इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अस्थायी आधार पर नियुक्त कर्मचारी को सीधे सेवा में स्थायी नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कर्मचारी की सेवा में स्थायी करने का आदेश भर्ती, सेवा या नियमितीकरण से जुड़े नियमों के तहत जारी नहीं हुआ है, तो ऐसा आदेश शुरू से ही कानूनी रूप से अमान्य माना जाएगा और उसके आधार पर कर्मचारी को कोई कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार हासिल नहीं होता।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा कि निर्धारित भर्ती नियमों के बाहर की गई अस्थायी नियुक्ति केवल अंतरिम व्यवस्था होती है। बाद में जारी किसी प्रशासनिक आदेश के आधार पर ऐसी नियुक्ति अपने आप नियमित नियुक्ति में नहीं बदल सकती।

अदालत ने कहा कि अस्थायी कर्मचारी को पहले लागू नियमों के तहत नियमितीकरण की प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसमें चयन समिति द्वारा मूल्यांकन, अभिलेखों की जांच और स्थायी पद की उपलब्धता जैसे पहलू शामिल हैं। नियमितीकरण के बाद कर्मचारी को परिवीक्षा पर रखा जा सकता है। उसके बाद ही सेवा में स्थायी किए जाने का सवाल उठता है।

मामला महाराजगंज जिले में संग्रह अमीन के पद से जुड़ा है। अपीलकर्ताओं को वर्ष 1976 में मौसमी संग्रह अमीन के तौर पर नियुक्त किया गया। फरवरी 1990 में फरेंदा के तहसीलदार ने रिपोर्ट दी कि तहसील में संग्रह अमीन के आठ पद खाली हैं। इस रिपोर्ट के आधार पर फरेंदा के उपजिलाधिकारी ने 9 फरवरी 1990 को अपीलकर्ताओं को अस्थायी आधार पर संग्रह अमीन नियुक्त किया।

इसके बाद महाराजगंज के जिलाधिकारी ने 31 मार्च 1990 को उनकी सेवाएं समाप्त कीं। इसके लिए संग्रह अमीन के रिक्त पदों को भरने पर लगी रोक का हवाला दिया गया। इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई और अदालत ने सेवा समाप्ति के आदेश पर रोक लगाई। बाद में यह रोक वापस ले ली गई, क्योंकि संग्रह अमीन की नियुक्ति का अधिकार जिलाधिकारी के बजाय उपजिलाधिकारी के पास था।

मामला लंबित रहने के दौरान फरेंदा के उपजिलाधिकारी ने 13 मार्च 1991 को आदेश जारी कर अपीलकर्ताओं को सेवा में स्थायी किया। हालांकि, बाद में 6 नवंबर 1995 को उत्तर प्रदेश अस्थायी सरकारी सेवक सेवा समाप्ति नियमावली, 1975 के तहत उनकी सेवाएं फिर समाप्त कर दी गईं।

इस सेवा समाप्ति आदेश को 26 मई 2004 को रद्द किया और राज्य को कानून के अनुसार उचित आदेश पारित करने की स्वतंत्रता दी गई। इसके बाद उपजिलाधिकारी ने 25 जनवरी 2006 को कारण बताओ नोटिस जारी किया और 19 अप्रैल 2006 के आदेश से अपीलकर्ताओं की अस्थायी नियुक्ति और 1991 में किए गए स्थायीकरण, दोनों को निरस्त किया।

इस आदेश के खिलाफ दायर याचिका को सिंगल बेंच ने खारिज किया। इसके बाद मामला खंडपीठ के सामने पहुंचा।

अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उनकी नियुक्ति स्थायी रिक्तियों के खिलाफ सक्षम नियुक्ति प्राधिकारी ने की थी और यह नियुक्ति 29 मार्च 1986 के शासनादेश के आधार पर हुई। यह भी कहा गया कि स्थायीकरण का आदेश रिक्त पदों की स्थिति की जांच के बाद जारी किया गया।

अपीलकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि उनके खिलाफ किसी धोखाधड़ी या गलत जानकारी देने का आरोप नहीं था। संग्रह अमीनों की 15 जून 1993 को प्रकाशित संयुक्त वरिष्ठता सूची में भी उनके नाम 103 से 109 तक दर्ज थे। इसलिए राज्य के अधिकारियों की गलती का खामियाजा उन्हें नहीं भुगतना चाहिए।

दलील दी गई कि 1976 से 1990 तक मौसमी संग्रह अमीन के तौर पर करीब 14 वर्ष की सेवा, इसके बाद अस्थायी सेवा और अंतरिम आदेशों के कारण लगातार काम करने की अवधि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह भी दावा किया गया कि उत्तर प्रदेश अस्थायी नियुक्तियों के नियमितीकरण से संबंधित 1979 की नियमावली के तहत उनकी सेवाएं स्वतः नियमित हो गईं।

राज्य की ओर से इसका विरोध किया गया। राज्य ने कहा कि मौसमी संग्रह अमीनों की नियुक्ति उत्तर प्रदेश संग्रह नियमावली के अनुच्छेद 19 के तहत होती है। यह केवल प्रशासनिक निर्देश हैं और इनमें वैधानिक नियमों का बल नहीं है। ऐसी नियुक्ति मौसम की अवधि या 89 दिनों तक, जो भी पहले हो, के लिए होती है।

राज्य ने यह भी कहा कि उत्तर प्रदेश संग्रह अमीन सेवा नियमावली, 1974 में संग्रह अमीन के पद पर अस्थायी नियुक्ति का प्रावधान नहीं है। मौसमी संग्रह अमीन केवल 35 प्रतिशत कोटे के तहत चयन समिति की प्रक्रिया से संग्रह अमीन के पद पर आ सकता है।

हाईकोर्ट ने 13 मार्च 1991 के स्थायीकरण आदेश की वैधता पर विचार करते हुए कहा कि उस आदेश में यह नहीं बताया गया कि उसे जारी करने वाले अधिकारी के पास ऐसा आदेश जारी करने का कौन सा अधिकार था। आदेश में किसी लागू भर्ती नियम, सेवा नियम या नियमितीकरण नियम का भी उल्लेख नहीं है।

अदालत ने कहा कि 1974 की सेवा नियमावली के तहत भी कोई भर्ती प्रक्रिया नहीं अपनाई गई थी और इस तथ्य को अपीलकर्ताओं के वकील ने भी स्वीकार किया।

1979 की नियमितीकरण नियमावली के आधार पर भी अदालत ने पाया कि 1991 में लागू नियमों के तहत अपीलकर्ता 1 अक्टूबर 1986 की निर्धारित अंतिम तारीख की शर्त पूरी नहीं करते थे। इसके अलावा, 13 मार्च 1991 तक उन्होंने तीन वर्ष की लगातार अस्थायी सेवा भी पूरी नहीं की, क्योंकि उनकी नियुक्ति केवल 9 फरवरी 1990 को हुई।

अदालत ने यह भी कहा कि 2001 में किए गए तीसरे संशोधन के जरिए नियमितीकरण की अंतिम तारीख 30 जून 1998 तक बढ़ाई गई, लेकिन अपीलकर्ताओं ने नियम लागू होने के बाद नियमितीकरण के लिए अपनी सेवाओं पर विचार किए जाने का अनुरोध नहीं किया।

खंडपीठ ने कहा,

“सेवा कानून में स्थायीकरण सामान्यतः स्थायी नियुक्ति को मानकर चलता है, जबकि इस मामले में अपीलकर्ताओं की ऐसी नियुक्ति नहीं हुई।”

अदालत ने इस दलील को भी खारिज किया कि लंबे समय तक प्रशासनिक आदेश लागू रहने के कारण राज्य अब उस स्थायीकरण को चुनौती नहीं दे सकता। खंडपीठ ने कहा कि कानून के विपरीत जारी प्रशासनिक आदेश को केवल लंबे समय तक लागू रहने के आधार पर वैध नहीं बनाया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी ऐसे आदेश को, जिसे कानून का समर्थन हासिल नहीं है, उसके लागू रहने की अवधि के आधार पर वैध नहीं माना जा सकता। इसलिए स्थायीकरण के 13 मार्च 1991 के आदेश को बनाए रखने के लिए रोक या अधिकार के सिद्धांत का सहारा नहीं लिया जा सकता।

अपीलकर्ताओं ने अन्य कर्मचारी गुलाम हुसैन के मामले का भी हवाला दिया, जिसकी सेवा समाप्ति समान परिस्थितियों में रद्द कर दी गई। हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के तहत समानता का अर्थ यह नहीं है कि राज्य अपनी पहले की गलती को दोहराने के लिए बाध्य हो। किसी व्यक्ति को गलत तरीके से मिली राहत के आधार पर दूसरे व्यक्ति को भी वही राहत नहीं दी जा सकती।

अपीलकर्ताओं की लंबी सेवा के दावे पर भी अदालत ने राहत देने से इनकार किया। खंडपीठ ने कहा कि उनकी सेवा का आगे जारी रहना अंतरिम न्यायिक आदेशों पर आधारित था। अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले राज्य कर्नाटक बनाम उमा देवी का उल्लेख किया, जिसमें ऐसे कर्मचारियों को मुकदमेबाजी के दौरान जारी सेवा की स्थिति में बताया गया और कहा गया कि अदालत के आदेश के संरक्षण में जारी सेवा अपने आप स्थायी नियुक्ति या नियमितीकरण का अधिकार नहीं देती।

हाईकोर्ट ने अपने फुल बेंच के फैसले जहाज पाल बनाम जिला निरीक्षक विद्यालय का भी हवाला दिया और कहा कि केवल समय बीत जाने या अंतरिम आदेशों के कारण सेवा जारी रहने से ऐसा आदेश वैध नहीं हो जाता, जो शुरुआत से ही कानून के विपरीत था।

खंडपीठ ने कहा,

“केवल समय बीत जाने या अंतरिम आदेशों के कारण सेवा जारी रहने से ऐसा आदेश वैध नहीं हो सकता, जो शुरू से ही अमान्य है।”

अदालत ने यह भी कहा कि यदि यह मान भी लिया जाए कि उपजिलाधिकारी को अपने पूर्ववर्ती अधिकारी के आदेश की समीक्षा करने का अधिकार नहीं है, तब भी वह 19 अप्रैल 2006 के आदेश में हस्तक्षेप नहीं करेगी। ऐसा करने से 13 मार्च 1991 का वह स्थायीकरण आदेश फिर से प्रभावी हो जाता, जो कानून के अनुरूप नहीं है।

खंडपीठ ने कहा,

“हम अपने विवेकाधीन अधिकार का इस्तेमाल ऐसे आदेश को फिर से प्रभावी करने के लिए नहीं कर सकते, जो अन्यथा कानून के विपरीत है।”

हाईकोर्ट ने माना कि 13 मार्च 1991 के स्थायीकरण आदेश से अपीलकर्ताओं को कोई कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार हासिल नहीं हुआ। इसलिए उस आदेश के आधार पर जारी बाद के आदेश भी टिक नहीं सकते। अदालत ने एकल पीठ के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई और विशेष अपील खारिज की।

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