पहले दीवानी मुकदमों का निपटारा होने दें, फिर आपराधिक कार्रवाई करें: मसूरी के मोदी भवन मामले में हाईकोर्ट ने FIR रद्द की
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मसूरी स्थित मोदी भवन संपत्ति से जुड़े कथित ध्वस्तीकरण, चोरी और अतिक्रमण के आरोपों पर दर्ज FIR रद्द करते हुए कहा कि जब दोनों पक्ष पहले ही दीवानी अदालतों का दरवाजा खटखटा चुके हैं, तब समान विवाद पर आपराधिक जांच जारी रखना उचित नहीं है।
जस्टिस राकेश थपलियाल ने अपने आदेश में कहा कि जब एक ही संपत्ति को लेकर दोनों पक्ष अलग-अलग दीवानी मुकदमे दायर कर चुके हैं तो ऐसे में आपराधिक कार्यवाही जारी रहने से लंबित मुकदमों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। अदालत ने कहा कि फिलहाल पक्षकारों को अपने-अपने दीवानी उपायों का अनुसरण करना चाहिए।
मामला मसूरी स्थित मोदी भवन संपत्ति से जुड़ा है।
शिकायतकर्ता, जिसने स्वयं को संपत्ति का सह-स्वामी बताया ने आरोप लगाया कि 14 फरवरी 2025 को भवन को ध्वस्त कर दिया गया, भीतर रखे कीमती घरेलू सामान, फर्नीचर और चित्र चोरी कर लिए गए तथा राधा स्वामी सत्संग ब्यास से जुड़े लोगों ने संपत्ति पर कब्जा कर लिया।
शिकायतकर्ता का कहना था कि पुलिस से शिकायत के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई, जिसके बाद उसने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175(3) के तहत आवेदन किया। इसी आधार पर FIR दर्ज करने का आदेश दिया गया।
FIR रद्द करने की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि विवाद मूल रूप से संपत्ति का है। उनका कहना है कि राधा स्वामी सत्संग ब्यास ने वर्ष 2001 में पंजीकृत विक्रय विलेख के माध्यम से यह संपत्ति खरीदी थी और भवन ध्वस्त करने के आरोप निराधार हैं।
अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि दोनों पक्ष पहले ही संपत्ति को लेकर दीवानी मुकदमे दायर कर चुके हैं। एक ओर राधा स्वामी सत्संग ब्यास ने स्थायी निषेधाज्ञा के लिए मुकदमा दायर किया, वहीं दूसरी ओर शिकायतकर्ता ने संपत्ति का कब्जा, कथित ध्वस्तीकरण और चोरी से हुए नुकसान की भरपाई, लाभ-हानि तथा स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए अलग मुकदमा दायर किया।
अदालत ने पाया कि जिस संपत्ति को लेकर FIR दर्ज हुई, वही संपत्ति लंबित दीवानी मुकदमों का भी विषय है। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता ने अपने दीवानी मुकदमे में कथित ध्वस्तीकरण और चोरी के लिए हर्जाने की मांग भी की।
हाईकोर्ट ने माना कि केवल इसलिए आपराधिक मामला समाप्त नहीं किया जा सकता कि दीवानी उपाय उपलब्ध हैं। हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि यह देखना आवश्यक है कि कहीं दीवानी विवाद को आपराधिक रंग तो नहीं दिया गया।
अदालत ने कहा,
"इस समय जबकि दोनों पक्ष एक ही संपत्ति को लेकर दीवानी मुकदमों में अपने अधिकारों का दावा कर रहे हैं, उन्हें उन्हीं मुकदमों का अनुसरण करना चाहिए। यदि अंतिम निर्णय में किसी प्रकार की आपराधिकता सामने आती है तो कानून के अनुसार आपराधिक कार्रवाई शुरू की जा सकती है।"
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान चरण में FIR के आधार पर जांच जारी रखना पूरी तरह अनुचित है। अदालत ने दोनों याचिकाएं स्वीकार करते हुए FIR रद्द की।
साथ ही हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसके इस आदेश का लंबित दीवानी मुकदमों की सुनवाई और उनके अंतिम निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। संबंधित अदालतें मामलों का निपटारा उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से करेंगी।