कॉकरोच जनता पार्टी' के खिलाफ जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इलाहाबाद हाईकोर्ट का इनकार, कर्नाटक हाईकोर्ट जाने की दी छूट

Update: 2026-06-02 12:20 GMT

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' और उसके संस्थापक अभिजीत दीपके की गतिविधियों की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) से जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया।

जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता एस. विग्नेश शिशिर कर्नाटक के बेंगलुरु के स्थायी निवासी हैं, इसलिए उन्हें सबसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख करना चाहिए था।

अदालत ने यह भी पाया कि मामले का उत्तर प्रदेश से कोई प्रत्यक्ष और विशेष संबंध नहीं है। इसी आधार पर पीठ ने कहा कि "फोरम नॉन कन्वीनियंस" के सिद्धांत के तहत यह याचिका उसके समक्ष सुनवाई योग्य नहीं है।

हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता को सक्षम अधिकार क्षेत्र वाली अदालत में नई याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता देते हुए वर्तमान याचिका वापस लेने की अनुमति दी।

याचिका में दावा किया गया कि अभिजीत दीपके की अपंजीकृत राजनीतिक इकाई 'कॉकरोच जनता पार्टी' विदेशी और कथित तौर पर गहरे तंत्र से वित्तपोषित संगठन है, जिसे भारत विरोधी तत्वों ने देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों के लिए खड़ा किया।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि यह सुनियोजित डिजिटल अभियान है जिसका उद्देश्य देश के युवाओं को प्रभावित करना, सार्वजनिक अव्यवस्था को बढ़ावा देना और भारत सरकार के प्रति असंतोष पैदा करना है।

याचिका में यह भी कहा गया कि फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, सिग्नल, एक्स सहित विभिन्न मंचों पर कई सामाजिक माध्यम खातों के जरिए कथित तौर पर राष्ट्रविरोधी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं और युवाओं को उकसाया जा रहा है।

इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने 'कॉकरोच जनता पार्टी' नाम से जुड़े सभी सामाजिक माध्यम अकाउंट्स, पेजेज़, चैनलों, ग्रुप्स और प्रोफाइलों को स्थायी रूप से बंद करने और अवरुद्ध करने का भी अनुरोध किया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता स्वयं बेंगलुरु के निवासी हैं और उन्होंने राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे को उठाया, इसलिए उन्हें पहले कर्नाटक हाईकोर्ट जाना चाहिए था।

अदालत ने कहा,

"याचिकाकर्ता बेंगलुरु का निवासी है। यदि वह ऐसा चाहता है तो उसे पहले कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। वर्तमान याचिका में हमें उत्तर प्रदेश से संबंधित कोई विशेष तथ्य नहीं मिलता, इसलिए यह याचिका इस अदालत में सुनवाई योग्य नहीं है।"

याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया कि उन्होंने कुछ शिकायतें लखनऊ के एक पते से भेजी थीं, लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। खंडपीठ ने कहा कि इससे पहले सुरक्षा संबंधी मामले में स्वयं याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष यह स्वीकार किया कि वह बेंगलुरु के निवासी हैं और उसी आधार पर राहत की मांग की थी।

जब अदालत ने अधिकार क्षेत्र के अभाव में याचिका के अस्वीकार्य होने का संकेत दिया, तब याचिकाकर्ता ने सक्षम अदालत में नई याचिका दायर करने की स्वतंत्रता के साथ इसे वापस लेने की अनुमति मांगी। इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए उन्हें उक्त स्वतंत्रता प्रदान की।

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