कम अटेंडेंस वाले लॉ स्टूडेंट्स को परीक्षा देने की इजाज़त देने से कॉलेजों में अराजकता फैलेगी: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-05-25 14:26 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते यह टिप्पणी की कि किसी ऐसे लॉ स्टूडेंट को परीक्षा देने की इजाज़त देना, जो अटेंडेंस के न्यूनतम स्टैंडर्ड को पूरा करने में नाकाम रहता है, 'नुकसानदेह' होगा।

जस्टिस मनोज कुमार तिवारी की बेंच ने आगे कहा कि इससे शिक्षण संस्थानों में 'अराजकता' फैलेगी और शिक्षा का स्टैंडर्ड 'गिर जाएगा'।

इसलिए बेंच ने प्राइवेट यूनिवर्सिटी की लॉ स्टूडेंट की याचिका में दखल देने से इनकार किया; यूनिवर्सिटी प्रशासन ने कम अटेंडेंस के चलते उसे 8वें सेमेस्टर की आखिरी परीक्षा में बैठने से रोक दिया था।

सिंगल जज ने टिप्पणी की,

"BCI एक रेगुलेटरी बॉडी है, जिसने लॉ कॉलेजों में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए अटेंडेंस के संबंध में न्यूनतम स्टैंडर्ड तय किए। सहानुभूति के आधार पर ऐसे स्टूडेंट को परीक्षा देने की इजाज़त देना, जो अटेंडेंस के न्यूनतम स्टैंडर्ड को पूरा करने में नाकाम रहता है, नुकसानदेह होगा; क्योंकि इससे लॉ कोर्स पढ़ाने वाले शिक्षण संस्थानों में अराजकता फैलेगी और शिक्षा का स्टैंडर्ड गिर जाएगा।"

संक्षेप में मामला

याचिकाकर्ता की 8वें सेमेस्टर में कुल अटेंडेंस सिर्फ़ 11% थी। नतीजतन, उसे आखिरी परीक्षा में बैठने की इजाज़त नहीं दी गई, जो 14 मई को शुरू हुई थी।

इसलिए उसने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेश जारी करने की रिट) की मांग की, ताकि उसे 8वें सेमेस्टर के बाकी सभी पेपरों में बैठने की इजाज़त मिल सके।

बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) के वकील ने याचिकाकर्ता की अर्ज़ी का विरोध किया और 'लीगल एजुकेशन रूल्स, 2008' का हवाला दिया। इन नियमों के मुताबिक, परीक्षा में बैठने के लिए हर स्टूडेंट की हर सेमेस्टर में कम से कम 70% अटेंडेंस होनी ज़रूरी है।

यह दलील दी गई कि उक्त नियमों में उन स्टूडेंट्स के लिए एक छोटी-सी गुंजाइश रखी गई, जिनकी अटेंडेंस 65% से 70% के बीच है; ऐसे मामलों में संबंधित वाइस चांसलर या डीन उन स्टूडेंट्स को छूट दे सकते हैं।

हालांकि, यह तर्क दिया गया कि चूंकि याचिकाकर्ता की अटेंडेंस बेहद कम थी, इसलिए वह इस मामले में किसी भी तरह की रियायत की हकदार नहीं थी।

BCI की दलीलों से सहमत होते हुए बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कानून में यह बात पूरी तरह से तय है कि 'रिट ऑफ़ मैंडमस' जारी करके किसी भी सरकारी अधिकारी या संस्था को कानून के विपरीत काम करने का आदेश नहीं दिया जा सकता। बेंच ने आगे कहा कि, हालांकि दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया आदेश में यह कहा गया कि किसी भी स्टूडेंट को न्यूनतम हाज़िरी की कमी के आधार पर परीक्षा देने से रोका नहीं जा सकता, या उसे आगे की पढ़ाई या करियर में आगे बढ़ने से नहीं रोका जा सकता; लेकिन इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक अपील अभी भी विचाराधीन है।

इसलिए बेंच ने टिप्पणी की कि वह इस मामले में दखल देने के पक्ष में नहीं है, और उसने यह बात कही:

बेंच ने आगे कहा कि BCI एक रेगुलेटरी संस्था है, जिसने लॉ कॉलेजों में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखने के लिए हाज़िरी के न्यूनतम मानक तय किए।

हालांकि, रिट याचिका को निपटाते हुए बेंच ने याचिकाकर्ता को यह अनुमति दी कि वह आवेदन (Representation) देकर BCI से संपर्क कर सकती है।

आदेश में आगे यह भी निर्देश दिया गया कि यदि याचिकाकर्ता 24 घंटे के भीतर अपना आवेदन जमा करती है तो BCI उस पर विचार करेगा और उसके एक सप्ताह के भीतर ही उचित आदेश पारित करेगा।

Tags:    

Similar News