सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

15 Feb 2026 9:00 AM IST

  • सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (09 फरवरी, 2026 से 13 फरवरी, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    राज्य आयोग न बनने पर उपभोक्ता अपीलें सुनेंगे हाईकोर्ट: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए छोटे राज्यों में उपभोक्ता आयोगों के प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने उन राज्यों में, जहां लंबित मामलों की संख्या कम होने के कारण पूर्णकालिक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (State Consumer Disputes Redressal Commission) का गठन “व्यावहारिक नहीं” माना गया है, वहां हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को उपभोक्ता अपीलों की सुनवाई करने का अधिकार प्रदान किया है।

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    सह-आरोपियों के बरी होने के आधार पर फरार आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि जो आरोपी जानबूझकर फरार होकर ट्रायल से बचता है, वह केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) का दावा नहीं कर सकता कि सह-आरोपियों को मुकदमे में बरी कर दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “समानता के सिद्धांत (Principle of Parity)” का लाभ ऐसे फरार आरोपी को नहीं दिया जा सकता।

    जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला उस आदेश से संबंधित था जिसमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने एक फरार घोषित आरोपी को केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत दे दी थी कि उसी एफआईआर में नामित अन्य सह-आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।

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    बैंक द्वारा लोन को NPA घोषित करना ही सीमा अवधि तय नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बैंक द्वारा लेखांकन या प्रावधान संबंधी उद्देश्यों से लोन को आंतरिक रूप से NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) के रूप में वर्गीकृत कर देना, अपने आप में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत सीमा अवधि की शुरुआत निर्धारित नहीं करता विशेषकर तब जब बाद में लोन का पुनर्गठन किया गया हो और नए समझौतों के माध्यम से देयता को स्वीकार किया गया हो।

    अदालत ने कहा कि बैंक अपने लेखा-जोखा में किसी लोन को किस प्रकार दर्शाता है यह सीमा अवधि की गणना के लिए निर्णायक नहीं है। यदि पुनर्गठन के दौरान नए कार्यशील पूंजी संघ समझौते निष्पादित किए गए हों और उनमें बकाया देनदारियों को स्वीकार किया गया हो तो ऐसे समझौते लोन को एक प्रकार से नई जीवन अवधि प्रदान करते हैं। ऐसी स्थिति में पुनर्गठन के बाद की NPA तिथियां सीमा अवधि निर्धारण के लिए प्रासंगिक होंगी।

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    सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए छोटे राज्यों में उपभोक्ता आयोगों के प्रभावी संचालन को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने उन राज्यों में, जहां लंबित मामलों की संख्या कम होने के कारण पूर्णकालिक राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (State Consumer Disputes Redressal Commission) का गठन “व्यावहारिक नहीं” माना गया है, वहां हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को उपभोक्ता अपीलों की सुनवाई करने का अधिकार प्रदान किया है।

    https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-high-courts-consumer-appeals-state-consumer-commission-523175

    सह-आरोपियों के बरी होने के आधार पर फरार आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि जो आरोपी जानबूझकर फरार होकर ट्रायल से बचता है, वह केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) का दावा नहीं कर सकता कि सह-आरोपियों को मुकदमे में बरी कर दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “समानता के सिद्धांत (Principle of Parity)” का लाभ ऐसे फरार आरोपी को नहीं दिया जा सकता।

    जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला उस आदेश से संबंधित था जिसमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने एक फरार घोषित आरोपी को केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत दे दी थी कि उसी एफआईआर में नामित अन्य सह-आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।

    https://hindi.livelaw.in/supreme-court/supreme-court-anticipatory-bail-absconding-accused-523172

    बैंक द्वारा लोन को NPA घोषित करना ही सीमा अवधि तय नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी बैंक द्वारा लेखांकन या प्रावधान संबंधी उद्देश्यों से लोन को आंतरिक रूप से NPA (गैर-निष्पादित परिसंपत्ति) के रूप में वर्गीकृत कर देना, अपने आप में दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता के तहत सीमा अवधि की शुरुआत निर्धारित नहीं करता विशेषकर तब जब बाद में लोन का पुनर्गठन किया गया हो और नए समझौतों के माध्यम से देयता को स्वीकार किया गया हो।

    अदालत ने कहा कि बैंक अपने लेखा-जोखा में किसी लोन को किस प्रकार दर्शाता है यह सीमा अवधि की गणना के लिए निर्णायक नहीं है। यदि पुनर्गठन के दौरान नए कार्यशील पूंजी संघ समझौते निष्पादित किए गए हों और उनमें बकाया देनदारियों को स्वीकार किया गया हो तो ऐसे समझौते लोन को एक प्रकार से नई जीवन अवधि प्रदान करते हैं। ऐसी स्थिति में पुनर्गठन के बाद की NPA तिथियां सीमा अवधि निर्धारण के लिए प्रासंगिक होंगी।

    https://hindi.livelaw.in/supreme-court/justice-ps-narasimha-justice-manoj-misra-supreme-court-523153

    जमानत के बाद हिरासत बढ़ाने के लिए लगातार FIR दर्ज करना प्रक्रिया का दुरुपयोग; अनुच्छेद 32 लागू करने का उपयुक्त मामला: सुप्रीम कोर्ट

    जमानत के बावजूद आरोपी को हिरासत में रखने के लिए लगातार FIR दर्ज करना प्रक्रिया का दुरुपयोग: सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी आरोपी को जमानत मिलने के बाद भी उसे हिरासत में बनाए रखने के उद्देश्य से लगातार नई FIR दर्ज करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग (abuse of process) है और ऐसे मामलों में संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप उचित है।

    जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की खंडपीठ ने यह आदेश उस याचिका पर सुनाया जिसमें आरोप लगाया गया था कि राज्य ने जानबूझकर आपराधिक प्रक्रिया का सहारा लेकर याचिकाकर्ता को “सलाखों के पीछे” बनाए रखा, जबकि उसे जमानत मिल चुकी थी।

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    आमतौर पर चार्जशीट फाइल होने तक एंटीसिपेटरी बेल पर रोक नहीं लगाई जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने माना कि चार्जशीट फाइल होने तक एंटीसिपेटरी बेल पर रोक नहीं लगाई जा सकती और यह आमतौर पर बिना किसी तय समय सीमा के जारी रहती है, जब तक कि खास कारण दर्ज न हों। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें पहले पुलिस रिपोर्ट फाइल होने तक ही प्रोटेक्शन सीमित करने के बाद दूसरी एंटीसिपेटरी बेल याचिका खारिज कर दी गई।

    Case : Sumit v. State of UP and another

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    टेलीकॉम स्पेक्ट्रम कम्युनिटी रिसोर्स, IBC इसकी ओनरशिप और कंट्रोल तय नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की ओनरशिप और कंट्रोल इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) से तय नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह एक आम भलाई है। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की बेंच ने कहा कि स्पेक्ट्रम संवैधानिक मायने में कम्युनिटी का मटेरियल रिसोर्स है। इसलिए स्पेक्ट्रम से आम भलाई को फायदा होना चाहिए, इसलिए इसका कंट्रोल नागरिकों के लिए सुरक्षित होना चाहिए।

    Case Title – State Bank of India v. Union of India & Ors. with connected cases

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    ज़मानत मिलने के बाद जोड़े गए अपराध के लिए आरोपी को गिरफ्तार करने के लिए कोर्ट की इजाज़त ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

    एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो आरोपी पहले से ज़मानत पर है, उसे जांच एजेंसी सिर्फ़ इसलिए दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती, क्योंकि चार्जशीट में कोई नया कॉग्निज़ेबल और नॉन-ज़मानती अपराध जोड़ दिया गया। कोर्ट ने साफ़ किया कि एजेंसी को नए जोड़े गए अपराध के संबंध में गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू करने से पहले ज़मानत देने वाली कोर्ट से सही ऑर्डर लेना होगा।

    Cause Title: SUMIT VERSUS STATE OF U P & ANR.

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    सुप्रीम कोर्ट ने सीनियर एडवोकेट्स को डेज़िग्नेट करने के लिए नई गाइडलाइंस नोटिफ़ाई कीं, पॉइंट सिस्टम और इंटरव्यू को हटाया गया

    सुप्रीम कोर्ट ने “इंडिया के सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीनियर एडवोकेट्स को डेज़िग्नेट करने के लिए गाइडलाइंस, 2026” को नोटिफ़ाई किया, जो जितेंद्र @ कल्ला बनाम राज्य (दिल्ली NCT सरकार) और अन्य (2025 INSC 667) में कोर्ट के 13 मई, 2025 के फ़ैसले के अनुसार 2023 की गाइडलाइंस की जगह लेंगी।

    जितेंद्र @ कल्ला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पॉइंट-सिस्टम और इंटरव्यू के आधार पर सीनियर एडवोकेट्स को डेज़िग्नेट करने को यह कहते हुए नामंज़ूर किया कि यह काम करने लायक नहीं है। प्रैक्टिस के सालों, रिपोर्ट किए गए फ़ैसलों, पब्लिकेशन वगैरह जैसे पैरामीटर के आधार पर पॉइंट-सिस्टम को इंदिरा जयसिंह I और इंदिरा जयसिंह II केस में दिए गए निर्देशों के हिसाब से सिस्टम को ज़्यादा ऑब्जेक्टिव बनाने के लिए बनाया गया।

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    ज्यूडिशियल सर्विस एग्जाम में भी आंसर की दोबारा जांच करना हाईकोर्ट के लिए सही नहीं : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को झारखंड हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह स्टेट सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) एग्जाम में आए 3 सवालों के सही होने की दोबारा जांच के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाए। कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को कुछ हद तक रद्द कर दिया, जिसमें कुछ सवालों के जवाब गलत पाए गए।

    चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच झारखंड पब्लिक सर्विसेज कमीशन (JPSC) की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी।

    Case Details : JHARKHAND PUBLIC SERVICE COMMISISON vs. THE STATE OF JHARKHAND| C.A. No. 001455 / 2026

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    CCS नियमों के तहत आने वाले सेंट्रल गवर्नमेंट के कर्मचारी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट से बाहर: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (11 फरवरी) को कहा कि डिपार्टमेंट ऑफ़ एटॉमिक एनर्जी (DAE) के तहत काम करने वाले तूतीकोरिन के हेवी वॉटर प्लांट (HWP) के रिटायर्ड कर्मचारी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 (PG Act) के तहत ग्रेच्युटी के हकदार नहीं हैं, क्योंकि वे सेंट्रल सिविल सर्विस (पेंशन) रूल्स, 1972 के तहत आने वाले सेंट्रल गवर्नमेंट के कर्मचारी हैं।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की, जिसमें अपील करने वालों, हेवी वॉटर प्लांट के रिटायर्ड कर्मचारियों ने CCS (पेंशन) रूल्स के तहत अपनी ग्रेच्युटी के कैलकुलेशन को चुनौती देते हुए कहा कि अगर उनकी ग्रेच्युटी पेमेंट ऑफ़ ग्रेच्युटी एक्ट के अनुसार तय की गई होती तो वे ज़्यादा रकम के हकदार होते। इसलिए उन्होंने अंतर वाली रकम के पेमेंट की मांग की।

    Cause Title: N. MANOHARAN VERSUS THE ADMINISTRATIVE OFFICER & ANR. (with connected cases)

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    SC/ST Act की धारा 14A के तहत अपील में SC/ST Act के आरोपों पर हाईकोर्ट को अपने हिसाब से फैसला लेना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST Act के तहत एक मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के हैंडलिंग की आलोचना की। साथ ही कहा कि अपराध की बेसिक बातें, यानी जानबूझकर जाति के आधार पर बेइज्जती या धमकी न देने के बावजूद, हाईकोर्ट ने क्रिमिनल केस आगे बढ़ाया।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SC/ST Act की धारा 14A के तहत अपील के अधिकार का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट रिविजनल या सुपरवाइजरी कोर्ट के तौर पर काम नहीं करता, बल्कि फर्स्ट अपील कोर्ट के तौर पर काम करता है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद चीज़ों की इंडिपेंडेंट जांच के बिना स्पेशल कोर्ट के ऑर्डर को बिना किसी मशीनी तरीके से कन्फर्म करना, अधिकार का इस्तेमाल करने में फेलियर माना जाएगा।

    Cause Title: DR. ANAND RAI VERSUS STATE OF MADHYA PRADESH & ANR.

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    जमानत को रकम जमा करने से नहीं जोड़ा जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया सिद्धांत, झारखंड हाइकोर्ट का सशर्त आदेश रद्द

    सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि नियमित या अग्रिम जमानत को किसी भी प्रकार की धनराशि जमा करने की शर्त से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराते हुए झारखंड हाइकोर्ट द्वारा पारित सशर्त जमानत आदेशों को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि गिरफ्तारी की स्थिति में आरोपियों को जमानत पर रिहा किया जाए।

    यह मामला एक पिता-पुत्र से जुड़ा है, जिन पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया गया। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने क्राफ्ट पेपर खरीदने के बाद 9 लाख का भुगतान नहीं किया। इस संबंध में FIR दर्ज हुई। गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए दोनों आरोपियों ने पहले सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद वे झारखंड हाइकोर्ट पहुंचे।

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    2013 भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 74 के तहत अपील दायर करने में देरी को माफ़ किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (9 फरवरी) को कहा कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजे और पारदर्शिता के अधिकार अधिनियम, 2013 (2013 अधिनियम) की धारा 74 के तहत अपील दायर करने में देरी को लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के तहत माफ़ किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा, "2013 अधिनियम की धारा 74, 1963 अधिनियम की धारा 5 के आवेदन को नहीं रोकती है।"

    Cause Title: THE DEPUTY COMMISSIONER AND SPECIAL LAND ACQUISITION OFFICER VERSUS M/S S.V. GLOBAL MILL LIMITED (with connected appeals)

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    सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल SIR की डेडलाइन बढ़ाने का निर्देश दिया, कहा- माइक्रो-ऑब्जर्वर आदेश पारित नहीं कर सकते

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को पश्चिम बंगाल में चुनावी रोल के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के संबंध में कई निर्देश जारी किए। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि वह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) को SIR ड्यूटी के लिए ग्रुप B अधिकारी उपलब्ध कराए, जो ECI द्वारा तैनात माइक्रो-ऑब्जर्वर की जगह ले सकते हैं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि दावों और आपत्तियों पर अंतिम आदेश केवल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) ही पारित कर सकते हैं और माइक्रो-ऑब्जर्वर केवल उनकी मदद कर सकते हैं।

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