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भारतीय साक्ष्य अधिनियम में एडमिशन का कॉन्सेप्ट
नए लागू हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के अंतर्गत एडमिशन को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। अधिनियम की धारा 15 के अनुसार- एडमिशन वह मौखिक या दस्तावेजी या इलेक्ट्रॉनिक रूप में अंतर्विष्ट कथन है, जो किसी विवाधक तथ्य या सुसंगत तथ्य के बारे में कोई अनुमान इंगित करता है और जो ऐसे व्यक्तियों में से किसी के द्वारा ऐसी परिस्थितियों में किया गया है जो एतस्मिन पश्चात वर्णित है।इस धारा में तीन बातों की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है। पहली यह धारा एडमिशन की परिभाषा देती है, दूसरी धारा कहती है कि एडमिशन तभी...
आरोप में बदलाव के बाद गवाहों को पुनः बुलाने का अधिकार: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 240
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita) 2023 के अंतर्गत, धारा 240 अभियुक्त (Accused) और अभियोजन पक्ष (Prosecutor) को यह अधिकार देती है कि अगर मुकदमे के दौरान आरोप (Charge) में कोई बदलाव या नई धाराएं जोड़ी जाती हैं, तो वे गवाहों (Witnesses) को पुनः बुला सकते हैं और उनसे नए आरोप के संदर्भ में सवाल कर सकते हैं।यह प्रावधान इस बात को सुनिश्चित करता है कि नए या परिवर्तित आरोपों के अनुसार दोनों पक्षों को उचित तैयारी और जवाब देने का अवसर मिले। धारा 239: मुकदमे के दौरान आरोपों...
जीवन की गरिमा और समानता का अधिकार: जीजा घोष और अन्य बनाम भारत संघ
जीजा घोष और अन्य बनाम भारत संघ के मामले में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एयरलाइनों द्वारा दिव्यांग व्यक्तियों (PWDs – Persons with Disabilities) के प्रति असंवेदनशीलता और भेदभावपूर्ण व्यवहार पर ध्यान केंद्रित किया। इस मामले ने हवाई यात्रा के दौरान दिव्यांगों को होने वाली समस्याओं को उजागर किया।अदालत ने इस मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के संदर्भ में देखा। कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि भारत ने United Nations Convention on the Rights...
भारतीय न्याय संहिता, 2023 के अंतर्गत धारा 270, 292, और 293 में लोक उपद्रव से जुड़े अपराध
भारतीय न्याय संहिता, 2023, जो भारतीय दंड संहिता का स्थान ले चुकी है और 1 जुलाई 2024 से लागू हुई है, सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health), सुरक्षा (Safety), सुविधा (Convenience), शालीनता (Decency), और नैतिकता (Morality) को प्रभावित करने वाले अपराधों से संबंधित नियमों का वर्णन करती है।संहिता के अध्याय XV में लोक उपद्रव (Public Nuisance) से संबंधित अपराधों को परिभाषित किया गया है। इसमें बताया गया है कि किन कार्यों या चूक (Omissions) को सामूहिक खतरे, असुविधा या नुकसान (Injury) के रूप में देखा जा सकता...
स्वराज अभियान बनाम भारत संघ: सूखा प्रबंधन और आपदा प्रबंधन पर सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
स्वराज अभियान बनाम भारत संघ के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने सूखा प्रबंधन की चुनौतियों और इससे जुड़े संवैधानिक (Constitutional) और प्रशासनिक (Administrative) प्रश्नों पर गंभीर विचार किया।सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) के प्रावधानों और अनुच्छेद 21 व 32 की भूमिका पर जोर दिया। यह मामला इस बात पर केंद्रित था कि राज्य और केंद्र सरकारें कैसे प्रभावित नागरिकों के जीवन और गरिमा (Dignity) की रक्षा के लिए अपने दायित्वों का पालन करें। आपदा प्रबंधन...
आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट में आर्बिट्रेटर का अपॉइंटमेंट
आर्बिट्रेशन एक्ट के अंतर्गत आर्बिट्रेटर की नियुक्ति होती है जो किसी भी विवाद में आर्बिटेशन करता है। आर्बिट्रेटर की नियुक्ति आर्बिटेशन करार के प्रावधानों के अनुसार की जाती है। आर्बिट्रेटर की नियुक्ति तीन प्रकार से की जा सकती है- पक्षकारों द्वारा, निर्दिष्ट प्राधिकारी द्वारा, आर्बिटेशन अधिकरण द्वारा-जहाँ आर्बिट्रेटर या आर्बिट्रेटरों को नियुक्ति पक्षकारों द्वारा की गई हो, वहां वह तत्काल को मध्यस्य निर्देशित कर आर्बिटेशन कार्यवाही प्रारम्भ कर सकते हैं। आर्बिट्रेटर किसी भी राष्ट्रीयता का व्यक्ति को...
पेशेंट को अस्पताल के खिलाफ क्या कानूनी राइट्स उपलब्ध हैं?
किसी भी पेशेंट को अस्पताल के विरुद्ध भी कानूनी अधिकार उपलब्ध होते हैं। पेशेंट के साथ किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं बरती जा सकती है। एक पेशेंट अस्पताल और डॉक्टर का ग्राहक होता है इसलिए पेशेंट अस्पताल या डॉक्टर से प्रतिकर भी प्राप्त कर सकता है।ऑपरेशन जैसी पद्धति एलोपैथिक चिकित्सा द्वारा होती है। एलोपैथी का रजिस्टर्ड डॉक्टर ऑपरेशन करता है। कभी-कभी देखने में यह आता है कि डॉक्टर की लापरवाही से गलत ऑपरेशन कर दिया जाता है या फिर कुछ गलत दवाइयां दे दी जाती है जिससे मरीज को स्थाई रूप से नुकसान हो जाता...
क्या RTI Act के तहत परीक्षकों की पहचान, उत्तर पुस्तिकाओं और इंटरव्यू में प्राप्त अंकों का खुलासा किया जा सकता है?
यह लेख Kerala Public Service Commission (KPSC) v. State Information Commission मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर केंद्रित है। कोर्ट ने इस सवाल का समाधान किया कि क्या उम्मीदवारों को RTI Act के तहत उन परीक्षकों (Examiners) के नाम जानने का अधिकार है जिन्होंने उनकी उत्तर पुस्तिकाओं (Answer Sheets) का मूल्यांकन किया। इस निर्णय ने पारदर्शिता (Transparency) और गोपनीयता (Confidentiality) के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है, खासकर उन मामलों में जहाँ सार्वजनिक निकाय (Public Authority) विशेष...
धारा 239, BNSS, 2023 के तहत अदालत के चार्जेस बदलने के अधिकार
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) में धारा 239 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह मामले के निर्णय सुनाने से पहले किसी भी समय आरोपों (Charges) को बदल सके या उसमें जोड़ कर सके।यह प्रावधान न्यायिक प्रक्रिया में लचीलापन प्रदान करता है ताकि सच्चाई के साथ न्याय हो सके और केस के तथ्यों के अनुरूप आरोप लगाए जा सकें। धारा 239 को पूरी तरह समझने के लिए, इसे धारा 237 और 238 के संदर्भ में देखना महत्वपूर्ण है। ये पूर्ववर्ती धाराएं आरोपों को समझने और उन पर गलतियों के प्रभाव को स्पष्ट करती हैं, जो...
BNS 2023 के अंतर्गत शर्तों का उल्लंघन, न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान, असलियत से विपरीत पहचान और जमानत उल्लंघन के परिणाम धारा 266 - 269
भारतीय न्याय संहिता 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita 2023), जो 1 जुलाई 2024 से प्रभाव में आई है, भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) का स्थान ले चुकी है। यह संहिता भारत के आपराधिक न्याय तंत्र को अधिक व्यवस्थित और सुसंगठित बनाने के उद्देश्य से बनाई गई है।संहिता में उल्लिखित कुछ मुख्य प्रावधानों में शर्तों के उल्लंघन, न्यायिक कार्यवाही में व्यवधान, असलियत से विपरीत पहचान और जमानत उल्लंघन शामिल हैं। धारा 266 से 269 तक इन अपराधों के लिए विशेष दंड का प्रावधान किया गया है। धारा 266: दंड माफी की शर्त...
क्या आर्टिकल 226 और 227 के तहत याचिका में ट्रिब्यूनल को अनिवार्य पक्षकार बनाना ज़रूरी है?
यह लेख सुप्रीम कोर्ट के उस निर्णय पर केंद्रित है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि क्या Tribunal को उनकी ओर से पारित आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं में पक्षकार (Party) बनाना अनिवार्य है।इस निर्णय ने न केवल प्रक्रिया संबंधी नियमों को स्पष्ट किया है, बल्कि कुछ मामलों में Tribunals की स्वतंत्रता को भी मज़बूत किया है। यह निर्णय Sh Jogendrasinhji Vijaysinghji v. State of Gujarat (2015) और गुजरात हाईकोर्ट के फैसले Gujarat State Road Transport Corporation v. Firoze M. Mogal जैसे महत्वपूर्ण फैसलों...
आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की परिभाषाएं
किसी भी एक्ट में शुरुआत की धाराओं में ऐसे शब्दों की परिभाषाएं प्रस्तुत कर दी जाती है जिससे उन शब्दों का खुलासा हो जाए। इस एक्ट में भी कुछ ऐसे शब्द हैं जिन्हें सेक्शन 2 में विशेष तौर पर बताया गया है।आर्बिटेशनधारा 2 (1) (a) के अनुसार आर्बिटेशन से अभिप्रेत है कोई भी मध्यस्थ चाहे स्थाई मध्यस्थता संस्था द्वारा प्रायोजित किया जाये या न किया जाये।इस परिभाषा में वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो व्यक्तिगत पक्षकारों के स्वैच्छिक करार पर आधारित हो या विधि के प्रावधानों के फलस्वरूप अस्तित्व में आये हों। पर...
आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट में आर्बिट्रेशन एग्रीमेंट क्या होता है?
आर्बिटेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट में आर्बिटेशन एग्रीमेंट जैसा कॉन्सेप्ट दिया गया है। पार्टी के बीच किसी डिस्प्यूट किसी मध्यस्थता को सौंपने का करार आर्बिटेशन एग्रीमेंट वर्तमान के विवादों या भविष्य के विवादों के सन्दर्भ में हो सकता है।धारा 7 उपबन्धित करती है कि 'इस भाग में आर्बिटेशन एग्रीमेंट' से अभिप्रेत है एक ऐसा करार जो पक्षकारों द्वारा उन सभी अथवा कुछ विवादों को, जो उनमें एक परिभाषित विधिक संबंध से जन्म लेेते है को प्रेषित किये जाने हेतु किया गया हो।इस परिभाषा में यह स्पष्ट है कि जो विवाद...
जिला जज की नियुक्ति : कानूनी ढांचा और संवैधानिक प्रावधान
जिला न्यायाधीशों (District Judges) की नियुक्ति न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Independence of Judiciary) बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीय संविधान में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं, ताकि केवल योग्य व्यक्तियों को ही इस महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त किया जा सके।अनुच्छेद 233 (Article 233) जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना (Posting), और पदोन्नति (Promotion) से संबंधित प्रावधान करता है। यह लेख जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति के कानूनी प्रावधानों,...
पब्लिक सर्वेंट की जिम्मेदारियाँ और गिरफ्तारी में रुकावट के मामले: भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 264 और 265
भारतीय न्याय संहिता 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita 2023) ने 1 जुलाई, 2024 से प्रभावी होकर भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) का स्थान लिया है। इस संहिता के अंतर्गत धारा 264 और 265 में पब्लिक सर्वेंट (Public Servants) की उन ज़िम्मेदारियों को शामिल किया गया है, जिनमें उन्हें किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करने या हिरासत में रखने का कर्तव्य दिया गया है। इसके अलावा, कानून में उन स्थितियों पर भी प्रावधान है जहाँ लोग गिरफ़्तारी से बचने या अवरोध उत्पन्न करने का प्रयास करते हैं।पिछली धाराओं में कुछ गंभीर...
चार्जेस से संबंधित गलतियों का प्रभाव और कानूनी शब्दों की व्याख्या : BNSS, 2023 की धारा 237 और धारा 238
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) ने पुराने Criminal Procedure Code को बदलते हुए न्यायिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने और अपराध से जुड़े मामलों में स्पष्टता और निष्पक्षता को सुनिश्चित करने का प्रयास किया है।इसमें दो मुख्य धाराएँ—धारा 237 और धारा 238—इस बात पर विशेष ध्यान देती हैं कि आरोप पत्र (Charge Sheet) में लिखे शब्द कैसे समझे जाने चाहिए और आरोप में हुई गलतियों का मामले पर क्या प्रभाव पड़ता है। ये दोनों धाराएँ न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने और आरोपी के अधिकारों की सुरक्षा करने...
क्या सेवा में कार्यरत न्यायिक अधिकारी सीधे डिस्ट्रिक्ट जज की भर्ती प्रक्रिया में भाग ले सकते हैं? – विजय कुमार मिश्रा मामले का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट के फैसले विजय कुमार मिश्रा और अन्य बनाम पटना हाईकोर्ट और अन्य, Civil Appeal No. 7358 of 2016 में, संविधान के अनुच्छेद 233(2) (Article 233(2)) की व्याख्या स्पष्ट की गई। इस मामले का मुख्य प्रश्न यह था कि क्या कोई वर्तमान में कार्यरत न्यायिक अधिकारी बिना इस्तीफा दिए सीधे District Judge की भर्ती प्रक्रिया में भाग ले सकता है।यह लेख इस फैसले में न्यायालय द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण संवैधानिक (Constitutional) प्रावधानों और मुद्दों का विश्लेषण करता है। अनुच्छेद 233(2) के प्रावधानों...
जानिए आर्बिटेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट
किसी भी डिस्प्यूट् को अदालत के बाहर सुलझाने के लिए यह कानून भारत की संसद द्वारा लाया गया है। इस एक्ट के पीछे मूल उद्देश्य है कि अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रीय, प्रादेशिक विवादों को सुलझाने में मध्यस्थता के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए। यह एक्ट अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। इस एक्ट में कुल 86 धाराएं हैं तथा जिसे अलग-अलग भागों में बांटा गया है। इस एक्ट के अंतर्गत 3 अनुसूचियां भी शामिल की गई हैं। इसके पहले के मध्यस्थता एक्ट 1940 में अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता...
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में प्रोटेक्शन कौन-से बालकों को मिलता है?
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट कुछ ऐसे बच्चों के लिए प्रोटेक्शन की भी व्यवस्था करता है जिन्हें ऐसे प्रोटेक्शन की ज़रूरत है। इस अधिनियम की धारा 29 के अंतर्गत प्रत्येक जिले के लिए, जैसा कि अधिसूचना में विहित किया जाए देख रेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बालक के कल्याण के लिए ऐसी समिति को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए एक या अधिक कल्याण समितियों का गठन कर सकती है। ऐसी बालक कल्याण समितियों में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होगे जिनमे वें कम से कम एक को महानगरीय मजिस्ट्रेट होना...
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में जुवेनाइल आरोपी और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 4 जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के में बताया गया है। इस धारा की उपधारा (5) में यह उपबंधित है कि (i) राज्य द्वारा जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के किसी भी सदस्य की नियुक्ति को उचित जांच के पश्चात् समाप्त किया जा सकता है, यदि उसने अपनी किसी शक्ति का 4. दुरुपयोग किया हो; या (ii) उसे किसी नैतिक अधमता के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया हो, और उसे अपराध के लिए क्षमा प्रदान न की गयी हो, या (iii) वह बिना किसी उचित कारण के निरन्तर तीन माह तक बोर्ड की कार्यवाही से अनुपस्थित रहा हो या उसने वर्ष में...



















