हाईकोर्ट का यूपी सीएम से आग्रह- अब समय आ गया है कि बड़े अफ़सरों को आपराधिक रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जाए; जानिए क्यों

Update: 2026-06-04 09:58 GMT

बुधवार को दिए गए एक अहम आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि वह इस बात को स्वीकार करें कि अब वह समय आ गया है, जब वरिष्ठ अफ़सरों और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को उनके विभागों या उनके अधीन काम करने वालों की चूकों के लिए जवाबदेह, और यहां तक कि आपराधिक रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराया जाए।

जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कहा कि राज्य को "उच्च ज़िम्मेदारी" (Superior Responsibility) का सिद्धांत अपनाना चाहिए, जिसके तहत प्रशासनिक पदानुक्रम में वरिष्ठ अफ़सरों को जवाबदेह ठहराया जाता है।

बेंच ने आगे कहा कि उचित मामलों में उन्हें अपने अधीन काम करने वालों द्वारा किए गए गलत कामों या चूकों को रोकने या दंडित करने में उनकी विफलता के लिए आपराधिक रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

बेंच ने अपने 16-पृष्ठ के आदेश में कहा,

"वरिष्ठ अफ़सरों को अपने अधीन काम करने वालों के आचरण और प्रदर्शन के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि सार्वजनिक सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी सुनिश्चित करना उनकी पेशेवर और प्रशासनिक, दोनों तरह की ज़िम्मेदारी है।"

उल्लेखनीय है कि बेंच ने संस्थागत पतन के दो अलग-अलग रूपों के प्रति आगाह किया:

"मन का भ्रष्टाचार" (corruption of the mind), जिसके तहत आधिकारिक सत्ता की आड़ में निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को जानबूझकर विकृत किया जाता है। "पैसे का भ्रष्टाचार" (corruption of the purse), जिसके तहत सार्वजनिक पद को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का ज़रिया बना लिया जाता है।

बेंच ने कहा,

"ऐसी जवाबदेही को वैध रूप से आपराधिक दायित्व तक बढ़ाया जा सकता है, जहां रोकने या दंडित करने में विफलता के कारण भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी, रिकॉर्ड को जानबूझकर छिपाना, सरकारी आदेशों और राजपत्र अधिसूचनाओं की अवमानना और 'राज्य की नीतियों' तथा 'कार्यक्रमों' (जैसे कि संगठित और संस्थागत भ्रष्टाचार के प्रति 'शून्य सहनशीलता' की नीति) को लागू करने में विफलता जैसे आपराधिक कृत्य होते हैं..."

मामले की पृष्ठभूमि

ये टिप्पणियां सिंगल जज द्वारा व्यवसायी (याचिकाकर्ता-अवनीश कुमार अग्रवाल) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की गईं। इस याचिका में बरेली स्पेशल कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता के पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (NOC) जारी करने की उसकी अर्जी खारिज की गई।

इसके अतिरिक्त,

"कुछ अज्ञात शरारती तत्वों" द्वारा सरकारी कार्यालय में आग लगाकर आधिकारिक रिकॉर्ड को नष्ट करने के आरोप भी लगाए गए।

हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने दलील दी कि एक FIR में जांच लगभग 2 दशकों से लंबित है। दूसरी FIR में 18 वर्षों की देरी के बाद वर्ष 2024 में ही आरोप-पत्र (Charge-Sheet) दाखिल किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि आरोप उन्हें परेशान करने के लिए ही लगाए गए और हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच ने उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही पर पहले ही रोक लगा दी थी।

इस पृष्ठभूमि में याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह NOC पाने का हकदार है। हालांकि, राज्य के लिए अतिरिक्त सरकारी वकील ने आरोपों की गंभीरता का हवाला दिया और याचिका में मांगी गई राहत का विरोध किया।

हाईकोर्ट की टिप्पणियां

बेंच ने 'मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' मामले में हाईकोर्ट के 2023 के आदेश का ज़िक्र किया, जिसमें राज्य सरकार को एक उच्च-स्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया। इस समिति का काम भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों में सरकारी विभागों द्वारा दर्ज FIR की जांच की निगरानी के लिए दिशानिर्देश तैयार करना था।

उस मामले में अन्य निर्देशों के अलावा, डिवीज़न बेंच ने निर्देश दिया था कि जाँच को चरणबद्ध तरीके से और तेज़ी से पूरा किया जाए।

मौजूदा मामले में बेंच को बताया गया कि 2023 के फैसले के बाद उच्च-स्तरीय समिति का गठन दिसंबर 2025 में ही किया गया—लगभग दो साल की अत्यधिक देरी के बाद—और वह भी तब, जब इस कोर्ट ने मौजूदा मामले का संज्ञान लिया।

हालांकि, बेंच ने इस मामले को और आगे बढ़ाना उचित नहीं समझा और उसने इस मुद्दे को इस उम्मीद और अपेक्षा के साथ छोड़ दिया कि हाईकोर्ट के 2023 के फैसले में दिए गए निर्देशों का भी समय-सीमा के भीतर पालन किया जाएगा।

अलग होने से पहले बेंच ने हालांकि यह बात नोट की कि कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने में एक बड़ी रुकावट नौकरशाही के कुछ वर्गों की मानसिकता में है, जिनका रवैया "समावेशी नहीं" है और जो अपनी मनमानी शक्तियों को बनाए रखने को "अपने आप में एक लक्ष्य" मानते हैं।

कोर्ट ने आगे कहा कि "अपनी मनमानी शक्तियों को खोने का यही डर" ही लोक प्रशासन में "लालफीताशाही" के पीछे मुख्य वजह है।

जस्टिस दिवाकर ने राज्य को याद दिलाया कि नियम और कानून ठीक इसी अनियंत्रित शक्ति को सीमित करने और एक नियम-बद्ध संस्कृति को लागू करने के लिए ही बनाए गए हैं।

बेंच ने आगे नोट किया कि फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसने हाई-पावर्ड कमेटी द्वारा लिए गए फैसलों की प्रगति के बारे में अपडेट के लिए तीन महीने से ज़्यादा इंतज़ार किया, लेकिन फैसला सुनाए जाने की तारीख तक उसे कोई जानकारी नहीं मिली।

इस स्थिति को 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताते हुए बेंच ने AGA को याद दिलाया कि मुख्य सचिव राज्य प्रशासन की संरचना की मुख्य कड़ी होते हैं, और जो लोग उनका प्रतिनिधित्व करते हैं, उनसे असाधारण सतर्कता की उम्मीद की जाती है।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"सम्मानित एडिशनल एडवोकेट जनरल को यह समझना चाहिए कि मुख्य सचिव, जो कैबिनेट और मंत्रिपरिषद के सचिव के रूप में काम करते हैं, और उस हैसियत से नागरिक प्रशासन, नीति कार्यान्वयन और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय से जुड़े सभी मामलों पर माननीय मुख्यमंत्री और माननीय मंत्रिपरिषद के मुख्य सलाहकार के रूप में सेवा करते हैं, एक विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त पद पर आसीन हैं। साथ ही हर मायने में राज्य प्रशासन की संरचना की मुख्य कड़ी हैं। इसलिए यह अनिवार्य है कि सम्मानित विधि अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय असाधारण सतर्कता, सावधानी और संस्थागत जिम्मेदारी की गहरी भावना के साथ आचरण करें।"

इसके साथ ही बेंच ने अपने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया कि वे तुरंत इस फैसले की एक प्रमाणित प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजें। साथ में यह निर्देश भी दें कि हाई-पावर्ड कमेटी की कार्यवाही समयबद्ध और प्रभावी तरीके से पूरी की जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह इस फैसले को सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह इसका व्यक्तिगत रूप से अवलोकन कर सकें और कोर्ट की चिंताओं पर उचित विचार कर सकें।

मामले के गुण-दोषों के आधार पर कोर्ट ने याचिका स्वीकार की और क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण, बरेली को निर्देश दिया कि वह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार याचिकाकर्ता के पक्ष में पासपोर्ट जारी करें/नवीनीकृत करें।

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