सह-आरोपियों के बरी होने के आधार पर फरार आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती : सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

14 Feb 2026 4:25 PM IST

  • सह-आरोपियों के बरी होने के आधार पर फरार आरोपी को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि जो आरोपी जानबूझकर फरार होकर ट्रायल से बचता है, वह केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) का दावा नहीं कर सकता कि सह-आरोपियों को मुकदमे में बरी कर दिया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “समानता के सिद्धांत (Principle of Parity)” का लाभ ऐसे फरार आरोपी को नहीं दिया जा सकता।

    जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला उस आदेश से संबंधित था जिसमें मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने एक फरार घोषित आरोपी को केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत दे दी थी कि उसी एफआईआर में नामित अन्य सह-आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था।

    सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फरार आरोपी को अग्रिम जमानत देना “एक गलत मिसाल” स्थापित करता है और यह संदेश देता है कि जो सह-आरोपी कानून का पालन करते हुए ट्रायल में उपस्थित रहे, वे मानो गलत थे। ऐसा करना न्यायिक प्रक्रिया से बचने वालों को प्रोत्साहित करेगा।

    जस्टिस बिश्नोई द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया:

    “केवल इस आधार पर कि अन्य सह-आरोपी ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी कर दिए गए हैं, फरार आरोपी को समानता के आधार पर अग्रिम जमानत का अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं हो जाता, विशेषकर जब उसने स्वयं अदालत की प्रक्रिया में सहयोग नहीं किया और फरार रहकर ट्रायल में विलंब किया।”

    हाईकोर्ट का आदेश त्रुटिपूर्ण

    सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत दे दी कि अभियोजन आरोपी की संलिप्तता का ठोस प्रमाण पेश नहीं कर सका और सह-आरोपी बरी हो गए। कोर्ट ने कहा कि यह दृष्टिकोण गलत और त्रुटिपूर्ण है, खासकर तब जब आरोपी लगभग छह वर्षों तक फरार रहा और न्यायिक प्रक्रिया का उपहास किया।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सह-आरोपियों के ट्रायल में दर्ज निष्कर्ष फरार आरोपी की जमानत याचिका के लिए अप्रासंगिक हैं, क्योंकि अभियोजन को उस ट्रायल के दौरान फरार आरोपी के खिलाफ साक्ष्य पेश करने की आवश्यकता ही नहीं थी।

    अपवाद स्वरूप मिल सकती है अग्रिम जमानत

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामान्यतः फरार आरोपी अग्रिम जमानत का हकदार नहीं होता, लेकिन अपवाद स्वरूप ऐसे मामलों में जहां प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई मामला बनता ही न हो, तब अदालत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकती है।

    आरोपी पर गंभीर आरोप

    कोर्ट ने उल्लेख किया कि संबंधित एफआईआर के अनुसार आरोपी भी भीड़ का सदस्य था। वह न केवल जांच से फरार रहा बल्कि घायल प्रत्यक्षदर्शी शैलेंद्र उर्फ पिंटू को जान से मारने की धमकी भी दी। इस संबंध में उसके खिलाफ 10 मई 2019 को एफआईआर संख्या 272/2019 भी दर्ज हुई थी।

    सुप्रीम कोर्ट का आदेश

    सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और आरोपी को निर्देश दिया कि वह 13 फरवरी 2026 के निर्णय की तारीख से चार सप्ताह के भीतर संबंधित अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करे।

    इस निर्णय के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया से भागने वाले आरोपी समानता के सिद्धांत का लाभ नहीं उठा सकते।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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