कर्मचारी को नौकरी में बनाए रखने के फ़ैसले में 'वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी' लागू नहीं होती: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-08-06 15:18 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 अगस्त) को कहा कि नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय नियोक्ता (Employer) केवल कर्मचारी के हालिया सर्विस रिकॉर्ड के आधार पर फ़ैसला लेने के लिए बाध्य नहीं है; बल्कि, फ़ैसला कर्मचारी के पूरे सर्विस रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।

इसका मतलब है कि "वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी" - जिसके तहत प्रमोशन मिलने के बाद पिछली खराब एंट्रीज़ (Adverse Entries) को खत्म मान लिया जाता है - नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय लागू नहीं होती है।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने कहा,

"...हालांकि प्रमोशन से जुड़े मामलों में 'वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी' लागू हो सकती है, लेकिन जब सक्षम अधिकारी नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करता है तो यह थ्योरी लागू नहीं होती।"

बेंच ने CISF के पूर्व कर्मचारी की अनिवार्य सेवानिवृत्ति (Compulsory Retirement) को सही ठहराया। कर्मचारी ने इस आधार पर अपनी अनिवार्य सेवानिवृत्ति को चुनौती दी कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आकलन "पूरे सर्विस रिकॉर्ड" के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

अपीलकर्ता 1982 में असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर के तौर पर सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (CISF) में शामिल हुआ था। उसे दो बार प्रमोशन मिला - पहले 1990 में सब-इंस्पेक्टर और बाद में 2003 में इंस्पेक्टर के पद पर।

50 साल की उम्र पूरी होने पर नौकरी में बनाए रखने के लिए उसकी उपयुक्तता का आकलन करने के लिए उसका मामला इंटरनल स्क्रीनिंग कमेटी के सामने रखा गया। कमेटी ने उसे अनुपयुक्त पाया, जिस पर रिव्यू कमेटी ने भी सहमति जताई, जिसके परिणामस्वरूप उसे अनिवार्य रूप से रिटायर कर दिया गया।

इससे असंतुष्ट होकर उसने दिल्ली हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के आदेश को सही ठहराया और कहा कि समीक्षा की अवधि के आखिरी दो सालों में अपीलकर्ता की कार्यक्षमता में कमी आई थी।

इससे असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। उसने तर्क दिया कि उसकी अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश गलत था, क्योंकि अधिकारी ने उसके पूरे सर्विस रिकॉर्ड पर विचार किया, जो प्रमोशन के बाद नहीं किया जा सकता। असल में अपीलकर्ता ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के मामलों में 'वॉश्ड-ऑफ़ थ्योरी' लागू करने की वकालत की। उसके अनुसार, प्रमोशन से पहले की खराब एंट्रीज़ या रिकॉर्ड को नौकरी में बनाए रखने के लिए उसकी उपयुक्तता का आकलन करते समय आधार नहीं बनाया जा सकता।

जस्टिस मिश्रा के फ़ैसले में अपील करने वाले की दलील खारिज करते हुए 'राजस्थान स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन और अन्य बनाम बाबू लाल जांगिड़, (2013) 10 SCC 551' मामले का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि 'वॉश्ड-ऑफ थ्योरी' (पुराने रिकॉर्ड को नज़रअंदाज़ करने का सिद्धांत) प्रमोशन के मामलों में लागू होती है, न कि अनिवार्य रिटायरमेंट के मामलों में; इसलिए नौकरी में बनाए रखने के लिए कर्मचारी की उपयुक्तता का आकलन करते समय पूरे सर्विस रिकॉर्ड पर विचार करना बहुत ज़रूरी है।

कोर्ट ने 'बाबू लाल जांगिड़' मामले में कहा था,

"...किसी कर्मचारी के प्रमोशन के बाद उससे पहले की प्रतिकूल प्रविष्टियों (Adverse Entries) का कोई महत्व नहीं रह जाता और उन्हें मिटा हुआ माना जा सकता है, जब सरकारी कर्मचारी के मामले पर आगे के प्रमोशन के लिए विचार किया जा रहा हो। हालांकि, यह 'वॉश्ड-ऑफ थ्योरी' तब लागू नहीं होगी जब किसी कर्मचारी के मामले का आकलन यह तय करने के लिए किया जा रहा हो कि क्या वह नौकरी में बने रहने के लायक है या उसे अनिवार्य रिटायरमेंट दिया जाना चाहिए।"

इस कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा,

"इसलिए कमेटी का अपील करने वाले के पूरे सर्विस रिकॉर्ड पर विचार करना सही था, जिसमें अपील करने वाले के प्रमोशन से पहले की प्रतिकूल जानकारी भी शामिल थी।"

ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील खारिज की गई।

Cause Title: SUSHIL SHARMA VERSUS UNION OF INDIA AND OTHERS

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