बैंक गारंटी पर अपर्याप्त स्टाम्प ड्यूटी एक ठीक होने योग्य कमी, इस आधार पर बोली खारिज करना 'मनमाना': इलाहाबाद हाईकोर्ट

Update: 2026-06-03 13:26 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने पिछले हफ़्ते यह टिप्पणी की कि बैंक गारंटी पर स्टाम्प ड्यूटी में कमी महज़ एक 'चूक' और एक 'ठीक होने योग्य कमी' है, और इसका इस्तेमाल किसी बोली लगाने वाले को बाहर करने के लिए नहीं किया जा सकता।

जस्टिस शेखर बी सराफ़ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की बेंच ने इसके परिणामस्वरूप प्रतिवादी (पूर्वोत्तर रेलवे) द्वारा तैयार की गई वित्तीय बोली की तालिका यह देखते हुए रद्द की कि उसने याचिकाकर्ता (M/S कोंकण रेलवे कॉर्पोरेशन लिमिटेड) की तकनीकी बोली को इस 'कमज़ोर' आधार पर खारिज कर दिया था।

कोर्ट ने आगे प्रतिवादी को निर्देश दिया कि वह सभी बोली लगाने वालों की वित्तीय बोलियों पर, जिसमें याचिकाकर्ता की बोली भी शामिल है, फिर से विचार करे और याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई बैंक गारंटी पर अपर्याप्त स्टाम्प ड्यूटी के कारण आने वाली बाधा को ध्यान में न रखे।

संक्षेप में मामला

याचिकाकर्ता ने पूर्वोत्तर रेलवे द्वारा जारी किए गए टेंडर के लिए अपनी तकनीकी-वाणिज्यिक बोली को अचानक खारिज किए जाने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।

19 मई, 2026 को याचिकाकर्ता को स्वचालित ईमेल मिला, जिसमें केवल यह कहा गया कि उसकी तकनीकी बोली इसलिए खारिज कर दी गई, क्योंकि वह "पात्रता मानदंडों को पूरा नहीं करती थी"। इसमें इस बारे में कोई ज़िक्र नहीं था कि कौन से मानदंड पूरे नहीं हुए।

इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने शुरू में पिछली टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगाई और प्रतिवादियों को 24 घंटे के भीतर एक तर्कसंगत आदेश देने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद अधिकारियों ने अस्वीकृति का एक औचित्य प्रस्तुत किया, जिसमें कहा गया कि यूपी स्टाम्प अधिनियम के तहत आवश्यक मात्रा में स्टाम्प पेपर जमा न करने के कारण एक "कानूनी चूक" है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर वकील ने इस स्पष्टीकरण को यह तर्क देते हुए चुनौती दी कि स्टाम्प ड्यूटी में कमी एक ठीक होने योग्य कमी है और स्टाम्प अधिनियम वित्तीय उपाय है, जिसे किसी मुक़दमेबाज़ को तकनीकी बारीकियों से लैस करने के लिए नहीं बनाया गया।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि टेंडर आमंत्रित करने वाला कोई भी प्राधिकरण नोटिस में उल्लिखित हर नियम और शर्त को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है और वह किसी भी शर्त को माफ करने का हकदार है, भले ही वह तकनीकी अनियमितता के आधार पर ही क्यों न हो।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील ने यह दलील दी कि वित्तीय बोली पहले ही खोली जा चुकी थी और L-1 घोषित किया जा चुका था। इस तरह वर्तमान टेंडर में L-1 के पक्ष में एक अधिकार उत्पन्न हो चुका था। इन दलीलों पर विचार करते हुए बेंच ने शुरू में ही प्रतिवादी के उस बाद के कदम पर आपत्ति जताई, जिसमें उसने बैंक गारंटी में अपर्याप्त स्टांप ड्यूटी के आधार पर अस्वीकृति को सही ठहराने के लिए एक कारण पेश किया।

बेंच ने टिप्पणी की,

"हम तकनीकी टेंडरों को अस्वीकार करने के कारणों में अथॉरिटी द्वारा किए गए इस तरह के सुधार की सराहना नहीं करते हैं, क्योंकि कानून यह स्पष्ट रूप से स्थापित करता है कि अथॉरिटी कानूनी कार्यवाही के दौरान पहले से लिए गए निर्णय के लिए कोई नया औचित्य गढ़ या जोड़ नहीं सकती है।"

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि अपर्याप्त स्टांप ड्यूटी एक ऐसा दोष था, जिसे सुधारा जा सकता था और संबंधित अथॉरिटी द्वारा इसे ठीक किया जा सकता था।

यह देखते हुए कि अथॉरिटी ने पहले एक अन्य टेंडर में याचिकाकर्ता से इसी तरह की बैंक गारंटी स्वीकार की थी, बेंच ने अथॉरिटी के इस कदम को "बदनीयत" (mala fide) माना और इसे केवल याचिकाकर्ता को 'बाहर करने' का एक प्रयास करार दिया, जिसने सबसे कम वित्तीय बोली (financial bid) जमा की थी।

जहां तक प्रतिवादियों की इस दलील का सवाल है कि वित्तीय बोली खोली जा चुकी थी, बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह भली-भांति स्थापित है कि कोई भी बोलीदाता—भले ही उसे सबसे ऊंची बोली लगाने वाला घोषित कर दिया गया हो—केवल इसी आधार पर अनुबंध दिए जाने की ज़िद करने का कोई अकाट्य अधिकार प्राप्त नहीं कर लेता है।

बेंच ने कहा,

"जब तक यह प्रक्रिया, लागू टेंडर शर्तों के अनुसार, एक पूर्ण अनुबंधित संबंध का रूप नहीं ले लेती, तब तक बोलीदाता की स्थिति अनंतिम ही बनी रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने मेरठ विकास प्राधिकरण बनाम एसोसिएशन ऑफ़ मैनेजमेंट स्टडीज़ (2009) 6 SCC 171 में यह व्यवस्था दी है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत आने वाला राज्य या अथॉरिटी, सबसे कम बोली लगाने वाले (L1 बोलीदाता) की बोली स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है। वह केवल मनमानी और पक्षपात किए बिना कार्य करने के लिए बाध्य है।"

इन टिप्पणियों के आलोक में बेंच ने 19 मई, 2026 को तैयार की गई वित्तीय बोलियों की सारणी (Tabulation) रद्द की और अथॉरिटी को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता सहित सभी बोलीदाताओं की वित्तीय बोलियों पर पुनर्विचार करें।

याचिकाकर्ता को यह भी निर्देश दिया गया कि वह 3 जून, 2026 को या उससे पहले स्टांप ड्यूटी में रह गई कमी को तत्काल पूरा करे, ताकि वित्तीय बोली पर विचार करने की प्रक्रिया को शीघ्रता से संपन्न किया जा सके।

इन निर्देशों के साथ ही याचिका का निपटारा किया गया।

Case Title: M/S Konkan Railway Corporation Ltd. Thru. Auth. Mr. Om Prakash Verma vs. Union Of India Thru. General Manager (N.E.R.) Gorakhpur U.P. And 5 Others 2026 LiveLaw (AB) 310

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