41 साल तक लंबित रही अपील पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, 72 वर्षीय दोषी को मिली जमानत
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में 41 वर्षों तक लंबित रही आपराधिक अपील पर गंभीर चिंता जताते हुए 72 वर्षीय विजय सिंह को जमानत दी। विजय सिंह की हत्या के मामले में दोषसिद्धि को हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल चंद्राकर की खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए मामले की सुनवाई की।
अदालत ने विजय सिंह को जमानत देने के साथ ही ट्रायल कोर्ट का रिकॉर्ड भी तलब किया।
विजय सिंह को वर्ष 1985 में कानपुर की एक अदालत ने अपने भाई की हत्या के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ उन्होंने तत्काल इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। अपील लंबित रहने के दौरान उन्हें जमानत मिल गई और वह लगभग चार दशक तक जमानत पर रहे।
हालांकि, यह अपील 41 वर्षों तक लंबित रही और अंततः 9 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने 20 पृष्ठों के फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल रहा है।
हालांकि फैसले में इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया गया कि अपील चार दशक से अधिक समय तक लंबित क्यों रही।
सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने विजय सिंह की ओर से पक्ष रखते हुए कहा कि उनके मुवक्किल ने जमानत के दौरान हमेशा अच्छा आचरण बनाए रखा और वर्तमान में वह केवल तीन महीने से जेल में हैं। उन्होंने अपील की कि मामले के अंतिम निपटारे तक उन्हें जमानत दी जाए।
खंडपीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए जमानत मंजूर कर ली। साथ ही वकील से यह सुझाव देने को भी कहा कि हाईकोर्टों में वर्षों से लंबित ऐसे मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिए कौन-से उपाय अपनाए जा सकते हैं।
अपनी याचिका में विजय सिंह ने कहा,
"आज मेरी उम्र 72 वर्ष है। चार दशकों से अधिक समय तक मैंने अपनी युवावस्था, मध्य आयु और अब वृद्धावस्था दोषसिद्धि की छाया में बिताई है। मैं अब दादा बन चुका हूं और उम्र से जुड़ी कई बीमारियों से जूझ रहा हूं। मेरी आपराधिक अपील 40 वर्षों तक लंबित रही। अंततः लगभग संक्षिप्त तरीके से खारिज कर दी गई। यह विशेष अनुमति याचिका मेरे लिए वास्तव में अंतिम कानूनी सहारा है।"
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने एक बार फिर न्यायिक मामलों के निस्तारण में होने वाली असाधारण देरी के मुद्दे को केंद्र में ला दिया।