उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश में 15 वर्षीय लड़के के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाई। इस लड़के पर अपनी ही उम्र की लड़की के अपहरण का आरोप लगाया गया था। अदालत ने माना कि मामला सहमति से बने किशोर संबंध का प्रतीत होता है।

जस्टिस आलोक मेहरा ने यह आदेश देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले को ध्यान में रखना जरूरी है, जिसमें कहा गया कि सहमति से बने किशोर संबंधों को नजरअंदाज करने से अन्यायपूर्ण परिणाम सामने आ सकते हैं।

मामले में लड़की के पिता ने FIR दर्ज कर आरोप लगाया कि आरोपी ने उनकी नाबालिग बेटी का अपहरण किया। जांच के बाद आरोपपत्र भी दाखिल किया गया।

हालांकि, सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि दोनों किशोर लगभग 15 वर्ष के हैं और लंबे समय से एक-दूसरे को जानते हैं। लड़की ने अपने बयानों में यह भी स्वीकार किया कि दोनों के बीच संबंध सहमति से थे और मेडिकल जांच में किसी जबरदस्ती के संकेत नहीं मिले।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम अनुरुद्ध (2026) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में पीड़िता के बयान और संबंध की प्रकृति को महत्व देना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि किशोर को 'कानून से संघर्षरत बालक' के रूप में सुधार गृह भेजना उसके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, खासकर तब जब संबंध आपसी सहमति और भावनात्मक जुड़ाव पर आधारित हो।

अदालत ने निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक देहरादून स्थित किशोर न्याय बोर्ड में लंबित कार्यवाही पर रोक रहेगी।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सुझाव दिया था कि POCSO Act में “रोमियो-जूलियट क्लॉज” जोड़ने पर विचार किया जाए ताकि कम उम्र के किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को आपराधिक मुकदमों से छूट दी जा सके।

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