यह देखते हुए कि कोई प्रशासनिक समिति किसी न्यायिक आदेश को रोक कर नहीं रख सकती, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में पुलिस थानों में CCTV कैमरों के कामकाज की जांच के लिए 'सरप्राइज इंस्पेक्शन' (अचानक निरीक्षण) के निर्देशों को जारी करने में हुई देरी पर नाराजगी जताई।

कोर्ट ने कहा,

"यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक न्यायिक आदेश को सिर्फ इसलिए लंबित रखा गया, क्योंकि समिति उस पर विचार नहीं कर सकी।"

जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की बेंच को बताया गया कि कोर्ट का पिछला आदेश - जिसमें उत्तर प्रदेश के सभी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेटों (CJM) और न्यायिक मजिस्ट्रेटों (JM) को कोर्ट के समय के बाद पुलिस थानों का औचक निरीक्षण करने का निर्देश दिया गया - अभी तक सभी जिला जजों तक नहीं पहुँचाया गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि संबंधित समिति अभी भी इस पर मंजूरी देने के लिए विचार कर रही थी।

कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह एक "स्थापित कानून" है कि किसी न्यायिक आदेश को प्रशासनिक स्तर पर कोई समिति रोक कर नहीं रख सकती।

कोर्ट ने आगे कहा कि अगर समिति को लगता है कि आदेश कानूनी रूप से सही नहीं है तो वह इस मामले को 'लिटिगेशन कमेटी' (मुकदमा समिति) के पास भेज सकती है ताकि आदेश को चुनौती दी जा सके, लेकिन वह इस पर चुपचाप बैठकर इसे रोक नहीं सकती।

कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब वह धोखाधड़ी के एक मामले में आरोपी को मिली जमानत रद्द करने के लिए संदीप सिंह सोलंकी द्वारा दायर एक आवेदन पर सुनवाई कर रहा है।

कोर्ट ने गौर किया कि 19 फरवरी 2026 के एक आदेश के जरिए, कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी जिलों के CJM या संबंधित JM अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले पुलिस थानों का कोर्ट के समय के बाद औचक निरीक्षण कर सकते हैं ताकि CCTV कैमरों के कामकाज की जांच की जा सके।

यह निरीक्षण संबंधित जिला जज को पहले से सूचित करके किया जाना था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 'परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह' मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं, यह जांचने के लिए किया जाने वाला ऐसा निरीक्षण, न्यायिक अधिकारी के आधिकारिक कर्तव्यों का ही हिस्सा माना जाएगा।

पिछले आदेश में यह भी कहा गया:

"इस निरीक्षण के दौरान, सभी पुलिस अधिकारी उन्हें पूरा सहयोग देंगे। यदि किसी न्यायिक अधिकारी के काम में कोई बाधा डाली जाती है या उनके प्रति कोई अनादर दिखाया जाता है, तो इसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।"

हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि इस आदेश को उत्तर प्रदेश के सभी जिला जजों तक पहुंचाया जाए।

इस मामले की सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने 'महेंद्र गौर व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य' मामले में हाल ही में आई डिवीजन बेंच के फैसले का भी जिक्र किया। उस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 4 लोगों को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखने के लिए एक स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) को जिम्मेदार ठहराया और राज्य सरकार को उन लोगों को कुल 65,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने एक मामले में पुलिस थाने के CCTV सिस्टम के खराब होने और CCTV फुटेज न मिलने को लेकर भी SHO से सवाल किया।

मामले की गंभीरता देखते हुए जस्टिस देशवाल ने संबंधित समिति को निर्देश दिया कि वे 19 फरवरी के अपने आदेश को उत्तर प्रदेश के सभी जिला जजों तक पहुंचाएं।

8 अक्टूबर के अपने आदेश में कोर्ट ने उस मामले पर भी गौर किया, जहां एक व्यक्ति को गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया। उसे मुआवजा मिलना था, लेकिन आरोप है कि मुआवजा नहीं दिया गया। साथ ही जब वह मुआवजा पाने के लिए ललितपुर के जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास गया तो पुलिस अधिकारियों ने उसे परेशान किया।

कोर्ट ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट का मुआवजे की अर्जी पर कोई कार्रवाई न करना 'अदालत की अवमानना' (Contempt) के समान है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसे इस बात की जानकारी नहीं है कि उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) ने पहले दिए गए आदेश के अनुसार, दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की है या नहीं।

इसलिए कोर्ट ने DGP को निर्देश दिया कि वे अतिरिक्त सरकारी वकील (Additional Government Advocate) को इस बारे में जानकारी दें कि क्या दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई है या नहीं।

रजिस्ट्रार (अनुपालन) को भी निर्देश दिया गया कि वे इस आदेश की एक प्रति उत्तर प्रदेश के DGP और ललितपुर के जिला मजिस्ट्रेट को भेजें, ताकि आदेश का पालन सुनिश्चित हो सके।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी।

Case Title : Sandeep Singh Solanki v. State of U.P. and Another

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