दुकानें तोड़ने से पहले दुकानदारों के पुनर्वास या मुआवजे पर विचार करें: इलाहाबाद हाईकोर्ट; अयोध्या DM के आचरण को बताया 'अत्यंत निंदनीय'
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अयोध्या में सरकारी अस्पताल के निर्माण के लिए छह दुकानदारों को उनकी दुकानें खाली कराए बिना और उन्हें पुनर्वास या मुआवजे का प्रस्ताव दिए बिना बेदखल करने और दुकानें ध्वस्त करने पर उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को फटकार लगाई है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने अयोध्या के जिलाधिकारी के आचरण को "अत्यंत निंदनीय" बताया। कोर्ट ने कहा कि 300 बिस्तरों वाले सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल का निर्माण जनहित में है, लेकिन अपनी दुकानों से आजीविका कमाने वाले दुकानदारों को वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना बाहर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों की कार्रवाई से याचिकाकर्ताओं की आजीविका प्रभावित हुई है और यह संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के तहत उनके अधिकारों का उल्लंघन है।
हाईकोर्ट मोहम्मद नईम और पांच अन्य दुकानदारों की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में अयोध्या के जिलाधिकारी द्वारा 31 जुलाई, 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, सीतापुर आई हॉस्पिटल सोसाइटी, फैजाबाद ने वर्ष 2000 में उन्हें 30 साल की लीज पर दुकानें आवंटित की थीं। ये आवंटन सीतापुर नेत्र चिकित्सालय कॉम्प्लेक्स नियमावली के तहत नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से किए गए थे।
नियमों के अनुसार, दुकानों के लिए ₹500 पंजीकरण शुल्क, ₹25,000 की सिक्योरिटी और न्यूनतम ₹80,000 प्रीमियम निर्धारित था। याचिकाकर्ताओं को 28 फरवरी, 2000 को कब्जा सौंपा गया था और किराया 1 मार्च, 2000 से देय था। नियमों में लीज की अवधि 30 वर्ष निर्धारित थी, जिसे प्रत्येक 30 वर्ष बाद नवीनीकृत किया जा सकता था।
कोर्ट ने कहा कि जब दुकानदारों को नियमों के तहत दुकानें आवंटित की गई थीं और वे वैध पट्टेदार बन गए थे, तो उनकी लीज समाप्त किए बिना और पुनर्वास या मुआवजे की कोई व्यवस्था किए बिना उन्हें दुकानें खाली करने के लिए कहना आश्चर्यजनक है।
अधिकारियों ने क्या दलील दी?
रिकॉर्ड के अनुसार, अयोध्या के जिलाधिकारी ने 26 जून, 2025 को नोटिस जारी कर दुकानदारों को बताया कि सीतापुर आई हॉस्पिटल, फैजाबाद की जमीन और उस पर बनी दुकानें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को हस्तांतरित कर दी गई हैं। दुकानदारों को 15 दिनों के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया।
इसके बाद दुकानदारों ने हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट ने उनकी याचिका का निस्तारण करते हुए जिलाधिकारी को उनके प्रतिवेदन पर निर्णय लेने और तब तक यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया था।
जिलाधिकारी ने 31 जुलाई, 2026 के आदेश में स्वीकार किया कि दुकानें संबंधित नियमों के तहत आवंटित की गई थीं। हालांकि, उन्होंने कहा कि जमीन 300 बिस्तरों वाले सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल के निर्माण के लिए आवश्यक है और दुकानदारों को वहां कारोबार जारी रखने का अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने अस्पताल निर्माण के जनहित को स्वीकार किया, लेकिन स्पष्ट किया कि इससे दुकानदारों की आजीविका और उनके लीज संबंधी अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि अपनी दुकानों से जीविका चलाने वाले लोगों को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था, पुनर्वास या नुकसान की भरपाई के बेदखल नहीं किया जा सकता।
अधिकारियों के आचरण को अत्यंत निंदनीय बताते हुए कोर्ट ने कहा कि इस कार्रवाई ने याचिकाकर्ताओं की आजीविका को प्रभावित किया है और उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया है।
कोर्ट ने क्या निर्देश दिए?
हाईकोर्ट ने राज्य के अधिकारियों को तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। इसमें यह स्पष्ट करना होगा कि बेदखल किए गए और ध्वस्त दुकानों के दुकानदारों के पुनर्वास या उन्हें मुआवजा देने के लिए क्या कदम प्रस्तावित हैं।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि जवाबी हलफनामा स्वास्थ्य एवं चिकित्सा विभाग के सचिव से नीचे के पद के अधिकारी द्वारा दाखिल नहीं किया जाएगा।
मामले को अगली सुनवाई के लिए 16 नवंबर को सूचीबद्ध किया गया है।