सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (18 सितंबर) को महाराष्ट्र ज़हर नियम (Maharashtra Poisons Rules), 1972 के नियम 18A और 18B को रद्द कर दिया। इन नियमों के तहत, मेथनॉल को दवा बनाने वाली कंपनियों के अलावा किसी और को बेचने से पहले उसमें कड़वाहट लाने वाला पदार्थ (bitterant) और रंग (colourant) मिलाना ज़रूरी था।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने मेथनॉल-आधारित उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की उन याचिकाओं को मंज़ूरी दी, जिनमें मेथनॉल में एडिटिव्स मिलाने की अनिवार्यता का विरोध किया गया। कंपनियों का कहना था कि इससे उनके उत्पादों की गुणवत्ता और उपयोगिता पर बुरा असर पड़ रहा था।

नियम 18A और 18B को 2011 में लागू किया गया। यह कदम 1991 में मुंबई में हुई ज़हरीली शराब की त्रासदी के बाद उठाया गया, जिसमें मेथनॉल की ज़्यादा मात्रा वाली ज़हरीली और मिलावटी शराब पीने से 93 लोगों की मौत हो गई।

नियम 18A के तहत मेथनॉल बेचने वालों के लिए खरीदार का लाइसेंस वेरिफ़ाई करना ज़रूरी था। साथ ही अगर मेथनॉल का इस्तेमाल दवा बनाने के लिए नहीं हो रहा था तो बेचने से पहले हर 100 लीटर मेथनॉल में एक ग्राम मेथिलीन कारमाइन और चार ग्राम डेनाटोनियम सैकेराइड मिलाना अनिवार्य है।

नियम 18B में यह प्रावधान है कि अगर किसी के पास वैध 'फॉर्म A' लाइसेंस के बिना मेथनॉल पाया जाता है तो उसे ज़ब्त कर लिया जाएगा।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मेथनॉल का इस्तेमाल करके वे फ़ॉर्मेल्डिहाइड, पैराफ़ॉर्मेल्डिहाइड, रेज़िन और अन्य औद्योगिक उत्पाद बनाते हैं, और इन एडिटिव्स को अनिवार्य रूप से मिलाने से उनके उत्पादों की गुणवत्ता और उपयोगिता पर असर पड़ता है।

याचिकाकर्ताओं की दलील से सहमत होते हुए जस्टिस पारदीवाला ने राज्य सरकार की उस दलील को खारिज किया, जिसमें कहा गया कि मेथनॉल में एडिटिव्स मिलाने का नियम एक तार्किक उद्देश्य को पूरा करता है। सरकार का तर्क था कि यह कदम ज़हरीली शराब से होने वाली मौतों को रोकने के लिए उठाया गया, क्योंकि मेथनॉल-युक्त मिलावटी शराब पीने से सैकड़ों लोगों की मौत हो चुकी थी।

कोर्ट ने माना कि मेथनॉल-युक्त मिलावटी शराब से होने वाली मौतों को रोकना राज्य का जायज़ उद्देश्य था। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा अपनाए गए उपाय उस उद्देश्य के अनुपात में नहीं थे।

कोर्ट ने पाया कि कड़वाहट लाने वाला पदार्थ और रंग मिलाने से मुख्य रूप से मेथनॉल की पहचान करने में तो मदद मिलती थी, लेकिन इससे अवैध शराब बनाने के लिए मेथनॉल के गलत इस्तेमाल या डायवर्ज़न को प्रभावी ढंग से नहीं रोका जा सका।

कोर्ट ने कहा,

“प्रतिवादी राज्य यह बताने में नाकाम रहा कि ऐसे एडिटिव्स (Additives) मिलाने से मेथनॉल का लगातार इस्तेमाल कम या बंद हो जाएगा, या इससे उसका केमिकल कंपोजीशन ऐसा हो जाएगा कि उसका इस्तेमाल नकली शराब बनाने में न हो सके। इसके अलावा, प्रतिवादी राज्य यह भी नहीं बता पाया कि एडिटिव्स मिलाने से मौतें निश्चित रूप से कैसे रुकेंगी। एक और सवाल जिसका जवाब नहीं मिला, वह यह है कि प्रतिवादी दूसरी मिलावट वाली चीज़ों के इस्तेमाल से नकली शराब बनाने को कैसे रोकेगा। प्रतिवादी ने इस बात को नज़रअंदाज़ किया कि पहचान सिर्फ़ एक संभावना है। प्रतिवादी से यह उम्मीद की गई कि वह मेथनॉल के गलत इस्तेमाल और चोरी, उसके निपटान के तरीके और बिना इस्तेमाल किए गए मेथनॉल की वापसी आदि से निपटने के लिए कड़े उपाय लागू करेगा।”

आनुपातिकता के टेस्ट (Proportionality Test) को लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि ये पाबंदियां अपनाए गए तरीकों और हासिल किए जाने वाले मकसद के बीच कोई ठोस संबंध स्थापित करने में नाकाम रहीं।

कोर्ट ने कहा,

“ऊपर बताई गई बातों से यह साफ़ है कि असल में विवादित नियम एक ऐसा रेगुलेटरी फ़्रेमवर्क बनाते हैं जो शराब में मेथनॉल के गलत इस्तेमाल को नहीं रोकता, जो कि रेगुलेट न होने वाले क्षेत्र में होता है। अगर इन नियमों का पूरी तरह से पालन भी किया जाए, तब भी ये उस गलत इस्तेमाल को नहीं रोक सकते, जिसे रोकने का इनका मकसद है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इनका उस मकसद से कोई उचित और सीधा संबंध है जिसे ये हासिल करना चाहते हैं। ये एक ऐसी समस्या से निपटते हैं, जिसे असल में ये ठीक नहीं करते, जबकि उद्योगों पर लगातार बोझ डालते हैं... विवादित नियमों को कानून बनाने की शक्ति का उचित या तर्कसंगत इस्तेमाल नहीं कहा जा सकता। विवादित नोटिफिकेशन साफ़ तौर पर मनमाना है। इसका उस मकसद से कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है जिसे हासिल किया जाना है, इसलिए यह आर्टिकल 14 का उल्लंघन करता है।”

नियम 18B भी असंवैधानिक

कोर्ट ने नियम 18B भी रद्द किया, जिसमें 'फॉर्म A' लाइसेंस के बिना मेथनॉल रखने पर उसे ज़ब्त करने का प्रावधान था।

कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान तब काम का नहीं रह जाता, जब किसी व्यक्ति के पास 'फॉर्म B' परमिट के तहत कानूनी रूप से मेथनॉल हो। ऐसी स्थितियों में 'फॉर्म A' लाइसेंस की ज़रूरत 'फॉर्म B' परमिट को बेकार बना देती है।

के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ मामले में तय किए गए 'आनुपातिकता के सिद्धांत' (Proportionality Framework) को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि मेथनॉल-मिलावटी शराब से जान जाने से रोकना एक जायज़ मकसद है, लेकिन विवादित पाबंदियां उस मकसद को हासिल करने के लिए न तो सही थीं और न ही ज़रूरी।

राज्य यह साबित करने में नाकाम रहा कि कोई उतना ही असरदार और कम पाबंदी वाला विकल्प मौजूद नहीं था। कोर्ट ने देखा कि महाराष्ट्र ज़हर नियम (Maharashtra Poisons Rules) में पहले से मौजूद सुरक्षा उपाय, अगर ठीक से लागू किए जाएं, तो चोरी और गलत इस्तेमाल (डायवर्जन) की समस्या को बेहतर ढंग से हल कर सकते हैं।

बेंच ने उद्योगों पर लगातार पड़ रहे बोझ - जैसे कम पैदावार, कैटलिस्ट और उपकरणों को नुकसान, ज़्यादा बिजली की खपत, पर्यावरण और गुणवत्ता संबंधी चिंताएं - और राज्य द्वारा बताए गए फायदे (जिसे कोर्ट ने सिर्फ़ एक संभावना बताया) के बीच तुलना भी की।

गुजरात में शराब पर पाबंदी के बावजूद, ज़हरीली शराब की घटनाओं में कई लोगों की जान गई

कोर्ट ने कहा,

"इतिहास इस बात का पक्का सबूत है कि शराब पर पूरी पाबंदी अक्सर शराब के कारोबार को गैर-कानूनी (अंडरग्राउंड) बना देती है, जिससे बिना नियम-कानून वाली, जानलेवा शराब का चलन बढ़ जाता है। गुजरात राज्य का ही उदाहरण लें। गुजरात राज्य में शराब पर सख़्त पाबंदी की नीति है। यह एक 'ड्राई स्टेट' (शराब-मुक्त राज्य) है। राज्य के गठन और आज़ादी के बाद से गुजरात में ज़हरीली शराब की कम-से-कम दस बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिनमें 600 से ज़्यादा लोगों की जान गई। 1960 में बनने के बाद से ही गुजरात में शराब पर सख़्त पाबंदी की नीति होने के बावजूद, ज़हरीली शराब (मेथनॉल-युक्त शराब) की घटनाओं ने तेज़ी से गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट पैदा किया।"

ज़हरीली शराब की घटनाओं को रोकने के सुझाव

नियमों को रद्द करते हुए कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ज़हरीली शराब की घटनाओं को रोकने के लिए कई सुझाव भी दिए। इनमें मेथनॉल के ट्रांसपोर्टेशन की सख़्त निगरानी, ​​कंटेनरों की ऐसी सीलिंग जिसे आसानी से छेड़ा न जा सके (Tamper-Evident Sealing), लाइसेंस की समय-समय पर जांच, खपत और स्टॉक का रिकॉर्ड रखना, और लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ़ कार्रवाई करना शामिल था।

कोर्ट ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस फैसले की एक कॉपी सभी हाईकोर्ट और सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजे।

अलग-अलग विभागों के बीच सहयोग और कामकाज के बारे में-

I. अगर राज्य में शराबबंदी कानून लागू है, तो शराब की सप्लाई और मांग की चेन को तोड़ने के लिए उसे सख्ती से लागू करने की ज़रूरत है। इसके लिए राज्य सरकार को कई तरह से काम करना होगा और इसमें राज्य के कई विभागों जैसे शराबबंदी विभाग, आबकारी विभाग, पुलिस विभाग, परिवहन विभाग, उद्योग विभाग, स्वास्थ्य विभाग, सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग के साथ-साथ गैर-सरकारी संगठनों की भी भागीदारी होगी।

II. चूंकि शराब राज्य में बनती भी है और बाहर से भी लाई जाती है, इसलिए इसे लागू करने के कदमों में राज्य की सीमाओं पर कड़ी निगरानी शामिल होनी चाहिए। इस संबंध में सीमाओं पर राज्य परिवहन विभाग की सतर्कता से राज्य में शराब की अवैध ढुलाई को रोकने में मदद मिलेगी। निजी वाहनों की जांच के लिए चेकिंग स्क्वाड भी तैनात किए जाएंगे। साथ ही यह पता लगाना भी ज़रूरी होगा कि किस तरीके से भारी मात्रा में शराब शहर में आती है। राज्य के भीतर शराब की खरीद, निर्माण, ढुलाई, बिक्री और सेवन से जुड़े कानूनों को लागू करना भी ज़हरीली शराब से होने वाली त्रासदियों को रोकने में अहम साबित होगा।

III. राज्य पुलिस, शराबबंदी विभाग और आबकारी विभाग के साथ मिलकर उन स्थानीय शराब बनाने वाली जगहों (ब्रूअरी) की पहचान कर सकती है। उनके खिलाफ कार्रवाई कर सकती है, जो आमतौर पर राज्य के शहरी इलाकों में भीड़-भाड़ वाली या अर्ध-औद्योगिक जगहों पर होती हैं। कई म्युनिसिपल स्कूलों के खुले मैदानों का इस्तेमाल अक्सर अवैध शराब रखने की जगह के तौर पर किया जाता है। ऐसे में, शिक्षा विभाग को स्कूल परिसर पर नज़र रखनी चाहिए और अगर वहां शराब रखी हुई मिले, तो संबंधित पुलिस को इसकी सूचना देनी चाहिए।

IV. नकली शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाले केमिकल सॉल्वेंट (घोलक) आमतौर पर औद्योगिक इकाइयों से अवैध रूप से हासिल किए जाते हैं। इसलिए उद्योग विभाग द्वारा औद्योगिक इकाइयों की निगरानी करना फायदेमंद होगा ताकि यह पता लगाया जा सके कि कौन-सी इकाइयां ऐसे केमिकल सॉल्वेंट बना रही हैं और उन्हें शराब बनाने वालों को अवैध रूप से बेच रही हैं।

राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मौजूदा नियमों के बारे में

V. राज्य में मेथनॉल को नियंत्रित करने वाले मौजूदा नियमों (अगर कोई हों) में संशोधन किया जाना चाहिए। इसमें यह प्रावधान होना चाहिए कि शराब के परिवहन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों को किसी नियम के उल्लंघन के मामले में अदालत के आदेश तक बॉन्ड या ज़मानत पर न छोड़ा जाए।

VI. लाइसेंस और परमिट देने से जुड़े राज्य के नियमों की व्यापक समीक्षा की जानी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि लाइसेंस या परमिट सामान्य प्रक्रिया के तहत न दिया जाए, बल्कि आवेदक के पिछले रिकॉर्ड, साख और वास्तविक ज़रूरत की ठीक से जांच-पड़ताल के बाद ही दिया जाए। इसके अलावा, नियमों में पहले से दिए गए लाइसेंस और परमिट की समय-समय पर और नियमित जांच का प्रावधान होना चाहिए। इसमें पात्रता बने रहने, असल इस्तेमाल और लाइसेंस/परमिट की शर्तों के पालन की जांच शामिल होनी चाहिए, ताकि लाइसेंस या परमिट देना सिर्फ़ एक बार की प्रक्रिया न रहे, बल्कि उस पर लगातार जवाबदेही बनी रहे।

VII. राज्य के नियमों में यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि औद्योगिक उपभोक्ता बिना इस्तेमाल किए गए या अतिरिक्त मेथनॉल को एक तय समय-सीमा के भीतर विक्रेता या किसी अधिकृत अधिकारी को वापस करें। इससे उपभोक्ता की निर्माण प्रक्रिया के लिए ज़रूरी मात्रा से ज़्यादा स्टॉक जमा होने से रोका जा सकेगा। इससे अतिरिक्त स्टॉक की चोरी या गलत इस्तेमाल का जोखिम कम होगा।

VIII. मेथनॉल का कारोबार करने या उसका इस्तेमाल करने वाले हर लाइसेंस और परमिट धारक के लिए खपत और क्लोजिंग स्टॉक (बचे हुए स्टॉक) का रिकॉर्ड रखना ज़रूरी होना चाहिए। इस रिकॉर्ड का समय-समय पर मिलान किया जाना चाहिए ताकि ओपनिंग स्टॉक, खपत और क्लोजिंग स्टॉक के बीच किसी भी बिना हिसाब या बिना वजह वाली कमी का पता चल सके और जल्द से जल्द उसकी जांच की जा सके।

IX. अगर कोई व्यक्ति लाइसेंस या परमिट की शर्तों या उसके तहत बने नियमों का उल्लंघन करता पाया जाता है, तो उसका लाइसेंस या परमिट सस्पेंड या रद्द किया जा सकता है (जैसा भी मामला हो), और उसे भविष्य में कोई नया लाइसेंस या परमिट पाने से भी रोका जा सकता है।

X. मेथनॉल का ट्रांसपोर्ट खास तौर पर उसी काम के लिए तय किए गए टैंकरों या कंटेनरों में किया जाना चाहिए, ताकि चोरी या मिलावट की गुंजाइश न रहे, जो आम या दूसरे सामान के साथ मेथनॉल ले जाने पर हो सकती है। इसके अलावा, ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज एक्साइज अधिकारियों की कड़ी निगरानी में होना चाहिए; नियमों के तहत रेगुलेटरी उपाय तय किए जाने चाहिए और ट्रांसपोर्ट व स्टोरेज सेंटरों/सुविधाओं की निगरानी के लिए एक्साइज अधिकारियों को तैनात किया जाना चाहिए, जिनकी सेवाओं का खर्च मेथनॉल का स्टॉक और ट्रांसपोर्ट करने वाली कंपनी उठाएगी।

XI. मेथनॉल के ट्रांसपोर्ट और स्टोरेज के लिए इस्तेमाल होने वाले कंटेनरों और टैंकरों को भेजने की जगह पर ही इस तरह सील किया जाना चाहिए कि उन्हें खोला न जा सके और न ही उनमें बची हुई मात्रा निकाली जा सके या कंटेनर के तल में बिना हिसाब-किताब के छोड़ी जा सके (सिवाय उस इंडस्ट्री के अधिकृत कर्मचारियों के जो इसे प्राप्त कर रही है)। साथ ही भेजने और प्राप्त करने, दोनों जगहों पर सील नंबर और उसकी हालत का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए।

स्वास्थ्य और जागरूकता के संबंध में

XII. शराब से जुड़ी त्रासदियों से निपटने के लिए राज्य के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग के पास व्यापक नीति और एक खास सेल होना चाहिए। जब ​​बड़े पैमाने पर लोग हताहत होते हैं तो अचानक आई इमरजेंसी के कारण सरकारी अस्पतालों में पूरी तरह अफरा-तफरी मच जाती है। पिछले अनुभवों से पता चलता है कि ऐसे अस्पतालों में ऐसी इमरजेंसी से निपटने के लिए ज़रूरी खास दवाएं या उपकरण शायद ही मौजूद होते हैं। ऐसी इमरजेंसी से निपटने के लिए एक व्यापक आपदा प्रबंधन प्रणाली और नीति होनी चाहिए।

XIII. राज्य सरकार को नशा-मुक्ति केंद्रों की संख्या बढ़ानी चाहिए और जो केंद्र पहले से मौजूद हैं, उन्हें पूरी तरह से चालू करना चाहिए। नशा-मुक्ति केंद्रों को शराब से प्रभावित परिवारों तक पहुँचने की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी भी दी जानी चाहिए, ताकि शराबबंदी के कानूनों (अगर कोई हों) को ठीक से लागू किया जा सके और धीरे-धीरे कुछ सकारात्मक परिणाम मिल सकें।

XIV. शराब के सेवन और उसके नतीजों से अक्सर परिवार बिखर जाते हैं। इसलिए हर इलाके में परिवार परामर्श केंद्र होने चाहिए, खासकर उन परिवारों के लिए जो शराब के सेवन की वजह से चुपचाप परेशानियां झेल रहे हैं।

XV. शराब को नियंत्रित करने वाले कानूनों और शराबबंदी कानून को लागू करने के मामले में कानून लागू करने वाली एजेंसियों को जानकारी देने में आम जनता का सहयोग बहुत ज़रूरी है। राज्य सरकारों और NGO को शराबबंदी कानून और उसे लागू करने के बारे में जागरूकता अभियान चलाना चाहिए।

Cause Title: M/S BALAJI FORMALIN PVT. LTD. & ANR. VERSUS UNION OF INDIA & ANR. (with connected matters)

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