महा वैल्यू लिखना अपने आप में भ्रामक नहीं, बिना ठोस सबूत किसी उत्पाद को गलत ब्रांडिंग वाला नहीं कहा जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-06-23 10:58 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी खाद्य उत्पाद के पैकेट पर "महा वैल्यू" लिख देना मात्र से उसे खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 के तहत गलत ब्रांडिंग वाला उत्पाद नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित न हो जाए कि उक्त शब्द उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला, भ्रामक या धोखापूर्ण है, तब तक गलत ब्रांडिंग का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

जस्टिस रवींद्र मैठाणी ने यह फैसला पेप्सिको इंडिया होल्डिंग्स प्राइवेट लिमिटेड की अपील पर सुनाते हुए दिया। कंपनी ने उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनके तहत उसके उत्पाद "लहर आलू भुजिया" को कथित रूप से गलत ब्रांडिंग वाला मानते हुए 1.5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

मामले की शुरुआत 8 जून 2015 को हुई, जब एक खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने श्रीनगर स्थित एक दुकान का निरीक्षण कर उत्पाद के नमूने लिए। जांच के बाद खाद्य विश्लेषक ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि पैकेट के एक कोने पर "महा वैल्यू" लिखा होने के कारण उत्पाद गलत ब्रांडिंग की श्रेणी में आता है।

कंपनी का पक्ष था कि "महा वैल्यू" शब्द का संबंध उत्पाद की गुणवत्ता, पोषण मूल्य या किसी विशेष गुण से नहीं है। इसका उपयोग केवल यह बताने के लिए किया गया कि पैकेट में उपभोक्ता को मात्रा के हिसाब से बेहतर मूल्य मिल रहा है।

हाईकोर्ट ने खाद्य विश्लेषक की रिपोर्ट का परीक्षण करते हुए पाया कि रिपोर्ट में केवल यह कहा गया कि "महा वैल्यू" लिखे जाने से लेबल कानून के अनुरूप नहीं है। हालांकि, यह नहीं बताया गया कि यह शब्द किस प्रकार झूठा, भ्रामक या उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाला है।

अदालत ने कहा कि रिपोर्ट में संबंधित कानूनी प्रावधान का उल्लेख कर सीधे यह निष्कर्ष निकाल लिया गया कि उत्पाद गलत ब्रांडिंग वाला है, जबकि इसके समर्थन में कोई कारण नहीं दिया गया।

हाईकोर्ट ने खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम में "गलत ब्रांडिंग" की परिभाषा का हवाला देते हुए कहा कि किसी उत्पाद को तभी गलत ब्रांडिंग वाला माना जा सकता है, जब उस पर किया गया दावा झूठा, भ्रामक या धोखापूर्ण हो।

अदालत ने पाया कि न तो खाद्य विश्लेषक और न ही अभियोजन पक्ष यह बता सका कि पैकेट पर ऐसा कौन-सा दावा किया गया, जो उपभोक्ताओं को भ्रमित करता हो।

पीठ ने यह भी कहा कि मामले में गलत तरीके से यह जिम्मेदारी कंपनी पर डाल दी गई कि वह "महा वैल्यू" शब्द का अर्थ स्पष्ट करे, जबकि कानून के अनुसार यह अभियोजन पक्ष का दायित्व था कि वह साबित करे कि उक्त शब्द लोगों को गुमराह करता है।

अदालत ने कहा,

"यह साबित करने का दायित्व अभियोजन पक्ष का था कि यह जानकारी भ्रामक है। केवल यह कह देना कि उत्पाद गलत ब्रांडिंग वाला है, पर्याप्त नहीं है।"

हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि कंपनी ने यह स्पष्टीकरण दिया कि "महा वैल्यू" का संबंध पैकेट में उपलब्ध मात्रा और मूल्य से है तथा यह वैधानिक माप विज्ञान व्यवस्था के अनुरूप मूल्य-आधारित पैकेजिंग संकेतक है। लेकिन इस पक्ष पर न तो निर्णायक प्राधिकारी और न ही अपीलीय अधिकरण ने विचार किया।

इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि उत्पाद के लेबल पर कोई भ्रामक या झूठी जानकारी दी गई, अथवा खाद्य सुरक्षा कानून के किसी प्रावधान का उल्लंघन हुआ।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कंपनी की अपील स्वीकार करते हुए निर्णायक प्राधिकारी और खाद्य सुरक्षा अपीलीय अधिकरण द्वारा लगाए गए 1.5 लाख रुपये का जुर्माना रद्द कर दिया।

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