर्जापुर का था, जहां पुलिस ने चार लोगों को ताश के पत्तों और नकदी के साथ पकड़ने के बाद Public Gambling Act, 1867 की धारा 13 के तहत FIR दर्ज की थी। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने संज्ञान ले लिया।

आरोपी की ओर से एडवोकेट श्रेय सिंह और एडवोकेट रागिनी गुप्ता ने दलील दी कि यूपी संशोधन अधिनियम, 1961 के तहत धारा 13 में अधिकतम सजा छह महीने है। चूंकि CrPC की पहली अनुसूची के अनुसार तीन साल से कम सजा वाले अपराध गैर-संज्ञेय माने जाते हैं, इसलिए पुलिस मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना जांच नहीं कर सकती थी।

हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि CrPC की धारा 155(2) के तहत गैर-संज्ञेय अपराध की जांच मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना नहीं हो सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे साबित हो कि कथित जुआ किसी सार्वजनिक स्थान पर खेला जा रहा था।

कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की भी आलोचना की और कहा कि उसने कानून और तथ्यों पर विचार किए बिना संज्ञान आदेश पारित कर दिया।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पूरी आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश को रद्द कर दिया।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पिछले वर्ष हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ ने इसी धारा 13 के अपराध को संज्ञेय माना था, क्योंकि कानून में पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी की शक्ति दी गई है।

Tags:    

Similar News