उत्तराखंड हाईकोर्ट ने ऑनलाइन FIR देखने और डाउनलोड करने में आ रही दिक्कत से जुड़ी जनहित याचिका का निपटारा किया। सुनवाई के दौरान पुलिस की तकनीकी टीम ने अदालत के सामने नागरिक पोर्टल और देवभूमि मोबाइल ऐप के जरिए FIR डाउनलोड करके दिखाई।

चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ के सामने पुलिस ने बताया कि सिविल पोर्टल पर पंजीकरण करने के बाद लोग पोर्टल और मोबाइल ऐप दोनों के जरिए FIR देख और डाउनलोड कर सकते हैं। तकनीकी टीम ने अदालत के सामने कई FIR डाउनलोड करके भी दिखाईं।

मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि आरोपी और आम लोग अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क प्रणाली के पोर्टल से FIR डाउनलोड नहीं कर पा रहे हैं। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का भी हवाला दिया गया, जिसके तहत संवेदनशील अपराधों को छोड़कर FIR दर्ज होने के 24 घंटे के भीतर पुलिस या राज्य सरकार की वेबसाइट पर उपलब्ध कराया जाना है। तकनीकी या अन्य अपरिहार्य परिस्थितियों में इसके लिए निर्धारित अवधि में विस्तार की अनुमति है।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि पोर्टल पर FIR देखने का प्रयास करने पर लगातार त्रुटि दिखाई दे रही थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने 18 सितंबर को संबंधित अधिकारियों को 23 सितंबर को अदालत में तकनीकी व्यक्ति की मौजूदगी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया, ताकि नागरिक पोर्टल और मोबाइल ऐप के काम करने तथा एफआईआर डाउनलोड होने की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया जा सके।

23 सितंबर को कुमाऊं के पुलिस महानिरीक्षक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए अदालत में पेश हुए, जबकि अन्य पुलिस अधिकारी और तकनीकी टीम अदालत में मौजूद रही।

तकनीकी प्रदर्शन के दौरान अदालत को बताया गया कि नागरिक पोर्टल पर पंजीकरण के बाद FIR उपलब्ध हो जाती हैं। तकनीकी टीम ने कई FIR डाउनलोड करके व्यवस्था के काम करने का प्रदर्शन किया।

अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क प्रणाली के पुलिस अधीक्षक ने 22 सितंबर को FIR डाउनलोड करने वाले लोगों का विवरण भी अदालत में पेश किया। इसके मुताबिक उस दिन अलग-अलग लोगों द्वारा वेबसाइट पर FIR डाउनलोड करने के 70 मामले दर्ज हुए।

हालांकि, अदालत ने संवेदनशील अपराधों से जुड़ी FIR की ऑनलाइन उपलब्धता को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया। पुलिस ने बताया कि यौन अपराध, उग्रवाद, आतंकवाद, POCSO Act के तहत अपराध और इसी तरह के अन्य संवेदनशील अपराधों से संबंधित FIR पोर्टल या मोबाइल ऐप पर उपलब्ध नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ऐसे संवेदनशील अपराधों की FIR वेबसाइट पर अपलोड करना जरूरी नहीं है। लेकिन अदालत ने कहा कि ऐसी FIR के मामले में व्यवस्था में एक ऐसी सुविधा होनी चाहिए, जिससे यह पता चल सके कि संबंधित FIR संवेदनशील अपराध की श्रेणी में आती है और इसी कारण उसे डाउनलोड के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया।

अदालत ने कहा कि इससे FIR डाउनलोड करने का प्रयास करने वाले व्यक्ति को यह पता चल सकेगा कि संबंधित दस्तावेज उपलब्ध क्यों नहीं है।

अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क प्रणाली के पुलिस अधीक्षक ने अदालत को आश्वासन दिया कि इस मुद्दे की जांच की जाएगी और व्यवस्था में ऐसी सुविधा उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।

हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की मुख्य चिंता का समाधान हो गया और अब विचार के लिए कोई अन्य मुद्दा बाकी नहीं है। इसके बाद पीठ ने जनहित याचिका का निपटारा किया।

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