इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act) की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता पाने के लिए सामान्यतः लिखित आवेदन देना जरूरी है। यह मांग अलग आवेदन के जरिए या लिखित जवाब में की जा सकती है। हालांकि, अपवादस्वरूप उन मामलों में मौखिक मांग भी स्वीकार की जा सकती है, जहां अदालत को गुजारा भत्ता पाने के अधिकार और उसकी राशि पर विवाद का फैसला नहीं करना हो।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि धारा 25 के प्रावधानों को पढ़ने से स्पष्ट है कि स्थायी गुजारा भत्ते की मांग के लिए आवेदन आवश्यक है। अदालत ने इस सवाल पर विचार करते हुए कहा कि उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट का कोई ऐसा आधिकारिक फैसला नहीं मिला, जिसमें इस मुद्दे का स्पष्ट निर्धारण किया गया हो।

मामले में पति-पत्नी का विवाह 11 फरवरी 2005 को आगरा में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ। दोनों 20 फरवरी 2005 से 21 सितंबर 2006 तक दिल्ली में साथ रहे। पति ने क्रूरता और परित्याग के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। वहीं, पत्नी ने धारा 9 के तहत वैवाहिक संबंधों की बहाली के लिए याचिका दाखिल की थी।

फैमिली कोर्ट ने 18 मई 2012 को एक साझा फैसले के जरिए पति की तलाक याचिका स्वीकार की और पत्नी की वैवाहिक संबंध बहाल करने की याचिका खारिज की। इसके खिलाफ पत्नी ने फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 19 के तहत हाईकोर्ट में अपील की।

परित्याग के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कहा कि पति इस आधार पर तलाक पाने का हकदार नहीं है। पति की अपनी याचिका और साक्ष्यों से पता चलता है कि पत्नी 21 सितंबर 2006 को उसके कहने पर वैवाहिक घर से गई, जबकि तलाक की याचिका 26 सितंबर 2006 को ही दाखिल कर दी गई।

अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आईबी) के तहत परित्याग का आधार लेने के लिए याचिका दाखिल करने से ठीक पहले कम से कम दो साल तक लगातार परित्याग होना जरूरी है। इस मामले में यह शर्त पूरी नहीं हुई।

खंडपीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे साबित हो कि पत्नी वैवाहिक संबंधों को स्थायी रूप से समाप्त करना चाहती है। वर्ष 2007 में दोबारा साथ रहने की उसकी कोशिश भी इस निष्कर्ष के विपरीत थी कि उसने विवाह को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया था।

हालांकि, क्रूरता के आधार पर तलाक देने के फैमिली कोर्ट के निष्कर्ष में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया। अदालत ने कहा कि वैवाहिक घर के भीतर होने वाली शारीरिक हिंसा के मामलों में स्वतंत्र गवाह या अन्य साक्ष्य मिलना आमतौर पर कठिन हो सकता है। ऐसे मामलों में पीड़ित पति या पत्नी की गवाही ही मुख्य साक्ष्य हो सकती है। परिवार की बदनामी से बचने के लिए कोई व्यक्ति तत्काल मेडिकल जांच कराने से भी बच सकता है।

हाईकोर्ट ने पाया कि पति की जिरह के दौरान ऐसा कोई महत्वपूर्ण तथ्य सामने नहीं आया, जिससे उसकी गवाही अविश्वसनीय साबित हो। इसलिए फैमिली कोर्ट का क्रूरता संबंधी निष्कर्ष न तो विकृत था और न ही उपलब्ध साक्ष्यों के विपरीत।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पति के खिलाफ लंबित दहेज संबंधी आपराधिक कार्यवाही को अपने आप वैवाहिक क्रूरता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, क्योंकि उन मामलों के आरोपों का अभी परीक्षण होना बाकी था। पीठ ने कहा कि केवल आपराधिक कार्यवाही शुरू होने या उसके लंबित रहने से यह साबित नहीं होता कि आरोप झूठे हैं या वे अपने आप वैवाहिक क्रूरता का आधार बनते हैं।

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की उस दलील को भी गलत ठहराया, जिसमें विवाह के पूरी तरह टूट जाने को तलाक का आधार माना गया। अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 में विवाह के अपूरणीय रूप से टूट जाने को स्वतंत्र आधार के रूप में मान्यता नहीं दी गई।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट के जिन फैसलों पर फैमिली कोर्ट ने भरोसा किया, वे संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दिए गए। अनुच्छेद 142, अनुच्छेद 141 की तरह कानून घोषित करने वाला प्रावधान नहीं है। इसके तहत पारित आदेश संबंधित पक्षों पर बाध्यकारी होते हैं, लेकिन जरूरी नहीं कि वे हर मामले में मिसाल के रूप में लागू हों। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी शक्ति न तो विचारण न्यायालय के पास है और न ही प्रथम अपील की सुनवाई करने वाली अदालत के पास।

अपील पर बहस पूरी होने के बाद दोनों पक्षों के वकीलों ने अपने मुवक्किलों के निर्देश पर अदालत को बताया कि तलाक की डिक्री को पारित हुए लगभग 14 वर्ष हो चुके हैं और पति-पत्नी 21 सितंबर 2006 से अलग रह रहे हैं। लगभग 20 साल से अलग रहने की स्थिति में न्याय के हित में पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता दिया जाना उचित होगा। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि ऐसा करने के लिए विवाह के अपूरणीय रूप से टूटने को तलाक का स्वतंत्र आधार मानना जरूरी नहीं है।

हालांकि, अदालत ने पाया कि पत्नी ने स्थायी गुजारा भत्ते के लिए कोई लिखित आवेदन दाखिल नहीं किया था और न ही अपने लिखित जवाब में इसकी मांग की थी। मांग मौखिक रूप से रखी गई थी।

इस मुद्दे पर अदालत ने कहा कि स्थायी गुजारा भत्ते का अधिकार केवल वैधानिक अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन के मौलिक अधिकार और विशेष रूप से गरिमा के साथ जीने के अधिकार से भी जुड़ा हुआ है।

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि स्थायी गुजारा भत्ते की राशि तय करने के लिए दोनों पक्षों की आय, खर्च, देनदारियों और आर्थिक क्षमता पर विचार करना जरूरी है। किसी भी पक्ष को अचानक ऐसी मांग का सामना नहीं करना चाहिए, जिसके लिए उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर न मिला हो। इसलिए दोनों पक्षों को मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाना चाहिए।

अदालत ने यह भी कहा कि पहले से दिए जा रहे गुजारा भत्ते की रकम को अंतिम निर्धारण के समय समायोजित करने की जरूरत पड़ सकती है। इसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24, हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 18 और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 20 के तहत मिलने वाली राशि शामिल हो सकती है।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सामान्य नियम के तहत स्थायी गुजारा भत्ते के लिए लिखित आवेदन दाखिल किया जाना चाहिए, ताकि दूसरे पक्ष को आपत्ति दर्ज करने और साक्ष्य पेश करने का अवसर मिल सके। अपवादस्वरूप मौखिक मांग तब स्वीकार की जा सकती है, जब गुजारा भत्ता पाने के अधिकार और उसकी राशि को लेकर अदालत के सामने कोई विवाद तय करना बाकी न हो।

अदालत के स्पष्ट सवाल पर दोनों पक्षों के वकीलों ने पुष्टि की कि उनके मुवक्किल गुजारा भत्ता पाने के अधिकार और उसकी राशि, दोनों पर सहमत हैं। दोनों पक्षों ने नौ लाख रुपये की एकमुश्त राशि पर सहमति जताई। इसके बाद हाईकोर्ट ने पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ते के रूप में नौ लाख रुपये देने का आदेश दिया। यह रकम तीन महीने के भीतर डिमांड ड्राफ्ट के जरिए चुकानी होगी।

हाईकोर्ट ने क्रूरता के आधार पर हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(आईए) के तहत तलाक की डिक्री बरकरार रखी और वैवाहिक संबंधों की बहाली की याचिका खारिज किए जाने से भी सहमति जताई। इन निष्कर्षों के साथ अदालत ने अपील का निपटारा किया।

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