स्पष्ट और बिना शर्त स्वीकारोक्ति के नहीं दिया जा सकता फैसला, मुकदमे की सुनवाई का अधिकार नहीं छीना जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-06-10 10:02 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि दीवानी प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 12 नियम 6 के तहत केवल तभी स्वीकारोक्ति के आधार पर डिक्री पारित की जा सकती है, जब स्वीकारोक्ति स्पष्ट, निर्विवाद, बिना शर्त और असंदिग्ध हो।

अदालत ने कहा कि बयानों में कथित विरोधाभास या किसी तथ्य का सामान्य उल्लेख अपने आप में स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब मामले में विवादित तथ्य मौजूद हों और उनके लिए विधिवत सुनवाई आवश्यक हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ हिंदू परिवार से जुड़े संपत्ति विवाद की सुनवाई कर रही थी। मामला संयुक्त स्वामित्व वाली कृषि भूमि की बिक्री से प्राप्त धनराशि के बंटवारे से संबंधित है।

विवादित संपत्ति लगभग 15.31 करोड़ रुपये में बेची गई। प्रत्येक सह-स्वामी का हिस्सा करीब 2.55 करोड़ रुपये बनता था। प्रतिवादी संख्या-3 ने अपने लिखित जवाब में कहा कि पारिवारिक समझौते के तहत प्रत्येक पक्ष को बिक्री राशि में से 3 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।

इसी कथन के आधार पर वादी ने आदेश 12 नियम 6 के तहत आवेदन दाखिल कर प्रतिवादी संख्या-3 से 44,79,167 रुपये की वसूली की डिक्री मांगी। वादी का तर्क था कि प्रतिवादी को उसके वैध हिस्से से अधिक राशि मिली है, इसलिए अतिरिक्त रकम लौटाई जानी चाहिए।

हालांकि, जिला कोर्ट ने यह आवेदन खारिज कर दिया और कहा कि मामले में विवादित तथ्य मौजूद हैं, जिनका निपटारा साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही संभव है।

इसके बाद वादी ने दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने जिला कोर्ट के आदेश को पलटते हुए प्रतिवादी संख्या-3 के खिलाफ 44,79,167 रुपये तथा छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ डिक्री पारित की।

हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रतिवादी संख्या-3 के कानूनी उत्तराधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उनका कहना था कि हाईकोर्ट ने पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए तथ्यों की अपनी अलग व्याख्या की, जबकि मामले में कई विवादित प्रश्न थे जिनका फैसला साक्ष्य के आधार पर होना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं की दलीलों से सहमति जताई। जस्टिस विपुल एम. पंचोली द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि प्रतिवादी संख्या-3 का यह कथन कि सभी सह-स्वामियों को 3-3 करोड़ रुपये मिले, अपने आप में उसकी देनदारी की स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा,

"स्वीकारोक्ति के आधार पर दिया गया फैसला सामान्य नियम का अपवाद है। सामान्यतः दीवानी विवादों का निपटारा पक्षकारों को साक्ष्य पेश करने का पूरा अवसर देने के बाद किया जाना चाहिए। चूंकि आदेश 12 नियम 6 के तहत डिक्री पारित होने से मुकदमे की पूर्ण सुनवाई का अवसर समाप्त हो जाता है, इसलिए इस प्रावधान का प्रयोग अत्यंत सावधानी से और केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां स्वीकारोक्ति पूरी तरह स्पष्ट, निर्विवाद और बिना शर्त हो।"

खंडपीठ ने यह भी कहा कि लिखित जवाब या अन्य अभिलेखों को टुकड़ों में नहीं पढ़ा जा सकता, बल्कि उन्हें समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने प्रतिवादी के बयान के एक हिस्से को अलग करके उसकी ऐसी व्याख्या की, जो उचित नहीं थी।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण अधिकार क्षेत्र का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि या गंभीर प्रक्रिया संबंधी अनियमितता दिखाई दे। केवल इस आधार पर कि कोई दूसरा दृष्टिकोण संभव है, पुनरीक्षण अदालत अपने विचार नहीं थोप सकती।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और जिला कोर्ट के उस आदेश को बहाल किया, जिसमें कहा गया था कि मामले का निपटारा मुकदमे की नियमित सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद किया जाएगा।

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