इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 326A (जिसमें एसिड आदि का इस्तेमाल करके जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाने पर सजा का प्रावधान है) लागू होने के लिए, एसिड से जलने के कारण शरीर के प्रभावित हिस्से पर लंबे समय तक रहने वाला असर होना चाहिए।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक 'सामान्य' जलन, जो बिना किसी निशान या शारीरिक कार्यक्षमता में कमी छोड़े 13 दिनों के भीतर ठीक हो जाती है, उसे इस धारा में बताए गए 'जलने' (Burn) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इस धारा के तहत ऐसी चोट आनी चाहिए, जिसका असर शरीर के प्रभावित हिस्से पर लंबे समय तक रहे और जो इतनी गंभीर हो कि वह उस हिस्से को बदल दे या काफी लंबे समय तक बुरी तरह प्रभावित करे।

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने कहा कि IPC की धारा 326A में इस्तेमाल शब्द 'जलने' (Burns) को, इस धारा में बताई गई अन्य प्रकार की चोटों के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए।

हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता को बरी नहीं किया। कोर्ट ने IPC की धारा 326A के तहत उसकी सजा रद्द की। इसके बजाय उसे IPC की धारा 324 (खतरनाक हथियारों या साधनों से जानबूझकर चोट पहुँचाना) के तहत दोषी ठहराया।

चूंकि आरोपी-अपीलकर्ता पहले ही IPC की धारा 324 के तहत तय अधिकतम सजा से अधिक समय तक जेल में रह चुका था, इसलिए कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया।

संक्षेप में मामला

अपीलकर्ता-आरोपी (तीरथराज) ने रायबरेली की सेशन कोर्ट द्वारा IPC की धारा 326A के तहत सुनाई गई सजा को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उसे पीड़ित पर एसिड अटैक करने के लिए 10 साल की कठोर कारावास की सजा और 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़ित की गर्दन, सिर, छाती, पीठ, कलाई और जांघ पर एसिड से जलन के निशान थे, जिससे उसके शरीर का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित हुआ था। उसे इलाज के लिए जिला अस्पताल भेजा गया।

हालांकि, हाईकोर्ट ने गौर किया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि पीड़ित ने आगे कोई इलाज कराया, या चोटों की प्रकृति और उनके लंबे समय तक रहने वाले असर के बारे में कोई विशेषज्ञ मेडिकल राय ली गई हो। अदालत ने 30 मार्च 2017 के एक मेडिकल सर्टिफिकेट पर भी विचार किया, जो घटना के 13 दिन बाद जारी किया गया। इस सर्टिफिकेट में पीड़ित के शरीर के किसी भी हिस्से पर कोई चोट या कोई स्पष्ट निशान दर्ज नहीं था।

सबूतों की जांच करने पर अदालत ने पाया कि चोटें 13 दिनों के भीतर ठीक हो गईं, और न तो कोई निशान बचा था और न ही शरीर के किसी अंग की कार्यक्षमता पर कोई बुरा असर पड़ा था।

अदालत ने IPC की धारा 326A का हवाला दिया, जिसमें एसिड आदि का इस्तेमाल करके जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाने के लिए सजा का प्रावधान है। इस धारा में कई तरह की चोटों का जिक्र है, जैसे कि स्थायी नुकसान, आंशिक नुकसान, विकृति, जलना, अंग-भंग होना, रूप-रंग बिगड़ना, विकलांगता या गंभीर चोट।

अदालत ने इस धारा में बताई गई अन्य चोटों के संदर्भ में 'जलने' (Burns) शब्द की जांच की।

'एजसडेम जेनेरिस' (Ejusdem Generis) के सिद्धांत को लागू करते हुए अदालत ने कहा कि इस शब्द को अलग से नहीं पढ़ा जा सकता, बल्कि इसे धारा 326A में बताई गई अन्य प्रकार की चोटों के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए।

अदालत ने टिप्पणी की,

" 'जलना' (urns) एक अस्पष्ट शब्द है। किसी व्यक्ति को अलग-अलग स्तर की जलन महसूस हो सकती है। IPC की धारा 326A में इस्तेमाल किए गए 'जलना' शब्द में यह नहीं बताया गया है कि यह कितना गंभीर है, इसलिए इसे इस धारा में इस्तेमाल किए गए अन्य शब्दों के संदर्भ में ही पढ़ा जाना चाहिए। धारा में इस्तेमाल किए गए अन्य शब्दों - जैसे स्थायी नुकसान, आंशिक नुकसान, विकृति, अंग-भंग होना, रूप-रंग बिगड़ना, विकलांगता या गंभीर चोट - का मतलब यह है कि चोट इतनी गंभीर होनी चाहिए कि शरीर का कोई अंग बदल जाए या लंबे समय तक बुरी तरह प्रभावित रहे। चोट का शरीर के उस हिस्से पर कोई स्थायी असर पड़ना चाहिए।"

इस संबंध में, अदालत ने माना कि एक सामान्य जलन, जो 13 दिनों के भीतर ठीक हो जाती है और जिसका कोई निशान नहीं बचता या जिससे शरीर के किसी अंग की कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता, उसे IPC की धारा 326A के तहत 'जलने' (Burns) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह मानते हुए कि IPC की धारा 326A के तहत अपराध नहीं बनता है, हाईकोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या अपीलकर्ता को फिर भी चोट पहुँचाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

कोर्ट ने पाया कि सबूतों से यह साबित होता है कि अपीलकर्ता ने पीड़िता पर कोई हानिकारक (जलन पैदा करने वाला) पदार्थ डाला था, जिससे उसे चोट पहुंची। इसके चलते कोर्ट ने IPC की धारा 326A के तहत मिली सजा को रद्द कर दिया और उसे IPC की धारा 324 के तहत दोषी ठहराया।

IPC की धारा 324 के तहत अधिकतम तीन साल की कैद, जुर्माना, या दोनों की सजा हो सकती है।

कोर्ट ने गौर किया कि अपीलकर्ता पहले ही तीन साल से अधिक समय तक जेल में रह चुका है। इसलिए कोर्ट ने कहा कि उसे जुर्माना भरने की जरूरत नहीं है, और निर्देश दिया कि अगर किसी अन्य मामले में उसकी जरूरत न हो, तो उसे रिहा कर दिया जाए।

Case Title : Teerathraj vs. State Of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Lko 2026 LiveLaw (AB) 903

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