UAPA मामलों में 'बेल नियम, जेल अपवाद': सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद को बेल से इनकार करने वाले फैसले पर जताई आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के मामलों में भी “बेल नियम है और जेल अपवाद” का सिद्धांत लागू होता है। अदालत ने जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसमें दिल्ली दंगा बड़ी साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को बेल देने से इनकार किया गया था।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खड़नपीठ ने यह टिप्पणी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी की जमानत याचिका मंजूर करते हुए की। अंद्राबी पिछले पांच वर्षों से कथित नार्को-टेररिज्म मामले में UAPA के तहत जेल में बंद थे।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि जनवरी 2026 में दिए गए 'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य' फैसले में 2021 के तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ के ऐतिहासिक फैसले 'Union of India v. KA Najeeb' का सही तरीके से पालन नहीं किया गया। KA Najeeb मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि यदि ट्रायल में अत्यधिक देरी हो रही है, तो यह UAPA जैसे कठोर कानूनों में भी बेल देने का आधार बन सकता है।
पीठ ने 2024 के 'गुरविंदर सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' फैसले पर भी असहमति जताई और कहा कि छोटे बेंच बड़े बेंच के फैसलों को कमजोर नहीं कर सकते।
जस्टिस उज्जल भुइयां ने फैसले में कहा,“कम सदस्यीय पीठ बड़े बेंच द्वारा तय किए गए कानून से बंधी होती है। न्यायिक अनुशासन की मांग है कि बाध्यकारी मिसाल का पालन किया जाए या संदेह होने पर मामले को बड़ी पीठ को भेजा जाए। छोटी पीठ बड़ी पीठ के फैसले को कमजोर, दरकिनार या नजरअंदाज नहीं कर सकती।”
कोर्ट ने कहा कि KA Najeeb फैसला स्पष्ट रूप से मानता है कि लंबे समय तक ट्रायल लंबित रहने और आरोपी के वर्षों तक जेल में रहने की स्थिति में संवैधानिक अदालतें बेल दे सकती हैं, भले ही UAPA की धारा 43D(5) बेल पर सख्त प्रतिबंध लगाती हो।
पीठ ने कहा कि 'गुरविंदर सिंह' फैसले में बनाया गया 'टू-प्रॉन्ग टेस्ट' न तो UAPA से निकलता है और न ही KA Najeeb फैसले से। उस फैसले में कहा गया था कि बेल तभी दी जा सकती है जब आरोपी prima facie अपनी बेगुनाही दिखाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे KA Najeeb के सिद्धांत के विपरीत बताया।
कोर्ट ने यह भी कहा कि 'गुलफिशा फातिमा' फैसले में यह कहना कि KA Najeeb का सिद्धांत केवल “असाधारण मामलों” में लागू होगा, सही व्याख्या नहीं है।
फैसले में कहा गया,“KA Najeeb बाध्यकारी कानून है और stare decisis के सिद्धांत के तहत संरक्षित है। इसे ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की छोटी पीठ भी कमजोर या नजरअंदाज नहीं कर सकती।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि 'Watali' फैसले का इस्तेमाल UAPA मामलों में अनिश्चितकालीन प्री-ट्रायल हिरासत को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता।
पीठ ने कहा कि UAPA जैसे मामलों में भी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अदालत ने दोहराया कि लंबी कैद और ट्रायल में देरी व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है।
गौरतलब है कि 'गुरविंदर सिंह' और 'गुलफिशा फातिमा' दोनों फैसले जस्टिस अरविंद कुमार द्वारा लिखे गए थे।
अंत में सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा,“हमें यह कहने में कोई संदेह नहीं कि UAPA मामलों में भी बेल नियम है और जेल अपवाद।”