नाबालिग बच्चे का भरण-पोषण टाल नहीं सकता पिता, मां की आय या कर्ज का बहाना स्वीकार नहीं: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि पिता अपने नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से यह कहकर बच नहीं सकता कि मां भी कमाती है या उस पर कर्ज और पारिवारिक जिम्मेदारियां हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के भरण-पोषण का दायित्व सर्वोच्च है और स्वेच्छा से लिए गए वित्तीय बोझ इस जिम्मेदारी को कम नहीं कर सकते।
जस्टिस आशीष नैथानी ने रुड़की फैमिली कोर्ट केा आदेश बरकरार रखा, जिसमें पिता को नाबालिग बच्चे के लिए प्रति माह 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
मामला दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें बच्चे की मां ने भरण-पोषण की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने आवेदन स्वीकार करते हुए पिता को आवेदन की तारीख से ही 8,000 रुपये मासिक देने का आदेश दिया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए पिता ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दायर की। उसका तर्क था कि वह और उसकी पत्नी दोनों सरकारी सेवा में हैं—वह केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल में और पत्नी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल में कार्यरत है इसलिए पूरा बोझ उसी पर डालना उचित नहीं है। उसने यह भी कहा कि उसकी आय से ऋण की किश्तें, माता-पिता और भाई-बहनों की जिम्मेदारियों पर खर्च होता है।
दूसरी ओर, बच्चे की ओर से कहा गया कि पिता स्थायी सरकारी कर्मचारी है और उसकी आय स्थिर है, इसलिए उसका वैधानिक दायित्व बनता है कि वह बच्चे का भरण-पोषण करे। निर्धारित राशि भी बच्चे की जरूरतों के हिसाब से उचित है।
कोर्ट ने पाया कि बच्चे के पितृत्व को लेकर कोई विवाद नहीं है, इसलिए धारा 125 के तहत पिता का दायित्व स्पष्ट रूप से स्थापित है।
मां की आय के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा,
“यह सही है कि मां की आय को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन केवल इस आधार पर पिता अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता।”
कोर्ट ने आगे कहा कि धारा 125 एक सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य अभाव और दरिद्रता को रोकना है, इसलिए इसकी व्याख्या आश्रितों के हित में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए। नाबालिग बच्चे को माता-पिता की स्थिति के अनुरूप जीवन स्तर मिलना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्ज की किश्तें या अन्य निजी खर्च स्वेच्छिक दायित्व हैं और वे बच्चे के भरण-पोषण के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकते। माता-पिता या अन्य परिजनों की जिम्मेदारियां भी इस वैधानिक कर्तव्य को समाप्त नहीं करतीं।
सभी तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि 8,000 रुपये मासिक की राशि न तो अधिक है और न ही अनुचित। साथ ही आवेदन की तारीख से भरण-पोषण देने का आदेश भी सही ठहराया गया।
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि या असंगति नहीं है, इसलिए पुनर्विचार याचिका खारिज की जाती है। हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अंतरिम भरण-पोषण है और अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।