भगवा ने मारा' टिप्पणी पर अफसर को मिली राहत बरकरार: हाईकोर्ट ने खारिज की यूपी सरकार की याचिका
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2018 के कासगंज हिंसा प्रकरण से जुड़े कथित फेसबुक पोस्ट के मामले में उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ अधिकारी रश्मि वरुण को दी गई राहत बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज की। अदालत ने उस आदेश को सही ठहराया, जिसके तहत लोक सेवा अधिकरण ने अधिकारी पर लगाई गई विभागीय सजा रद्द की थी।
जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने कहा कि अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई केवल समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के आधार पर की गई, जबकि उन्होंने शुरू से ही उस खबर में उनके कथित बयान को गलत बताया था।
अदालत ने टिप्पणी की,
"उत्तर प्राप्त होने के बावजूद अधिकारियों ने मूल फेसबुक टिप्पणियों को रिकॉर्ड पर लाने की भी जहमत नहीं उठाई और केवल समाचार पत्र में प्रकाशित खबर के आधार पर ही कार्रवाई जारी रखी।"
मामला उस कथित फेसबुक पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें रश्मि वरुण पर कासगंज हिंसा के दौरान मारे गए युवक के संबंध में भगवा ने मारा जैसी टिप्पणी करने और यह कहने का आरोप था कि तिरंगा रैली में डॉ. भीमराव आंबेडकर नजर नहीं आए तथा संभवतः उन्हें भगवा रंग ने पीछे छोड़ दिया।
इसी कथित पोस्ट को आधार बनाकर फरवरी, 2018 में उनके खिलाफ आरोपपत्र जारी किया गया। आरोप था कि उनकी टिप्पणी सरकार की आलोचना है, जो उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली, 1956 के तहत दुराचार की श्रेणी में आती है।
हालांकि, अधिकारी ने अपने जवाब में कहा था कि समाचार पत्र में प्रकाशित सामग्री उनकी वास्तविक टिप्पणी नहीं थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि पूरी टिप्पणी पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि उन्होंने सरकार या उसके कामकाज के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की थी।
इसके बावजूद नवंबर 2019 में उन्हें दो वेतनवृद्धियां स्थायी रूप से रोकने और निंदा प्रविष्टि देने की सजा दी गई। बाद में लोक सेवा अधिकरण ने इस सजा को रद्द कर दिया था।
राज्य सरकार ने अधिकरण के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि अधिकारी ने सरकार की आलोचना कर गंभीर दुराचार किया और उन्हें नियमों के अनुसार दंडित किया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने माना कि कथित टिप्पणी को देखने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसमें सरकार की आलोचना की गई। अदालत ने कहा कि अधिकारी ने केवल रैली में डॉ. आंबेडकर की अनुपस्थिति पर टिप्पणी की थी।
खंडपीठ ने कहा,
"हम यह समझने में असमर्थ हैं कि इस टिप्पणी को सरकार की आलोचना कैसे माना जा सकता है, जबकि इसमें न तो सरकार का कोई उल्लेख है और न ही उसकी किसी नीति का। जिस 'तिरंगा रैली' का जिक्र किया गया, वह एक निजी रैली थी और उसका सरकार या उसकी किसी एजेंसी से कोई संबंध नहीं था।"
अदालत ने यह भी कहा कि जब अधिकारी ने मीडिया रिपोर्ट से स्वयं को अलग बताते हुए उसका खंडन किया, तब जांच अधिकारियों का दायित्व था कि वे वास्तविक फेसबुक टिप्पणियों का सत्यापन करते। ऐसा न करना जांच प्रक्रिया की गंभीर कमी है।
लोक सेवा अधिकरण के निष्कर्षों से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जांच रिपोर्ट में अधिकारी के जवाब पर समुचित विचार नहीं किया गया। अदालत ने यह भी माना कि दंडादेश "बिना उचित मनन और विचार" के पारित किया गया।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका खारिज की और अधिकारी को दी गई राहत बरकरार रखी।